Ghagh Ki Kahawat: General Farming Vol-1 - कृषि ज्ञान

Sooraj Krishna Shastri
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Ghagh Ki Kahawat: General Farming Vol-1 - कृषि ज्ञान

Ghagh Ki Kahawat: General Tips

कृषि सम्बन्धी अन्य कहावतें (भाग 1: 256-352)

#256
दस हल राव आठ हल राजा । चार हलों का बड़ा किसाना ॥ २५६ ॥

अर्थ: जिस किसान के पास दस हल की खेती होती हो उसे राव कहते हैं। आठ हल की खेती वालों को राजा तथा चार हल वालों को बहुत बड़ा किसान समझा जाता है।

#257
एक हल हस्या, दो हल काज । तीन हल खेती, चार हल राज ॥ २५७ ॥

अर्थ: एक हल की खेती केवल हँसी भर ही है। दो हलों की खेती खाने-पीने योग्य है, तीन हलों की खेती को खेती करना कहते हैं और चार हलों की खेती राज्य के समान सुखदायी होती है।

#258
जो हल जोते, खेती बाकी । नहीं तो होवे, जाकी ताकी ॥ २५८ ॥

अर्थ: जो लोग अपने हाथ से खेती करते हैं, उन्हीं लोगों की खेती उत्तम होती है। दूसरे के हाथ से करवाई गयी खेती किसी काम की नहीं होती।

#259
सन्तम खेती मध्यम बान । निषिद्ध चाकरी भीख निदान ॥ २५९ ॥

अर्थ: कृषि-कार्य सबसे श्रेष्ठ कर्म होता है, व्यापार उससे मध्यम श्रेणी का तथा नौकरी पेशा बहुत निषिद्ध काम है। भीख माँगने का काम तो बहुत ही नीच है।

#260
जोते खेत घास न टूटे । तेकर भाग जल्द ही फूटे ॥ २६० ॥

अर्थ: खेत की जुताई करने पर भी अगर उस खेत की घास नष्ट न हो तो उस किसान की तकदीर जल्दी ही फूट जाती है।

#261
काँधे कुदारी खुरपी हाथ, लाठी हँसुवा राखै साथ।
काटै घास खेत निरावै, सोई चतुर किसान कहावै ॥ २६१ ॥

अर्थ: जो लोग हाथ में कुदाल और खुरपी लिये रहते हों साथ में लाठी और हँसिया रखें तथा घास काटकर खेत की निराई करते हों, वही लोग चतुर किसान समझे जाते हैं।

#262
माघ मास चलै पुरवाई । तब सरसों को माहू खाई ॥ २६२ ॥

अर्थ: माघ के महीने में जब पुरवा हवा बहती है तो सरसों को माहू नाम का कीड़ा खा डालता है।

#263
फागुन माह चले पुरवाई । तब गेहूँ में गेरुई धाई ॥ २६३ ॥

अर्थ: जब फाल्गुन मास में पुरुवा हवा चलती है तो गेहूँ में गेरुई (एक प्रकार का कीड़ा) लग जाती है।

#264
माघ मास जो परै न सीत । महँगा नाज होयगो मीत ॥ २६४ ॥

अर्थ: यदि माघ के महीने में ठण्ढक न पड़े तो समझना चाहिये कि अनाज महँगा हो जायगा।

#265
खेती करै साँझ घर सोवै । मूसै चोर माथ धरि रोवै ॥ २६५ ॥

अर्थ: खेती करके रात को घर में सोने वाले किसान की खेती नष्ट हो जाती है। क्योंकि उसकी फसल को चोर लोग काट ले जाया करते हैं।

#266
विधि का लिखा न मेटे कोय । बिना तुला के धान न होय ॥ २६६ ॥

अर्थ: जब तक तुला राशि पर सूर्य नहीं आता तब तक धान कभी भी नहीं हो सकता।

#267
कीकर पाया सिरस दल, हरियाने का बैल ।
लोध पेड़ लगाय के, घर बैठे पासा खेल ॥ २६७ ॥

अर्थ: जिस किसान के पास बबूल का पाया, सिरस का हल, हरियाने का बैल और लोध का वृक्ष लगा हो वह किसान बड़ा सुखी होता है।

