Kya RSS Rashtra Virodhi Hai? Namaste Sada Vatsale Prarthana ka Asli Sach

Sooraj Krishna Shastri
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क्या RSS की विचारधारा राष्ट्र विरोधी है?

आक्षेपों का उत्तर: तर्कों से नहीं, प्रार्थना से

वर्तमान समय में अक्सर कुछ विशेष विचारधाराओं द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर 'राष्ट्र विरोधी' या 'संविधान विरोधी' होने के आरोप लगाए जाते हैं। लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, किंतु किसी संस्था के मूल चरित्र को जाने बिना उस पर निर्णय सुना देना उचित नहीं है।

किसी भी संगठन की आत्मा उसके 'संविधान' या उसकी 'पुस्तकों' से अधिक, उसकी दैनिक प्रार्थना में बसती है। वह प्रार्थना, जिसे एक स्वयंसेवक बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, प्रतिदिन अपनी शाखा में, ध्वज के सामने नतमस्तक होकर दोहराता है।

यदि आप जानना चाहते हैं कि संघ भारत के लिए क्या चाहता है, तो आपको संघ की प्रार्थना 'नमस्ते सदा वत्सले' के एक-एक शब्द को पढ़ना होगा। यह प्रार्थना किसी सत्ता, पद या राजनीति की मांग नहीं करती, यह केवल और केवल मातृभूमि के परम वैभव की कामना करती है।

नीचे संघ की पूर्ण प्रार्थना और उसका हिंदी अर्थ दिया गया है। इसे पढ़िए और स्वयं निर्णय कीजिये।

।। संघ प्रार्थना ।।
श्लोक १
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।। १ ।।
हिंदी भावार्थ: हे वात्सल्यमयी मातृभूमि! आपको सदा प्रणाम है। हे हिन्दूभूमि! आपने सुखपूर्वक मेरा पालन-पोषण किया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! आपके ही कार्य के लिए मेरा यह शरीर (काय) अर्पित हो। आपको बारम्बार प्रणाम है।
श्लोक २
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्ग भूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्
सुशीलं जगद्‌येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमार्ग
स्वयं स्वीकृतं नः सुग‌ङ्कारयेत् ।। २ ।।
हिंदी भावार्थ: हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! इस हिन्दू राष्ट्र के एक अंग (घटक) के रूप में हम आपको सादर प्रणाम करते हैं। आपके ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उस कार्य की पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीष प्रदान करें।

हे प्रभु! हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये जिसे विश्व की कोई भी शक्ति न जीत सके, और ऐसा विशुद्ध शील (चरित्र) दीजिये जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो सके। हमें ऐसा ज्ञान दें कि स्वयं के द्वारा स्वीकारा गया यह काँटों भरा (कठिन) मार्ग हमारे लिए सुगम हो जाए।
श्लोक ३
समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्र
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।। ३ ।।
हिंदी भावार्थ: आध्यात्मिक और सांसारिक उन्नति का एकमात्र श्रेष्ठ साधन 'वीरव्रत' है, (हे प्रभु) वह हमारे अंदर स्फुरित हो। हमारे हृदय में कभी नष्ट न होने वाली ध्येय-निष्ठा निरंतर (दिन-रात) जागृत रहे।

आपकी कृपा से हमारी यह संगठित कार्यशक्ति (संघ शक्ति) धर्म की रक्षा करते हुए, इस राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर ले जाने में पूरी तरह समर्थ हो।
।। भारत माता की जय ।।

निष्कर्ष: विरोध या अज्ञानता?

इस प्रार्थना के अंतिम शब्दों पर ध्यान दीजिये— "परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्र"

संघ का स्वयंसेवक न तो अपने लिए स्वर्ग मांग रहा है, न धन, और न ही सत्ता। वह मांग रहा है तो केवल अपने राष्ट्र का 'परम वैभव'। वह ईश्वर से शक्ति मांग रहा है, लेकिन हिंसा के लिए नहीं, बल्कि "धर्मस्य संरक्षणम्" (धर्म की रक्षा) के लिए। वह मांग रहा है "सुशीलं" (अच्छा चरित्र), जिससे दुनिया प्रभावित होकर नमन करे, न कि डंडे के जोर पर।

जो विचारधारा अपने अनुयायियों को प्रतिदिन यह याद दिलाती हो कि "मेरा शरीर मातृभूमि के लिए ही गिरे (पतत्वेष कायो)", उस विचारधारा को 'राष्ट्र विरोधी' कहना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह उस त्याग का अपमान है जो लाखों स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं।

आवश्यकता है कि संघ को सुनी-सुनाई बातों से नहीं, बल्कि उसके मूल भाव और साहित्य से समझा जाए।

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