Ghagh Ki Kahawat: General Tips
कृषि सम्बन्धी अन्य कहावतें (भाग 1: 256-352)
अर्थ: जिस किसान के पास दस हल की खेती होती हो उसे राव कहते हैं। आठ हल की खेती वालों को राजा तथा चार हल वालों को बहुत बड़ा किसान समझा जाता है।
अर्थ: एक हल की खेती केवल हँसी भर ही है। दो हलों की खेती खाने-पीने योग्य है, तीन हलों की खेती को खेती करना कहते हैं और चार हलों की खेती राज्य के समान सुखदायी होती है।
अर्थ: जो लोग अपने हाथ से खेती करते हैं, उन्हीं लोगों की खेती उत्तम होती है। दूसरे के हाथ से करवाई गयी खेती किसी काम की नहीं होती।
अर्थ: कृषि-कार्य सबसे श्रेष्ठ कर्म होता है, व्यापार उससे मध्यम श्रेणी का तथा नौकरी पेशा बहुत निषिद्ध काम है। भीख माँगने का काम तो बहुत ही नीच है।
अर्थ: खेत की जुताई करने पर भी अगर उस खेत की घास नष्ट न हो तो उस किसान की तकदीर जल्दी ही फूट जाती है।
काटै घास खेत निरावै, सोई चतुर किसान कहावै ॥ २६१ ॥
अर्थ: जो लोग हाथ में कुदाल और खुरपी लिये रहते हों साथ में लाठी और हँसिया रखें तथा घास काटकर खेत की निराई करते हों, वही लोग चतुर किसान समझे जाते हैं।
अर्थ: माघ के महीने में जब पुरवा हवा बहती है तो सरसों को माहू नाम का कीड़ा खा डालता है।
अर्थ: जब फाल्गुन मास में पुरुवा हवा चलती है तो गेहूँ में गेरुई (एक प्रकार का कीड़ा) लग जाती है।
अर्थ: यदि माघ के महीने में ठण्ढक न पड़े तो समझना चाहिये कि अनाज महँगा हो जायगा।
अर्थ: खेती करके रात को घर में सोने वाले किसान की खेती नष्ट हो जाती है। क्योंकि उसकी फसल को चोर लोग काट ले जाया करते हैं।
अर्थ: जब तक तुला राशि पर सूर्य नहीं आता तब तक धान कभी भी नहीं हो सकता।
लोध पेड़ लगाय के, घर बैठे पासा खेल ॥ २६७ ॥
अर्थ: जिस किसान के पास बबूल का पाया, सिरस का हल, हरियाने का बैल और लोध का वृक्ष लगा हो वह किसान बड़ा सुखी होता है।
अर्थ: मंगलवार के दिन दीपावली का त्योहार पड़ने से कृषक-गण सुखी और व्यापारी वर्ग दुःखी होते हैं।
अर्थ: जिस किसान के ऊख में लाही नाम का कीड़ा लग जाता है तो उसके ऊपर बड़ी विपत्ति आ जाती है।
कहें घाघ सुनु भड्डरी, यह बरसै वह जाय ॥ २७० ॥
अर्थ: जब पुरुवा हवा के समय पश्चिम से बादल आवे और विधवा सिर खोलकर नहाए, तो घाघ कहते हैं कि बादल बरसेगा और वह स्त्री बहक जाएगी।
अर्थ: यदि ईश्वर बारिश करना चाहेंगे तो दक्षिणी हवा चलने से भी वर्षा नहीं रुक सकती।
ऊँचे पर खेती करै, पैदा हो अँड़भाड़ ॥ २७२ ॥
अर्थ: जो थोड़ी जुताई और ज्यादा हेंगाई करे, मेंड़ न बाँधे और ऊँचे पर खेती करे - वहाँ अँड़भाड़ (बेकार पौधे) ही पैदा होते हैं।
घाघ करें हम होब वियोगी । कुआँ क पानी धोइहैं धोबी ॥ २७३ ॥
अर्थ: माघ में गर्मी, जेठ में जाड़ा और पहली बारिश में ताल भर जाना - यह भीषण अकाल का संकेत है।
अर्थ: जब माघ के महीने मे लाल-लाल बादल दिखाई पड़े, तब समझना चाहिये कि जरूर ही पत्थर और पाला पड़ेगा।
अर्थ: दिन में बदली और रात में तारे दिखना अकाल के लक्षण हैं। ऐसे में देश छोड़ देना चाहिए।