#268
मंगलवार को परै दिवारी । हँसें किसान रोवै बेपारी ॥ २६८ ॥

अर्थ: मंगलवार के दिन दीपावली का त्योहार पड़ने से कृषक-गण सुखी और व्यापारी वर्ग दुःखी होते हैं।

#269
जेकरे ऊख में लगै लोहाई । वेकरे ऊपर बड़ी तबाही ॥ २६९ ॥

अर्थ: जिस किसान के ऊख में लाही नाम का कीड़ा लग जाता है तो उसके ऊपर बड़ी विपत्ति आ जाती है।

#270
उलटा बादर पच्छिम चढ़े, राँड़ मूंड सेन्हाय ।
कहें घाघ सुनु भड्डरी, यह बरसै वह जाय ॥ २७० ॥

अर्थ: जब पुरुवा हवा के समय पश्चिम से बादल आवे और विधवा सिर खोलकर नहाए, तो घाघ कहते हैं कि बादल बरसेगा और वह स्त्री बहक जाएगी।

#271
जब हर होंगे बरसन हार । काह करै दक्षिणी बयार ॥ २७१ ॥

अर्थ: यदि ईश्वर बारिश करना चाहेंगे तो दक्षिणी हवा चलने से भी वर्षा नहीं रुक सकती।

#272
थोरा जोते बहुत हेंगावें, ऊँच न बाँधें आड़ ।
ऊँचे पर खेती करै, पैदा हो अँड़भाड़ ॥ २७२ ॥

अर्थ: जो थोड़ी जुताई और ज्यादा हेंगाई करे, मेंड़ न बाँधे और ऊँचे पर खेती करे - वहाँ अँड़भाड़ (बेकार पौधे) ही पैदा होते हैं।

#273
माघ क ऊमस जेठ क जाड़ । पहिले बरखा भरिगो ताल ।
घाघ करें हम होब वियोगी । कुआँ क पानी धोइहैं धोबी ॥ २७३ ॥

अर्थ: माघ में गर्मी, जेठ में जाड़ा और पहली बारिश में ताल भर जाना - यह भीषण अकाल का संकेत है।

#274
माघ में बादर लाल धरै । तब निहचे जानो पाथर परै ॥ २७४ ॥

अर्थ: जब माघ के महीने मे लाल-लाल बादल दिखाई पड़े, तब समझना चाहिये कि जरूर ही पत्थर और पाला पड़ेगा।

#275
दिन के बादर रात को तारे । चलो पीव जहँ जीवें बारे ॥ २७५ ॥

अर्थ: दिन में बदली और रात में तारे दिखना अकाल के लक्षण हैं। ऐसे में देश छोड़ देना चाहिए।

#276
अम्बाकोर चले पुरवाई । फिर जानो पावस ऋतु आई ॥ २७६ ॥

अर्थ: जब जोरों से पुरुवा हवा बहे और आम गिरने लगें तब वर्षा ऋतु का आगमन जानना चाहिये।

#277
खेती तो उनकी जो करे अहान-अहान ।
तिनकी खेती क्या होवे, जो देखे साँझ बिहान ॥ २७७ ॥

अर्थ: खेती उनकी अच्छी है जो हर वक्त खेत में रहते हैं। जो केवल सुबह-शाम देखते हैं उनकी खेती अच्छी नहीं होती।

#278
माघे गरमी जेठे जाड़ । घाघ कहें हम भये उजाड़ ॥ २७८ ॥

अर्थ: यदि माघ के महीने में गर्मी और ज्येष्ठ में सर्दी पड़े तो समझना चाहिए कि बहुत भारी अकाल पड़ने वाला है।

#279
छिछले जोते बोवै धान । सो घर कोठिला भरै किसान ॥ २७९ ॥

अर्थ: धान के खेत में हल्की जुताई करके बीज बो देने से पैदावार इतनी अच्छी होती है कि अन्न का कोठिला भर जाता है।

#280
पहले गेहूँ पीछे धान । तिसको कहिये पूर किसान ॥ २८० ॥

अर्थ: वह किसान बहुत ही चतुर समझा जाता है जो धान से पहले गेहूँ की खेती पर विचार करता है।

