Ghagh Ki Kahawat: Weather
बारिश और मौसम की भविष्यवाणियाँ (सम्पूर्ण संग्रह: 137-198)
अर्थ: यदि आधे पूस (जनवरी के मध्य) के बीत जाने पर वर्षा हो जाय तो गेहूँ की उपज बहुत अधिक होती है।
घाघ कहें बरखा सौ कोस ॥ १३८ ॥
अर्थ: अगर दिन के समय गर्मी रहे और रात को ओस पड़े तो बारिश की आशा नहीं करनी चाहिये।
तो होवे बरखा की आसा ॥ १३९ ॥
अर्थ: जब ज्येष्ठ मास में जोरों की गर्मी पड़े (इतनी कि लोग निराश हो जाएं) तो बारिश की सम्भावना होती है।
मत कीजो बरखा के आस ॥ १४० ॥
अर्थ: बरसात के मौसम में आकाश कभी लाल और कभी पीला दीख पड़े तो वर्षा की आशा नहीं रखनी चाहिये।
भूरे बादर पानी आवै ॥ १४१ ॥
अर्थ: काले बादलों को देखने से लगता है कि पानी जोरों से बरसेगा; परन्तु काले बादलों से अक्सर वर्षा नहीं होती, भूरे रंग के बादलों के उमड़ने पर ही अच्छी बारिश होती है।
सब नाजों में लावे फल ॥ १४२ ॥
अर्थ: यदि मघा नक्षत्र में पानी बरसे तो सभी फसलें (अनाज) अच्छी तरह से होती हैं।
राजा कितनों दंड ले, हारे नहिं गृहस्त ॥ १४३ ॥
अर्थ: यदि चित्रा नक्षत्र के शुरू में और हस्त नक्षत्र के आखीर में वर्षा हो तो किसान राजा का लगान देने से हिम्मत नहीं हारता (पैदावार भरपूर होती है)।
कुर्मी पहरें सोने क पाती ॥ १४४ ॥
अर्थ: यदि स्वाति नक्षत्र में एक बार भी वर्षा हो जाय तो किसान (कुर्मी) की औरतें भी सोने का आभूषण पहनेंगी (इतनी समृद्धि आएगी)।
अब नाहीं बरखा की आसा ॥ १४५ ॥
अर्थ: अगस्त तारा के उदित होने तथा वन में कास के फूल जाने पर वर्षा की उम्मीद नहीं रखनी चाहिये।
अर्थ: उत्तरा नक्षत्र में बारिश होने से कुत्ते भी अनाज नहीं खाते अर्थात् पैदावार इतनी होती है कि सभी लोग सन्तुष्ट हो जाते हैं।
बरधा बेंचि विसाहो गाई ॥ १४७ ॥
अर्थ: यदि सावन के महीने में पुरवा हवा चले तो बैलों को बेंचकर गाय खरीद लेनी चाहिये (सूखा पड़ेगा, खेती नहीं होगी)।
गली गली में पानी डोलै ॥ १४८ ॥
अर्थ: जब ढेले पर बैठकर चील बोलने लगे तो समझना चाहिये कि सब स्थान पानी से भर जाएगा (बाढ़ आएगी)।
घाघ कहें सुनु पंडित ज्ञानी ॥ १४९ ॥
अर्थ: यदि सन्ध्या समय इन्द्रधनुष दिखाई पड़े तो दूसरे दिन अवश्य ही पानी बरसता है।
बरसै पानी बहुतै जोर ॥ १५० ॥
अर्थ: अगर उत्तर-पश्चिम के कोने पर बिजली चमकती हो तो जानना चाहिये कि बहुत जोर से पानी बरसेगा।
बरखा होई भूमि जल बुड़ै ॥ १५१ ॥
अर्थ: यदि गिरगिट ऊपर को उल्टा होकर चढ़े तो समझना चाहिये कि घोर वृष्टि होगी और भूमि जलमग्न हो जाएगी।
ये दोनों पानी के बोर ॥ १५२ ॥
अर्थ: अगर शाम को इन्द्रधनुष दिखाई पड़े और सबेरे मोर की बोली सुनाई दे तो बहुत जोर की बारिश होगी।
खेती ऊँची करो किसाना ॥ १५३ ॥
अर्थ: अगर ईशान (पूर्व और उत्तर) कोण से हवा बहने लगे तो बहुत अच्छी बारिश होने वाली है, खेती ऊँचे स्थानों पर करो।
तो जानो कि बरखा नाय ॥ १५४ ॥
अर्थ: अगर पहली बरसात में ही नदी उतराने लगे (बाढ़ आ जाए) तो समझना चाहिये कि आगे चलकर अच्छी वृष्टि नहीं होगी।
तो दिना बहत्तर बाजे ॥ १५५ ॥
अर्थ: अगर आषाढ़ की पूर्णिमा या प्रतिपदा को बिजली चमके/बादल गरजे तो 72 दिनों तक वर्षा होने की आशा की जाती है।
घाघ कहें अब बरखा गया ॥ १५६ ॥
अर्थ: जब रात को तारे छिटक जाएं और दिन में बादल फट जाएं (छाया पड़े), तो समझना चाहिये कि अब वर्षा नहीं होगी।