अर्थ: जब जोरों से पुरुवा हवा बहे और आम गिरने लगें तब वर्षा ऋतु का आगमन जानना चाहिये।
तिनकी खेती क्या होवे, जो देखे साँझ बिहान ॥ २७७ ॥
अर्थ: खेती उनकी अच्छी है जो हर वक्त खेत में रहते हैं। जो केवल सुबह-शाम देखते हैं उनकी खेती अच्छी नहीं होती।
अर्थ: यदि माघ के महीने में गर्मी और ज्येष्ठ में सर्दी पड़े तो समझना चाहिए कि बहुत भारी अकाल पड़ने वाला है।
अर्थ: धान के खेत में हल्की जुताई करके बीज बो देने से पैदावार इतनी अच्छी होती है कि अन्न का कोठिला भर जाता है।
अर्थ: वह किसान बहुत ही चतुर समझा जाता है जो धान से पहले गेहूँ की खेती पर विचार करता है।
अर्थ: कार्तिक महीने में तेरह दिन और आषाढ़ मास में तीन दिनों की खेती होती है। जो इस मौके को चूकता है वह बर्बाद हो जाता है।
अर्थ: ईख के खेत में तीन बार सिंचाई और तेरह बार गुड़ाई करने से फसल तैयार होती है।
अर्थ: जोंधरी (मकई) के खेत में उलट-पुलट कर जुताई करनी चाहिये इससे उसकी पैदावार बहुत जबर्दस्त होती है।
अर्थ: जो किसान कार्तिक मास में खेत की बोआई करके अगहन में सिंचाई करता है वह लगान देने में हाकिम से नहीं डरता।
समय नीक नहिं जानिये, कातिक बरसे मी ॥ २८५ ॥
अर्थ: अगर भैंस से पड़वा (बछवा) हो, बहू को बेटी हो और कार्तिक में बारिश हो - तो यह समय अच्छा नहीं है।
अर्थ: यदि खेती से आमदनी करनी हो तो कपास और ईख की खेती करो, नहीं तो भीख माँगनी पड़ेगी।
अर्थ: जो लोग कपास के खेत में गुड़ाई नहीं करते उनको कुछ भी प्राप्ति नहीं होती।
अर्थ: घर से दूर (पाही) खेती करके जो घर चला जाता है (निगरानी नहीं करता), उसके हाथ कुछ नहीं आता।
अर्थ: यदि भूमि में नमी रहे और आसमान में बादल हो तो घाघ कहते हैं कि फसल में अवश्य ही गेरुई लगेगी।
अर्थ: जब गेहूँ में गेरुई और धान में गाँधी रोग लग जाय तब किसान को मरा हुआ समझना चाहिये।
उसके आये घर भरै, दरब लुटावत आन ॥ २९१ ॥
अर्थ: नील वेश्या की बेटी समान है और कपास/साँवाँ पुत्र समान। बेटी घर भरती है (नील से खेत की शक्ति बढ़ती है) और पुत्र लुटाता है।
अर्थ: मघा में मकड़ी और पूर्वी में डाँस उत्पन्न होते हैं, परन्तु उत्तरा के आने से ये दोनों नष्ट हो जाते हैं।
अर्थ: सबसे पहले खेती करने वालों की पैदावार सबसे आगे और अच्छी होती है, बाद वालों की पिछड़ जाती है।
ओकरे बरहें खेत खरिहान । तेकरे बरहें कोठिला धान ॥ २९४ ॥
अर्थ: दिवाली/देवोत्थान के 12 दिन बाद नेवान (नया अन्न) करना चाहिए। उसके 12 दिन बाद खलिहान और फिर 12 दिन में कोठिला में धान।
अर्थ: जो लोग आर्द्रा नक्षत्र में धान (साठी) की बोआई करते हैं उनका सारा कष्ट दूर हो जाता है।
तब लगि देव बरीसिहैं, जब लगि देव उठान ॥ २९६ ॥
अर्थ: यदि श्रावण शुक्ला सप्तमी को सूर्य न दिखाई पड़े तो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठान) तक वृष्टि होती रहती है।
अर्थ: काँस-कुश के फूल जाने तथा भाद्रपद की उजाली चौथ बीत जाने पर धान रोपने से कोई लाभ नहीं होता।
अर्थ: जो ज्येष्ठ की तपन और माघ की ठिठुरन सहन कर सके, वही ईख की खेती सफलतापूर्वक कर सकता है।