#281
तेरह कातिक तीन अषाढ़ । जो चूका सो हुआ उजाड़ ॥ २८१ ॥

अर्थ: कार्तिक महीने में तेरह दिन और आषाढ़ मास में तीन दिनों की खेती होती है। जो इस मौके को चूकता है वह बर्बाद हो जाता है।

#282
तीन कियारी तेरह गोंद । तब देखे ऊखी के पोर ॥ २८२ ॥

अर्थ: ईख के खेत में तीन बार सिंचाई और तेरह बार गुड़ाई करने से फसल तैयार होती है।

#283
जोंधरी बोवे तोड़ मरोर । फिर तो ऊख बहुत सुख पोर ॥ २८३ ॥

अर्थ: जोंधरी (मकई) के खेत में उलट-पुलट कर जुताई करनी चाहिये इससे उसकी पैदावार बहुत जबर्दस्त होती है।

#284
कालिक बोवै अगहन भरै । सो किसान हाकिम नहिं डरै ॥ २८४ ॥

अर्थ: जो किसान कार्तिक मास में खेत की बोआई करके अगहन में सिंचाई करता है वह लगान देने में हाकिम से नहीं डरता।

#285
भैंस जो जनमे पड़वा, बहू जने जो धी ।
समय नीक नहिं जानिये, कातिक बरसे मी ॥ २८५ ॥

अर्थ: अगर भैंस से पड़वा (बछवा) हो, बहू को बेटी हो और कार्तिक में बारिश हो - तो यह समय अच्छा नहीं है।

#286
खेती करो कपास औ ईख । नहिं तो खाओ माँग के भीख ॥ २८६ ॥

अर्थ: यदि खेती से आमदनी करनी हो तो कपास और ईख की खेती करो, नहीं तो भीख माँगनी पड़ेगी।

#287
जो कपास नहिं गोड़ी । तो हाथ न लागै कौड़ी ॥ २८७ ॥

अर्थ: जो लोग कपास के खेत में गुड़ाई नहीं करते उनको कुछ भी प्राप्ति नहीं होती।

#288
पाही जोते औ घर जाय । तेहि के हाथे कुछ नहिं आय ॥ २८८ ॥

अर्थ: घर से दूर (पाही) खेती करके जो घर चला जाता है (निगरानी नहीं करता), उसके हाथ कुछ नहीं आता।

#289
नीचे भोद ऊपर बदाई । कहै घाघ अब गेरुई खाई ॥ २८९ ॥

अर्थ: यदि भूमि में नमी रहे और आसमान में बादल हो तो घाघ कहते हैं कि फसल में अवश्य ही गेरुई लगेगी।

#290
गेहूँ गेरुई गाँधी धान । फिर किसान को मुरदा जान ॥ २९० ॥

अर्थ: जब गेहूँ में गेरुई और धान में गाँधी रोग लग जाय तब किसान को मरा हुआ समझना चाहिये।

#291
वेश्या बिटिया नील है, बन साँवाँ पुत मान ।
उसके आये घर भरै, दरब लुटावत आन ॥ २९१ ॥

अर्थ: नील वेश्या की बेटी समान है और कपास/साँवाँ पुत्र समान। बेटी घर भरती है (नील से खेत की शक्ति बढ़ती है) और पुत्र लुटाता है।

#292
माघा मकड़ी पुरुवा डाँस । उत्तरा आये सबका नास ॥ २९२ ॥

अर्थ: मघा में मकड़ी और पूर्वी में डाँस उत्पन्न होते हैं, परन्तु उत्तरा के आने से ये दोनों नष्ट हो जाते हैं।

#293
आगे की खेती आगे आगे । पीछे की खेती पाछे भागे ॥ २९३ ॥

अर्थ: सबसे पहले खेती करने वालों की पैदावार सबसे आगे और अच्छी होती है, बाद वालों की पिछड़ जाती है।

#294
सुख सुखरात्ती देव उठान । तेकरे बरहें करो नेवान ॥
ओकरे बरहें खेत खरिहान । तेकरे बरहें कोठिला धान ॥ २९४ ॥

