Ghagh Ki Kahawat: General Tips
कृषि सम्बन्धी अन्य कहावतें (भाग 2: 353-408)
तब चना बहुत ही गाजै ॥ ३५३ ॥
अर्थ: जब जुताई के समय बैलों की सैल (जुए की कील) ढेलों से टकराकर खटाखट बजे (यानी खेत में ढेले हों), तो चने की पैदावार बहुत अच्छी होती है।
बिन देखे हरिना खा जावै ॥ ३५४ ॥
अर्थ: खेती वही सफल है जिसकी निगरानी किसान खड़ा होकर (स्वयं) करता है। बिना देखे तो हिरण (जानवर) फसल खा जाते हैं।
आधा जेठ असाढ़ कहावै ॥ ३५५ ॥
अर्थ: मौसम का असर एक महीना पहले ही दिखने लगता है। आधा जेठ बीतने पर ही आषाढ़ जैसे लक्षण (बादल/हवा) दिखने लगते हैं।
अर्थ: गेहूँ बार-बार जोतने से, धान बिदाहने (गाहा) से और ईख बार-बार गुड़ाई करने से अच्छी होती है।
हर गया पताल, तो टूट गया काल ॥ ३५७ ॥
अर्थ: हल का फाल छोटा हो तो धरती हँसती है (उपज कम होती है)। यदि हल गहराई (पाताल) तक जाए, तो अकाल टूट जाता है (बंपर पैदावार होती है)।
अर्थ: हल से नौ बार जोतने का जो लाभ है, वह फावड़े (कसी) से एक बार गहरी खुदाई करने के बराबर है।
अर्थ: तीसी (अरसी) को नम (सरस) भूमि में और चने को सूखी (निरस) भूमि में बोना चाहिये।
तब रबी की फसल बोआवे ॥ ३६० ॥
अर्थ: जब बर्रें (ततैया) घर के बरामदे में आने लगें, तो समझ लो कि रबी की फसल बोने का समय आ गया है।
अर्थ: कपास की चुनाई (बीनना) और खेत की खुदाई (गुड़ाई) समय पर करनी चाहिए।
अर्थ: ईख में 'कना' रोग (रेशे लाल होना) क्यों लगता है? स्वाति नक्षत्र का पानी पड़ने से।
कुँदिया तोर उसर में धरना ॥ ३६३ ॥
अर्थ: मोथी और उड़द की खेती करना घाटे का सौदा है, जैसे मिट्टी का बर्तन फोड़कर ऊसर में फेंक देना।
सूखा परै कि बैल मरै ॥ ३६४ ॥
अर्थ: जब भाग्यहीन व्यक्ति खेती करता है, तो या तो सूखा पड़ जाता है या उसके बैल मर जाते हैं।
बेर चना गेहूँ गाडर ॥ ३६५ ॥
अर्थ: नीम ज्यादा फूले तो जौ, आक (मदार) फूले तो कोदो, बेर ज्यादा हों तो चना और गाडर (घास) ज्यादा हो तो गेहूँ अच्छा होता है।
अर्थ: दक्षिणी हवा खेती के लिए कुलच्छनी (हानिकारक) होती है, लेकिन पूस-माघ में चले तो सुलच्छनी (लाभदायक) होती है।
पूरब खेत, राजकर बाकी ॥ ३६७ ॥
अर्थ: तीन बैल, घर में दो चक्की (फूट), पूरब दिशा का खेत और लगान बाकी रहना - ये सब कष्टदायक हैं।
झटपट से आय के खा गया सफीफ ॥ ३६८ ॥
अर्थ: यदि आस-पास रबी की फसल हो और बीच में खरीफ बोई हो, तो कीड़े/जानवर उसे चट कर जाते हैं।
झुरावे जल को सातों खाँड़ा ॥ ३६९ ॥
अर्थ: अगर सात दिन तक बाँदा (दक्षिण-पश्चिमी) हवा चले, तो सातों खंड (पाताल तक) का पानी सूख जाता है।
जाय कहो अहिरा से, ऊँचे करे बँधान ॥ ३७० ॥