अर्थ: सावन भादों के महीने में खेत की निराई करने वाला किसान बहुत ही सुख पाता है।
अर्थ: जो लोग आषाढ़ के महीने में घूम-घूमकर मेहमानदारी करते हैं, उनकी खेती नष्ट हो जाती है।
अर्थ: गेहूँ की उपज बीज से बीसगुनी और ईख की तीस गुनी होती है।
अर्थ: जब वर्षा हो तब क्यारी बनानी चाहिये। जो किसान हर समय हाथ में कुदाल रखता हो, वही चतुर समझा जाता है।
अर्थ: कार्तिक के महीने में रात के समय खेतों में जुताई करनी चाहिये। आराम से घर पर नहीं सोना चाहिये।
उपजे ते उपजै नाहीं बाधै देवे गारी ॥ ३०४ ॥
अर्थ: थोड़ी जुताई, ज्यादा हेंगाई और ऊँची मेंड़ - इस खेती से उपज हो जाए तो ठीक, वरना घाघ को गाली मत देना (यह गलत तरीका है)।
अर्थ: जिसका खेत दूर-दूर और बीज पुराना हो, उसकी खेती नष्ट हो जाती है।
अर्थ: गेहूँ को सूखी (नरसी) तथा जौ को नम (सरसी) भूमि में बोना उचित है। चना को काफी पानी बरस जाने के बाद बोना चाहिये।
अर्थ: ईख और दिवला धान के अतिरिक्त अन्य फसलों की खेती नहीं करनी चाहिये (ये श्रेष्ठ हैं)।
अर्थ: यह विधाता का अमिट विधान है कि आधे चित्रा नक्षत्र के पहले धान नहीं फूटता।
अर्थ: जब पछुवाँ हवा चलने लगती है तब गेहूँ और जौ बोआई करने लायक हो जाता है।
अर्थ: अधिया (साझे) पर खेती करने से बैलों की बचत हो जाती है।
आठ दिना जो मुझ को खाय । भले मरद से चला न जाय ॥ ३११ ॥
अर्थ: मँडुवा कहता है कि मैं सब अन्नों में खराब हूँ। जो मुझे आठ दिन लगातार खाए, वह कमजोरी से चल भी नहीं पाएगा।
भादों माह उड़े जो गरदा । बीस बरस तक जोतै बरदा ॥ ३१२ ॥
अर्थ: समतल खेत जोतना, खुद चराना और देखभाल करने से बैल 20 साल तक काम करता है।
अर्थ: अगर परिवार (कुनबा) बड़ा हो तो किसान को चने की खेती अवश्य करनी चाहिये (खाने के लिए)।
अर्थ: मघा में मकड़ी और पूर्वा में डाँस होते हैं, उत्तरा में सब नष्ट हो जाते हैं।
अर्थ: पछुवाँ हवा में अनाज ओसाने से उसमें कभी घुन नहीं लगता।
अर्थ: तिल को कोरना (हल्की निराई) और उड़द को बिलोरना चाहिये।
अर्थ: अकेले की खेती और अकेले की मार - दोनों में हार निश्चित है (संगठन जरूरी है)।
अर्थ: (खानपान) मँडुवा मछली के साथ, चीनी दही के साथ और कोदों का भात दूध के साथ खाना उत्तम है।
अर्थ: जब उत्तरी हवा चलती है तो धान की पैदावार इतनी होती है कि कुत्ते भी माँड़ पीते हैं।
अर्थ: मजदूर ओझा, किसान वैद्य, बिना बधिया का बैल और मरघट का खेत - ये सब हानिकारक हैं।
फगुआ होय सनोचरे, निहचे पड़े अकाल ॥ ३२१ ॥
अर्थ: फगुआ (होली) मंगल को हो तो भूचाल, बुध को हो तो सुकाल, और शनिवार को हो तो अकाल पड़ता है।
ओछे जर तिरिया दहे, दहे कपास का खेत ॥ ३२२ ॥
अर्थ: अधूरी विद्या, बेखबर राजा, नीच कुल की स्त्री और कपास का खेत - ये नष्ट हो जाते हैं।
अर्थ: अगर जेठ की गर्मी न हो, तो सब लोग ईख की खेती कर लें (परन्तु गर्मी सहना सबके बस की बात नहीं)।
अर्थ: भादों में जितने दिन पछुवाँ हवा चलती है, पूस में उतने ही दिन पाला पड़ता है।
अर्थ: बरसात से पहले सार (गौशाला), मुसौला और बढ़हर (भूसा घर) छा लेने चाहिए।