अर्थ: दिवाली/देवोत्थान के 12 दिन बाद नेवान (नया अन्न) करना चाहिए। उसके 12 दिन बाद खलिहान और फिर 12 दिन में कोठिला में धान।

#295
अदरा में जो बोवै साठी । मार भगावै दुःखै लाठी ॥ २९५ ॥

अर्थ: जो लोग आर्द्रा नक्षत्र में धान (साठी) की बोआई करते हैं उनका सारा कष्ट दूर हो जाता है।

#296
सावन सुकुला सत्तमी, उगत न दीखे भान ।
तब लगि देव बरीसिहैं, जब लगि देव उठान ॥ २९६ ॥

अर्थ: यदि श्रावण शुक्ला सप्तमी को सूर्य न दिखाई पड़े तो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठान) तक वृष्टि होती रहती है।

#297
काँसी कूँसी चौथ क चान । अब क्या होवे रोपे धान ॥ २९७ ॥

अर्थ: काँस-कुश के फूल जाने तथा भाद्रपद की उजाली चौथ बीत जाने पर धान रोपने से कोई लाभ नहीं होता।

#298
जेठ में जरै माघ में ठरे । तब ऊख को खेती करै ॥ २९८ ॥

अर्थ: जो ज्येष्ठ की तपन और माघ की ठिठुरन सहन कर सके, वही ईख की खेती सफलतापूर्वक कर सकता है।

#299
सावन भादों खेत निरावें । सो किसान अतिशय सुख पावें ॥ २९९ ॥

अर्थ: सावन भादों के महीने में खेत की निराई करने वाला किसान बहुत ही सुख पाता है।

#300
मास असाढ़ पहुनई कीन । ताकी खेती होवे छीन ॥ ३०० ॥

अर्थ: जो लोग आषाढ़ के महीने में घूम-घूमकर मेहमानदारी करते हैं, उनकी खेती नष्ट हो जाती है।

#301
गेहूँ बिस्सा । ईख तिस्सा ॥ ३०१ ॥

अर्थ: गेहूँ की उपज बीज से बीसगुनी और ईख की तीस गुनी होती है।

#302
जब बरसै तब बाँधो क्यारी । चतुर किसान जो रखै कुदारी ॥ ३०२ ॥

अर्थ: जब वर्षा हो तब क्यारी बनानी चाहिये। जो किसान हर समय हाथ में कुदाल रखता हो, वही चतुर समझा जाता है।

#303
कात्तिक मास रात हल जोतो । टाँग पसारे घर जनि सूतो ॥ ३०३ ॥

अर्थ: कार्तिक के महीने में रात के समय खेतों में जुताई करनी चाहिये। आराम से घर पर नहीं सोना चाहिये।

#304
थोर जोताई ढेर हंगाई, ऊचे बाँधे क्यारी।
उपजे ते उपजै नाहीं बाधै देवे गारी ॥ ३०४ ॥

अर्थ: थोड़ी जुताई, ज्यादा हेंगाई और ऊँची मेंड़ - इस खेती से उपज हो जाए तो ठीक, वरना घाघ को गाली मत देना (यह गलत तरीका है)।

#305
बिढ़रै खेत पुराना बीज । बाकी खेती जाये छीज ॥ ३०५ ॥

अर्थ: जिसका खेत दूर-दूर और बीज पुराना हो, उसकी खेती नष्ट हो जाती है।

#306
नरसी गेहूँ सरसी जवा । बहुतै बरखा चना बवा ॥ ३०६ ॥

अर्थ: गेहूँ को सूखी (नरसी) तथा जौ को नम (सरसी) भूमि में बोना उचित है। चना को काफी पानी बरस जाने के बाद बोना चाहिये।

#307
ऊख सरवती दिवला धान । छाँड़ि इन्हें मत बोओ आन ॥ ३०७ ॥

अर्थ: ईख और दिवला धान के अतिरिक्त अन्य फसलों की खेती नहीं करनी चाहिये (ये श्रेष्ठ हैं)।