अर्थ: उत्तर में बिजली चमके और दक्षिण में बादल हों, तो भारी बारिश होगी। ग्वाले से कहो गायें ऊँचे स्थान पर बाँधे।
माघ सवाई, फागुन घर से जाई ॥ ३७१ ॥
अर्थ: अगहन में वर्षा से बहुत लाभ (हून), पूस में दुगुना, माघ में सवाई; लेकिन फागुन में वर्षा से मूलधन भी चला जाता है।
अर्थ: यदि सावन में शुक्र तारा अस्त रहे (न उगे), तो निश्चय ही अकाल पड़ता है।
अर्थ: पूस के महीने में बीज बोने से अच्छा है उसे पीसकर खा जाना (क्योंकि पूस में बोआई से कुछ पैदा नहीं होता)।
अर्थ: बहुत ज्यादा खेती करने वाला दूसरों (मजदूरों/महाजनों) के लिए कमाता है, थोड़ी और अच्छी खेती करने वाला अपने लिए कमाता है।
दस मन बिगहा मोसे लेवे ॥ ३७५ ॥
अर्थ: मेंड़ बाँधकर जो दस बार जुताई करता है, वह मुझसे (धरती से) प्रति बीघा दस मन अनाज ले सकता है।
अर्थ: धान को बिदाहने (घने पौधों को हल्का करने) और गेहूँ को बार-बार जोतने से लाभ होता है।
अर्थ: आषाढ़ में एक बार खेत क्यों नहीं जोता? अब बार-बार पछताने से क्या होगा (समय निकल गया)।
अर्थ: अलसी और चना ज्यादा जुताई नहीं माँगते; जैसे नीच आदमी एहसान नहीं मानता।
खानें वृढ़ जुवा होइ डोलै ॥ ३७९ ॥
अर्थ: बाजरा हँसकर कहता है कि मुझे खाने वाला बूढ़ा आदमी भी जवान होकर डोलने (चलने) लगता है।
अर्थ: जब कपास दो पत्ती की थी तब निराई क्यों नहीं की? अब (घास होने पर) बीनते समय क्यों घबरा रहे हो?
अर्थ: गेहूँ (पकने पर) गिर जाए तो दुर्भाग्य है (सड़ जाएगा), लेकिन धान गिरे तो सौभाग्य है (काटने में आसानी और पक गया)।
अर्थ: पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने से आधा धान और आधी भूसी मिलती है। समझदार किसान इसमें नहीं रोपते।
निकृष्ट खेती नौकर करै । बिगड़ गयी बलाय टरै ॥ ३८३ ॥
अर्थ: स्वयं की गई खेती 'उत्तम', भाई के साथ 'मध्यम' और नौकरों के भरोसे की गई खेती 'निकृष्ट' होती है (वे परवाह नहीं करते)।
तेकर मेहर कोठिला डारै ॥ ३८४ ॥
अर्थ: जो खेत को माघ में जोते, जेठ में तपाये और भादों में खाद-पानी दे; उसकी पत्नी कोठिला (भंडार) तैयार करती है (इतनी उपज होती है)।
जो तू बोते बिगहा चार । तो मैं देतू कोठिला फार ॥ ३८५ ॥
अर्थ: जई कहती है—मुझे आधे अगहन में क्यों नहीं बोया? अगर चार बीघा भी बोया होता, तो मैं कोठिला फाड़कर (बहुत अधिक) पैदा होती।
काली क दूध न भुअरी क मंठा ॥ ३८६ ॥
अर्थ: गले में कंठा (सफेद धारी) वाली भूरी भैंस का मट्ठा भी काली भैंस के दूध से बेहतर होता है (वह बहुत दूध देती है)।
अर्थ: स्वाती नक्षत्र लगने के सात दिन बाद धान पककर तैयार (उपाठ) हो जाता है।