अब नाहिं बरखा की आस ॥ १५७ ॥
अर्थ: गोह के बोलने और वन में कास के फूलने पर बरसात की आशा नहीं रह जाती है।
कहै घाघ बरखा नगिचान ॥ १५८ ॥
अर्थ: शाम को यदि पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे (जब सूर्य पश्चिम में हो), तो समझना चाहिये कि वर्षा जल्दी ही होने वाली है।
कहें घाघ सुनु भड्डरी, बरधा भीतर लाउ ॥ १५९ ॥
अर्थ: अगर उत्तर की ओर बिजली चमके और पूर्व दिशा से हवा बहे, तो घाघ कहते हैं—बैल को भीतर लाओ, पानी बरसना ही चाहता है।
बरसे मेघ झमझम करि धाये ॥ १६० ॥
अर्थ: वर्षाऋतु में अगर पहले पहल पूर्वी हवा चले तो बहुत ही उत्तम वृष्टि होगी।
वह बरसै यह करै भतार, कहै घाघ यह सगुन विचार ॥ १६१ ॥
अर्थ: अगर पूर्वा और पछुवाँ हवा एक साथ बहे, और स्त्री पर-पुरुष से हँसकर बात करे; तो घाघ कहते हैं—वह (हवा) पानी बरसाएगी और यह (स्त्री) व्यभिचार करेगी।
फिर नाहीं बरखा की आस ॥ १६२ ॥
अर्थ: जब ढेकी (पक्षी) आकाश में जाकर बोलने लगे तो बारिश होने की कोई आशा नहीं।
कहें घाघ जल कहाँ अमाय ॥ १६३ ॥
अर्थ: जब एक ओर की हवा दूसरी ओर की हवा में मिल जाए (बवंडर या टकराव), तो घाघ कहते हैं कि बहुत जोरों की वर्षा होगी।
तो सावन के आगम भले ॥ १६४ ॥
अर्थ: जब माघ-पूस के महीने में दक्षिणी हवा चले तो सावन में वर्षा की अच्छी आगम (संभावना) होती है।
फेर भरेगा अगली साल ॥ १६५ ॥
अर्थ: यदि पुष्य और पुनर्वसु नक्षत्रों के पानी से भी ताल न भर जाए तो फिर अगले साल ही भरने की आशा करनी चाहिये (सूखा पड़ेगा)।
घाघ कहै सुनु भड्डरी, पुहुमी खेती खोय ॥ १६६ ॥
अर्थ: अगर श्रावण शुक्ला सप्तमी को आकाश साफ रहे (बादल न हों), तो धरती खेती खो देती है अर्थात् अकाल पड़ता है।
तब कीजै बरखा की आस ॥ १६७ ॥
अर्थ: जब हवा का रुख एक ओर न होकर चारों तरफ (बौया) हो, तब वर्षा की आशा रखनी चाहिये।
घाघ कहैं सुनु भड्डरी, सबै किसान नसान ॥ १६८ ॥
अर्थ: अगर आर्द्रा नक्षत्र के शुरू में और हस्त नक्षत्र के आखिर में पानी न बरसे तो किसान नष्ट हो जाते हैं।
पूसै दुगुना, माघ सवाई । फागुन बरसै घर से जाई ॥ १६९ ॥
अर्थ: अगहन के अंत में बारिश हो तो देश धन्य है। पूस में दुगुना, माघ में सवाई लाभ होता है; पर फागुन में बरसे तो सब चौपट हो जाता है।
सगरी खेती जावे खोय ॥ १७० ॥
अर्थ: चित्रा नक्षत्र में वर्षा होने से सारी फसल बर्बाद हो जाती है (कीड़े लग जाते हैं)।
हथिया बरसै तीन खोय, कोदो तिल्ली और कपास ॥ १७१ ॥
अर्थ: हस्त नक्षत्र में पानी बरसने से ईख, धान, उड़द को लाभ होता है; पर कोदो, तिल्ली और कपास को हानि होती है।
कभी न बरसै बरखा आय ॥ १७२ ॥
अर्थ: दक्षिणी हवा के बहने से अन्य ऋतुओं में पानी बरस सकता है, लेकिन वर्षाऋतु में नहीं बरसता।
कहें घाघ फिर बरखा गया ॥ १७३ ॥
अर्थ: अगर रात को आसमान साफ रहे और दिन में बादल घिर आएं, तो समझो अब वर्षाऋतु खत्म हो गई।
चूल्हे के पाछे, उपजे सार ॥ १७४ ॥
अर्थ: यदि सावन में दो-चार दिन भी पछुवाँ हवा चल जाए, तो इतनी वर्षा होगी कि चूल्हे के पीछे भी धान उग आएगा।
जो बादर बादर पै धाय । कहें घाघ जल कहाँ अमाय ॥ १७५ ॥
अर्थ: कभी पुरवा, कभी पछुवाँ चले, बवंडर उठे और बादल पर बादल दौड़े, तो इतनी बारिश होगी कि जल समाएगा नहीं।
तहँ पानी की आस अकूता ॥ १७६ ॥