#308
विधि का मिटै न लिखा विधान । आधे चित्रा फूटी धान ॥ ३०८ ॥

अर्थ: यह विधाता का अमिट विधान है कि आधे चित्रा नक्षत्र के पहले धान नहीं फूटता।

#309
गेहूँ जौ जब पछुवाँ पावै । तब जल्दी से बौनी होवै ॥ ३०९ ॥

अर्थ: जब पछुवाँ हवा चलने लगती है तब गेहूँ और जौ बोआई करने लायक हो जाता है।

#310
खेती करे अधिया । न बैल मरे न बधिया ॥ ३१० ॥

अर्थ: अधिया (साझे) पर खेती करने से बैलों की बचत हो जाती है।

#311
ऊँचे पर से बोला मँडुवा । सब अन्नों का मैं हूँ भँडुवा ॥
आठ दिना जो मुझ को खाय । भले मरद से चला न जाय ॥ ३११ ॥

अर्थ: मँडुवा कहता है कि मैं सब अन्नों में खराब हूँ। जो मुझे आठ दिन लगातार खाए, वह कमजोरी से चल भी नहीं पाएगा।

#312
समथर जोतै पूत चरावै । लागे जेठ मुसौला छावै ॥
भादों माह उड़े जो गरदा । बीस बरस तक जोतै बरदा ॥ ३१२ ॥

अर्थ: समतल खेत जोतना, खुद चराना और देखभाल करने से बैल 20 साल तक काम करता है।

#313
तेरे हों कुनबा घना । तो तू बोओ निहचै चना ॥ ३१३ ॥

अर्थ: अगर परिवार (कुनबा) बड़ा हो तो किसान को चने की खेती अवश्य करनी चाहिये (खाने के लिए)।

#314
मघा में मक्कर पूर्वी डाँस । उतरा आये सबका नास ॥ ३१४ ॥

अर्थ: मघा में मकड़ी और पूर्वा में डाँस होते हैं, उत्तरा में सब नष्ट हो जाते हैं।

#315
पछुवाँ हवा ओसावै जोय । कहैं घाघ घुन कबहुँ न होय ॥ ३१५ ॥

अर्थ: पछुवाँ हवा में अनाज ओसाने से उसमें कभी घुन नहीं लगता।

#316
तिल्ली कोरें मास बिलोरें ॥ ३१६ ॥

अर्थ: तिल को कोरना (हल्की निराई) और उड़द को बिलोरना चाहिये।

#317
यकसर खेती यकसर मार । कहें घाघ ये निहचै हार ॥ ३१७ ॥

अर्थ: अकेले की खेती और अकेले की मार - दोनों में हार निश्चित है (संगठन जरूरी है)।

#318
मँडुवा मीन, चीन संग दही । कोदो क भात, दूध संग लही ॥ ३१८ ॥

अर्थ: (खानपान) मँडुवा मछली के साथ, चीनी दही के साथ और कोदों का भात दूध के साथ खाना उत्तम है।

#319
बहे बयार उत्तरा । माँड़ पीयें कुत्तरा ॥ ३१९ ॥

अर्थ: जब उत्तरी हवा चलती है तो धान की पैदावार इतनी होती है कि कुत्ते भी माँड़ पीते हैं।

#320
ओझा कमिया बैद किसान । बधिया बैल न खेत मसान ॥ ३२० ॥

अर्थ: मजदूर ओझा, किसान वैद्य, बिना बधिया का बैल और मरघट का खेत - ये सब हानिकारक हैं।

#321
मंगल पड़े तो भू चले, बुध के पड़े सुकाल ।
फगुआ होय सनोचरे, निहचे पड़े अकाल ॥ ३२१ ॥

अर्थ: फगुआ (होली) मंगल को हो तो भूचाल, बुध को हो तो सुकाल, और शनिवार को हो तो अकाल पड़ता है।

#322
आधे में विद्या दहे, राजा दहे अचेत ।
ओछे जर तिरिया दहे, दहे कपास का खेत ॥ ३२२ ॥

अर्थ: अधूरी विद्या, बेखबर राजा, नीच कुल की स्त्री और कपास का खेत - ये नष्ट हो जाते हैं।