अर्थ: खेती अपने बलबूते पर करो, नहीं तो मजदूरों/कर्जदारों के एहसान तले दबे रहोगे।
फिर राखौ रब्बी की डार ॥ ३८९ ॥
अर्थ: माघ में खेत की झाड़-झंखाड़ साफ कर दो, तभी रबी की अच्छी फसल की आशा रखो।
तब पियो माँड़ का कुरबा ॥ ३९० ॥
अर्थ: जब पुरवा हवा चलती है तो धान की फसल अच्छी होती है और खूब माँड़ पीने को मिलता है।
अर्थ: सावन सूखा रहने पर धान (कम वर्षा में होने वाले) और भादों सूखा रहने पर गेहूँ अच्छा होता है।
मघा में काँदो डार ॥ ३९२ ॥
अर्थ: चित्रा में हल्की जुताई, आश्लेषा में अच्छी जुताई और मघा में खाद/कीचड़ (काँदो) करके धान रोपना चाहिए।
अर्थ: मेष संक्रांति (वैशाख) आने तक खेत में फसल नहीं रहनी चाहिए (कट जानी चाहिए)।
बैल तेरे क्या लै गये चोर ॥ ३९४ ॥
अर्थ: अगहन में ईख की जुताई (कोर) क्यों नहीं की? क्या बैल चोर ले गए थे? (अगहन में जुताई बहुत जरूरी है)।
ऊख कमाये ॥ ३९५ ॥
अर्थ: चना खोंटने से, गेहूँ जोतने से, धान पानी देने से, मक्का निराने से और ईख सेवा (कमाने) से अच्छी होती है।
लगत सेवाती झोंपा झूल ॥ ३९६ ॥
अर्थ: हस्त नक्षत्र में धान में गाभ (हाथ-पाँव) आता है, चित्रा में फूल और स्वाती लगते ही बालें (झोंपा) झूलने लगती हैं।
अर्थ: अगहन में बोने से बहुत थोड़ा अनाज (लवा) मिलता है।
अर्थ: गेहूँ (माहा) 10 जुताई में और ईख (गाड़ा) 20 जुताई में अच्छी होती है।
अर्थ: गेहूँ के लिए मिट्टी मैदे जैसी महीन और चने के लिए ढेलेदार होनी चाहिए।
अर्थ: पश्चिम (पलुवाँ) का बादल झूठा होता है (बरसता नहीं), जैसे नीच का आदर झूठा होता है।
अर्थ: कुम्भ से मीन संक्रांति तक गेहूँ में गेरुई रोग लगता है और पाला उसे खा जाता है।
अर्थ: यदि अच्छा जौ चाहिए तो उत्तरा नक्षत्र में कच्चे खेत को पकाकर जोतते रहना चाहिए।
फुली घास दुःख देत किसान । बामे होय आन का तान ॥ ४०३ ॥
अर्थ: अच्छी जुताई से गेहूँ, कुश वाले खेत में धान अच्छा होता है। पर 'फुली' घास किसान को बहुत दुख देती है।
बिगड़ै केकी ? घर बैठे पूछे तेकी ॥ ४०४ ॥
अर्थ: खेती उसकी उत्तम है जो खुद करता है। जो केवल देखता है उसकी आधी है। और जो घर बैठे पूछता है, उसकी खेती बिगड़ जाती है।
अर्थ: बिना पानी वाली (बेपनियाँ) खेती तभी करो जब खेत में कुआँ खुदा हो (सिंचाई का साधन हो)।
अर्थ: जो दिवाली के दिन बोआई करता है, उसका दिवाला निकल जाता है (फसल नहीं होती)।
अर्थ: खेती में ईख (गन्ना) और व्यापार में हाथी का व्यापार सबसे बड़ा और लाभदायक है।
इसी रीति से जो चलै, घाटा कबहूँ न खाय ॥ ४०८ ॥
अर्थ: खेती थोड़ी करो पर मेहनत ज्यादा करो। जो इस नियम से चलता है, वह कभी घाटा नहीं खाता।

