कर्मों की दौलत: जब करोड़ों का सोना भी एक रोटी न खरीद सका | King & Hidden Treasure Story

Sooraj Krishna Shastri
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कर्मों की दौलत

"सोना, चांदी और हीरे नहीं, अंत में कर्म ही साथ जाते हैं"

गुप्त खजाना और राजा का मोह
एक राजा था, जिसने अपनी प्रजा पर क्रूरता करके बहुत-सी दौलत इकट्ठी की थी। उसने अपने इस शाही खजाने को शहर से दूर जंगल में एक गुप्त तहखाने में छिपा रखा था।
सुरक्षा: उस खजाने की केवल दो चाबियां थीं—एक राजा के पास और दूसरी उसके सबसे खास मंत्री के पास। इसके अलावा किसी को उस जगह का भेद नहीं मालूम था।
दरवाजा बंद हो गया
एक दिन राजा बिना किसी को बताए अकेले अपने खजाने को निहारने गया। वह अंदर गया और दरवाजा खुला छोड़कर हीरों की चमक में खो गया।
संयोग: उसी वक्त मंत्री वहां से गुजरा। उसने देखा कि तहखाने का दरवाजा खुला है। उसने सोचा, "शायद कल रात मैं गलती से इसे खुला छोड़ गया था।" सुरक्षा की दृष्टि से उसने तुरंत दरवाजा बाहर से लॉक कर दिया और चला गया।
इधर राजा जब धन देखकर तृप्त हुआ और बाहर जाने लगा, तो पाया कि दरवाजा बंद है। उसने बहुत चीखा, दरवाजा पीटा, लेकिन जंगल के सन्नाटे में उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई न था।
हीरों से भीख: पानी और रोटी
समय बीतता गया। राजा भूख और प्यास से तड़पने लगा। वह पागलों की तरह रेंगता हुआ हीरों के संदूक के पास गया।
उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा - "ऐ दुनिया के नायाब हीरों! मुझे एक गिलास पानी दे दो।"
फिर वह सोने-चांदी के ढेर के पास गया - "ऐ शाही खजाने! मुझे बस एक वक्त का खाना दे दो।"
उस पल राजा को लगा जैसे वह निर्जीव धन उस पर हंस रहा हो और कह रहा हो - "तेरी सारी जिंदगी की कमाई तुझे एक घूंट पानी तक नहीं दे सकती।"
दीवार पर लिखा अंतिम सत्य
जब राजा को लगा कि अब मृत्यु निकट है, तो उसने हीरों का बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया। वह दुनिया को एक संदेश देना चाहता था, पर कलम नहीं थी। उसने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और दीवार पर अपने खून से कुछ लिखा।
"ये सारी दौलत, हीरे और जवाहरात मिलकर भी मुझे एक घूंट पानी और एक निवाला नहीं दे सके।"

(राजा का अंतिम संदेश)

कई दिनों बाद जब मंत्री राजा को ढूंढते हुए वहां पहुंचा, तो उसने देखा कि राजा करोड़ों के हीरों पर मरा पड़ा है और कीड़े-मकोड़े उसकी लाश को खा रहे हैं।

💡 जीवन का सार

यही जीवन का अंतिम सत्य है। आखिरी समय में आपके साथ आपके 'कर्मों की दौलत' ही जाएगी।

चाहे आप कितनी भी बेईमानी से धन इकट्ठा कर लें, सब यहीं धरा रह जाएगा। इसलिए जो जीवन प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है, उसमें निस्वार्थ भाव से लोगों की भलाई करें। वही असली दौलत है जो लोक और परलोक दोनों में काम आएगी।

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