#323
ऊख राखै सब कोई । जो माघ में जेठ न होई ॥ ३२३ ॥

अर्थ: अगर जेठ की गर्मी न हो, तो सब लोग ईख की खेती कर लें (परन्तु गर्मी सहना सबके बस की बात नहीं)।

#324
जै दिन भादों चले पछार । तै दिन पूसै पड़े तुसार ॥ ३२४ ॥

अर्थ: भादों में जितने दिन पछुवाँ हवा चलती है, पूस में उतने ही दिन पाला पड़ता है।

#325
पहले छाजे तीनों घर । सार, मुसौला औ बढ़हर ॥ ३२५ ॥

अर्थ: बरसात से पहले सार (गौशाला), मुसौला और बढ़हर (भूसा घर) छा लेने चाहिए।

#326
चना में सरदी बहुतै आवै । ताको जान गदहिला स्वावै ॥ ३२६ ॥

अर्थ: चने में अधिक सर्दी लगने पर गदहिला कीड़ा उसे खा जाता है।

#327
बाउ चले जब दुखिना । तब माँड़ कहाँ से चखना ॥ ३२७ ॥

अर्थ: दक्षिणी हवा चलने से धान नहीं होता, माँड़ तक नहीं मिलता।

#328
जो तू चाहे माल को । तो ईख करले नाल को ॥ ३२८ ॥

अर्थ: धन चाहिए तो नाल (निचली भूमि) में ईख की खेती करो।

#329
चना सींच पर जब हो जावै । ताको पहले तुरत कटावै ॥ ३२९ ॥

अर्थ: जब चना सींचने लायक हो जाए, तो पहले उसकी कटाई (कलम) करानी चाहिए।

#330
गेहूँ बोओ काट कपास । नहिं हो ढेला नहिं हो घास ॥ ३३० ॥

अर्थ: कपास काटने के बाद उसी खेत में गेहूँ बोना चाहिए (बशर्ते ढेला और घास न हो)।

#331
दुइ हल खेती एक हल बारी । एक बैल से नीक कुदारी ॥ ३३१ ॥

अर्थ: खेती के लिए दो हल और बारी के लिए एक हल ठीक है। एक बैल से अच्छा है कुदाल चलाना।

#332
गेहूँ होय काहें। असाढ़ में दुइ बाहें।
गेहूँ होय काहें । सोलह बाहें औ नौ गाहें ॥
गेहूँ होय काहें । कातिक के चौबाहें ॥ ३३२ ॥

अर्थ: गेहूँ तब अच्छा होता है जब आषाढ़ में दो बार, कुल सोलह बार जुताई और नौ बार हेंगाई हो। कार्तिक में चार जुताई बहुत जरूरी है।

#333
जेते गहिरा जोते खेत । परे बीज फल तेते देत ॥ ३३३ ॥

अर्थ: खेत की जुताई जितनी गहरी होगी, बीज उतना ही अधिक फल देगा।

#334
बीघा बायर बाय, बांध जो होय बंधाये । भरा भुसौला होय, बबुर जो होय रखाये ॥
बढ़ई बसे नगीच, बसूला बाढ़ धराये । तिरिया होय सुजान, बिया तैयार बनाये ॥
बरद बगौधा होय, बरदिया चतुर सुहाये । बेटवा होय सपूत, कहे बिन करें कराये ॥ ३३४ ॥

अर्थ: (भाग्यशाली किसान) जिसके पास खेत, बाँध, भरा भुसौला, बबूल, पास में बढ़ई, चतुर स्त्री, सीधे बैल और आज्ञाकारी बेटा हो - वह सुखी है।

#335
उत्तम खेती जो हर गहा । मध्यम खेती जो संग रहा ॥
जो पूछे हरवाहा कहाँ । बीज बूड़िगे यहाँ-वहाँ ॥ ३३५ ॥

अर्थ: जो खुद हल चलाए वह उत्तम खेती, जो साथ रहे वह मध्यम, और जो घर बैठकर पूछे - उसका बीज डूब गया समझो।

