Jeete Ji Shraadh: A Heart Touching Poem on Parents (Maa Baap ka Samman)

Sooraj Krishna Shastri
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जीते जी श्राद्ध?

एक पुत्र का अनोखा प्रस्ताव
🔍 कविता का मर्म (भाव-विश्लेषण)
यह कविता समाज की उस विडंबना पर करारा प्रहार है जहाँ माता-पिता के जीवित रहते उनकी उपेक्षा की जाती है, परंतु मृत्यु के पश्चात 'दिखावे' के लिए भव्य श्राद्ध किए जाते हैं। यहाँ 'जीते जी श्राद्ध' का अर्थ है—जीवित रहते हुए माता-पिता की इच्छाओं की पूर्ति करना, उन्हें समय देना और उनका सम्मान करना, ताकि उनकी आत्मा 'जीते-जी' तृप्त हो सके।
माँ पिता जी की 40वीं वैवाहिक वर्षगांठ का समारोह था,
किंतु ज्येष्ठ पुत्र के मन में भयंकर ऊहापोह था।
कार्यक्रम के अंत में सब युगल के लिए दो शब्द बोल रहे थे,
अपने भावों को सीमित शब्दों में तौल रहे थे।
अब बड़े पुत्र की बारी थी,
सबको उम्मीदें, उस से बड़ी भारी थी।
ज्येष्ठ ने कहना शुरू किया, भावों में बहना शुरू किया—
"क्योंकि मैं सबसे बड़ा हूं, कर्तव्य की पायदान पर सबसे उपर खड़ा हूं,
खुद को परखना चाहता हूं, एक प्रस्ताव रखना चाहता हूं..."
"क्यों न माँ बाबू जी के जीते जी उनका श्राद्ध मनाया जाए?"
जीते जी श्राद्ध ????
सबके चेहरों पर क्रोध और विस्मय का भाव था,
किंतु दूसरी तरफ बड़े भाई का दबाव था।
आत्मज जारी रहा...
"हफ्ते में कम से कम एक बार उन्हे स्वादिष्ट, लज़ीज़, मनपसंद भोजन कराया जाए।
कम नमक या ज्यादा मीठा उसकी चिंता किए बिना
उन्हे वो खिलाया जाए, जिस से उनकी आत्मा तृप्त हो जाए।"
"उनके उपरांत विभिन्न पशु पक्षियों में उन्हे ढूंढने की बजाय,
जीते जी उन्हे खास महसूस कराया जाए।
घर के बच्चों को उनके रहते उनका आदर करना सिखाया जाए।"
"क्यों न हर महीने अभी से उन्हे एक नई पोशाक में सजाया जाए
और प्रतिदिन उनकी आरती उतारकर
उन्हे हर घर का जीता जागता भगवान बनाया जाए।"
माहौल में अचानक चुप्पी छा गई, किसी को कुछ समझ नही आया,
तभी पिता जी उठे और उन्होंने पुत्र को कस के गले लगाया।

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