अर्थ: जिस जगह रामबाँस आसानी से जमीन में गड़ जाए, वहाँ अथाह पानी (भूमिगत जल) होता है।
कहें घाघ फिर बरखा नाहीं ॥ १७७ ॥
अर्थ: जब लगातार कभी धूप और कभी छाँह हो (घमछाहीं), तो वर्षा होने की आशा नहीं करनी चाहिये।
तो हरदम बरखा होय ॥ १७८ ॥
अर्थ: मृगशिरा नक्षत्र के तपने (गर्मी पड़ने) के बाद होने वाली वर्षा बहुत अच्छी होती है।
ये दोनों पछतायेंगे, पाहुन अरु गृहस्त ॥ १७९ ॥
अर्थ: आते समय आर्द्रा और जाते समय हस्त नक्षत्र न बरसे, तो गृहस्थ पछताता है (जैसे बिना आदर के मेहमान)।
फिर बरसेगा पाय असाढ़ ॥ १८० ॥
अर्थ: यदि पुष्य और पुनर्वसु में भी ताल न भरा, तो अब अगले आषाढ़ में ही भरेगा (सूखा पड़ेगा)।
नियर गुड़ासा नियरै पानी ॥ १८१ ॥
अर्थ: गुड़ासा (कीड़ा) दूर बोले तो बारिश दूर है, पास बोले तो बारिश करीब है।
बैठे घर किसान रिरियाय ॥ १८२ ॥
अर्थ: यदि हस्त में बरसे और चित्रा में बादल उमड़ते रहें, तो किसान खुशी से गीत गाते हैं।
अर्थ: चित्रा में बरसने पर मोथी, उड़द और ऊख - इन तीनों की हानि होती है।
अर्थ: सिंह नक्षत्र में बादलों के गरजने से हस्त नक्षत्र में वर्षा होती है।
घाघ कर्दै सुनु घाधिनी, स्वान भात नहिं खात्त ॥ १८५ ॥
अर्थ: रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपे और आर्द्रा में थोड़ी बारिश हो, तो इतनी उपज होगी कि कुत्ते भी भात खाकर ऊब जाएंगे।
भादों पछुवाँ माघे पाला ॥ १८६ ॥
अर्थ: चैत्र में पछुवाँ चलने से भादों में बारिश होती है। भादों में पछुवाँ चलने से माघ में पाला पड़ता है।
कहैं घाघ कुछ होनी होई, कुआँ के पानी धोबी धोई ॥ १८७ ॥
अर्थ: दिन में बादल, रात साफ और धीमी पुरवाई - यह अकाल का लक्षण है। धोबियों को कुएँ से पानी लेना पड़ेगा।
मेह साँझ या सकाली ॥ १८८ ॥
अर्थ: पूर्व दिशा (बंगाल की ओर) इन्द्रधनुष दिखे तो साँझ या सबेरे बारिश होगी।
तब घर में गेहूँ आवै ॥ १८९ ॥
अर्थ: हस्त नक्षत्र के आखिर (पूँछ) में वर्षा होने से गेहूँ की पैदावार अच्छी होती है।
भूखा न चाहे, फिर कुछ हर से ॥ १९० ॥
अर्थ: मघा में बरसने और माँ के परोसने पर पूर्ण तृप्ति मिलती है, फिर और कुछ नहीं चाहिए।
दूध-भात में परिगा मूसर ॥ १९१ ॥
अर्थ: मघा न बरसने से ऊसर भी सूख जाता है, चरागाह खत्म हो जाते हैं और दूध-भात दुर्लभ हो जाता है।
अर्थ: दिन की बदली और कंजूस का आदर - दोनों निरर्थक हैं (बरसता नहीं / देता नहीं)।
पछुवाँ बादर, पुरुब क जाय । पतरी खावै, पतरी बनाय ॥ १९३ ॥
अर्थ: बादल पूरब से पश्चिम जाए तो अच्छी बारिश (मोटी रोटी), पश्चिम से पूरब जाए तो सूखा (पतली रोटी)।
अर्थ: आर्द्रा में बरसने से 4 नक्षत्र और मघा में बरसने से 5 नक्षत्रों तक लगातार वर्षा होती है।
सकल बूंद सावन में दरै ॥ १९५ ॥
अर्थ: चैत में थोड़ी भी बारिश होने से सावन की पूरी बारिश मारी जाती है (सूखा पड़ता है)।
चरखा चले न बोले ताँती ॥ १९६ ॥
अर्थ: पुनर्वसु और स्वाति में वर्षा होने से कपास नष्ट हो जाती है, जिससे चरखा चलना बंद हो जाता है।
तब बनजारा लादै नोन ॥ १९७ ॥
अर्थ: जब दक्षिण-पश्चिम (हड़हवा) हवा चलती है, तब बारिश नहीं होती। बनजारे नमक लादने निकल पड़ते हैं।
हथिया गइले सबही जाय, आगिल पाछिल नास ॥ १९८ ॥
अर्थ: आर्द्रा (भद्रा) के जाने से सन, साठी, कपास जाते हैं; पर हस्त (हथिया) के बिना बरसने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।