#336
अहिर बरदिया बाहमन हारी । फसल उगै की होय न बारी ॥ ३३६ ॥

अर्थ: अहीर और ब्राह्मण अगर हरवाहा हों, तो खेती चौपट हो जाती है।

#337
सबै काज, हर तर । खसम हो सिर पर ॥ ३३७ ॥

अर्थ: खेती सबसे श्रेष्ठ है, यदि मालिक खुद सिर पर खड़ा होकर काम कराए।

#338
साठी में साठी करे, बाड़ी में बाड़ी ॥
ईख में जो धान बोवे, जारो वाकी दाढ़ी ॥ ३३८ ॥

अर्थ: साठी में साठी और ईख में धान बोने वाले की दाढ़ी जला दो (वह महामूर्ख है)।

#339
लगे बसन्त । ईख पकन्त ॥ ३३९ ॥

अर्थ: बसन्त ऋतु आते ही ऊख पकने लगती है।

#340
दो दिन पछुवाँ छः पुरवाई । गेहूँ जो की करें दवाँई ॥
ताके बाद ओसावै जोई । दाना भूसा अलगे होई ॥ ३४० ॥

अर्थ: दो दिन पछुवाँ और छह दिन पुरवाई में दंवाई करने के बाद ओसाने से दाना-भूसा अलग हो जाता है।

#341
खेती पकी और कामिन गरम । ये दोनों हैं बहुते नरम ॥ ३४१ ॥

अर्थ: पकी खेती और गर्भिणी स्त्री - ये दोनों बहुत नाजुक (नरम) होती हैं।

#342
चने का बीया भरि भरि जाला । घासे पर मकड़ी का डाला ॥ ३४२ ॥

अर्थ: जब घास पर मकड़ी जाला बुनने लगे, तब चने की बोआई करनी चाहिए।

#343
भैंस कँदेलिया तू पिया लाये । माँगे दूध कभी नहिं पाये ॥ ३४३ ॥

अर्थ: कँदेलिया जाति की भैंस से दूध की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

#344
लगे मास दो गहना । राजा मरे कि सहना ॥ ३४४ ॥

अर्थ: महीने में दो ग्रहण लगने से राजा या प्रजा का बुरा होता है।

#345
खन के काटे बन के मोराये । तब बरधन का दाम सुलाये ॥ ३४५ ॥

अर्थ: ईख को खोदकर काटने और जोर से पेरने से ही बैलों का दाम वसूल होता है।

#346
दो तावा। घर खावा ॥ ३४६ ॥

अर्थ: जिस घर में दो तवे हों (फूट हो), वह घर बर्बाद हो जाता है।

#347
चना काटै अधपका, जौ काटै पका ।
काटै गेहूँ ओहि समय, जब बाली लटका ॥ ३४७ ॥

अर्थ: चने को अधपका, जौ को पका हुआ और गेहूँ को बालियाँ लटकने पर काटना चाहिए।

#348
पाकी खेती गाभिन गाय । तब जानो जब मुँह में जाय ॥ ३४८ ॥

अर्थ: पकी खेती और गाभिन गाय पर तब तक भरोसा मत करो जब तक लाभ हाथ में न आ जाए।

#349
अब्बर खेती जुट्टी खाय । सड़ जायै से बहुत मोटाय ॥ ३४९ ॥

अर्थ: कमजोर खेत में नील/डंठल सड़ाने से खेत उपजाऊ (मोटा) हो जाता है।

#350
काँचा खेत न जोते कोई । बीजन में अँखुआ नहिं होई ॥ ३५० ॥

अर्थ: गीले (कच्चे) खेत में जुताई नहीं करनी चाहिए, इससे बीज अंकुरित नहीं होते।

#351
आगे बोवै । सवाया लवै ॥ ३५१ ॥

अर्थ: सबसे आगे (समय पर) बोआई करने से सवाया पैदावार मिलती है।

#352
असाढ़ जोते लड़के बारे, सावन भादों में हरवाहे ।
कुआर जोतै घर का बेटा, खेती होवे सबसे जेठा ॥ ३५२ ॥

अर्थ: आषाढ़ में लड़के, सावन-भादों में हरवाहे और क्वार में घर का बेटा जोते - तो खेती सबसे श्रेष्ठ (जेठा) होती है।

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