अर्थ: चने में अधिक सर्दी लगने पर गदहिला कीड़ा उसे खा जाता है।
अर्थ: दक्षिणी हवा चलने से धान नहीं होता, माँड़ तक नहीं मिलता।
अर्थ: धन चाहिए तो नाल (निचली भूमि) में ईख की खेती करो।
अर्थ: जब चना सींचने लायक हो जाए, तो पहले उसकी कटाई (कलम) करानी चाहिए।
अर्थ: कपास काटने के बाद उसी खेत में गेहूँ बोना चाहिए (बशर्ते ढेला और घास न हो)।
अर्थ: खेती के लिए दो हल और बारी के लिए एक हल ठीक है। एक बैल से अच्छा है कुदाल चलाना।
गेहूँ होय काहें । सोलह बाहें औ नौ गाहें ॥
गेहूँ होय काहें । कातिक के चौबाहें ॥ ३३२ ॥
अर्थ: गेहूँ तब अच्छा होता है जब आषाढ़ में दो बार, कुल सोलह बार जुताई और नौ बार हेंगाई हो। कार्तिक में चार जुताई बहुत जरूरी है।
अर्थ: खेत की जुताई जितनी गहरी होगी, बीज उतना ही अधिक फल देगा।
बढ़ई बसे नगीच, बसूला बाढ़ धराये । तिरिया होय सुजान, बिया तैयार बनाये ॥
बरद बगौधा होय, बरदिया चतुर सुहाये । बेटवा होय सपूत, कहे बिन करें कराये ॥ ३३४ ॥
अर्थ: (भाग्यशाली किसान) जिसके पास खेत, बाँध, भरा भुसौला, बबूल, पास में बढ़ई, चतुर स्त्री, सीधे बैल और आज्ञाकारी बेटा हो - वह सुखी है।
जो पूछे हरवाहा कहाँ । बीज बूड़िगे यहाँ-वहाँ ॥ ३३५ ॥
अर्थ: जो खुद हल चलाए वह उत्तम खेती, जो साथ रहे वह मध्यम, और जो घर बैठकर पूछे - उसका बीज डूब गया समझो।
अर्थ: अहीर और ब्राह्मण अगर हरवाहा हों, तो खेती चौपट हो जाती है।
अर्थ: खेती सबसे श्रेष्ठ है, यदि मालिक खुद सिर पर खड़ा होकर काम कराए।
ईख में जो धान बोवे, जारो वाकी दाढ़ी ॥ ३३८ ॥
अर्थ: साठी में साठी और ईख में धान बोने वाले की दाढ़ी जला दो (वह महामूर्ख है)।
अर्थ: बसन्त ऋतु आते ही ऊख पकने लगती है।
ताके बाद ओसावै जोई । दाना भूसा अलगे होई ॥ ३४० ॥
अर्थ: दो दिन पछुवाँ और छह दिन पुरवाई में दंवाई करने के बाद ओसाने से दाना-भूसा अलग हो जाता है।
अर्थ: पकी खेती और गर्भिणी स्त्री - ये दोनों बहुत नाजुक (नरम) होती हैं।
अर्थ: जब घास पर मकड़ी जाला बुनने लगे, तब चने की बोआई करनी चाहिए।
अर्थ: कँदेलिया जाति की भैंस से दूध की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
अर्थ: महीने में दो ग्रहण लगने से राजा या प्रजा का बुरा होता है।
अर्थ: ईख को खोदकर काटने और जोर से पेरने से ही बैलों का दाम वसूल होता है।
अर्थ: जिस घर में दो तवे हों (फूट हो), वह घर बर्बाद हो जाता है।
काटै गेहूँ ओहि समय, जब बाली लटका ॥ ३४७ ॥
अर्थ: चने को अधपका, जौ को पका हुआ और गेहूँ को बालियाँ लटकने पर काटना चाहिए।
अर्थ: पकी खेती और गाभिन गाय पर तब तक भरोसा मत करो जब तक लाभ हाथ में न आ जाए।
अर्थ: कमजोर खेत में नील/डंठल सड़ाने से खेत उपजाऊ (मोटा) हो जाता है।
अर्थ: गीले (कच्चे) खेत में जुताई नहीं करनी चाहिए, इससे बीज अंकुरित नहीं होते।
अर्थ: सबसे आगे (समय पर) बोआई करने से सवाया पैदावार मिलती है।
कुआर जोतै घर का बेटा, खेती होवे सबसे जेठा ॥ ३५२ ॥
अर्थ: आषाढ़ में लड़के, सावन-भादों में हरवाहे और क्वार में घर का बेटा जोते - तो खेती सबसे श्रेष्ठ (जेठा) होती है।

