तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥
प्रस्तावना: समय का अनंत प्रवाह
सृष्टि के कण-कण में जो एक तत्व सबसे अधिक रहस्यमयी और निरंतर गतिशील है, वह है 'काल' (समय)। सामान्य मनुष्य की दृष्टि सीमित है; वह केवल वर्तमान के एक छोटे से अंश को देख पाता है। अतीत उसकी स्मृति में धुंधला हो जाता है और भविष्य अज्ञान के अंधेरे में छिपा होता है। किन्तु, अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था और ईश्वरीय सत्ता इस सीमा से परे है। इसी अवस्था को परिभाषित करती है गोस्वामी तुलसीदास जी की यह चौपाई:
इस विस्तृत लेख में हम इस चौपाई के संदर्भ, इसके दार्शनिक अर्थ और ईश्वरीय सर्वज्ञता के विभिन्न आयामों पर चर्चा करेंगे।
संदर्भ सहित व्याख्या
संदर्भ (Context):
यह चौपाई 'श्रीरामचरितमानस' के अयोध्या काण्ड से ली गई है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ वनवास के लिए निकलते हैं, तो वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचते हैं। प्रभु श्रीराम, जो स्वयं परमब्रह्म परमात्मा हैं, अपनी लीला के अंतर्गत मानवीय मर्यादा का पालन करते हुए एक जिज्ञासु की भांति महर्षि वाल्मीकि से पूछते हैं कि उन्हें वन में निवास करने के लिए कौन सा स्थान उचित होगा।
इस प्रसंग में श्रीराम महर्षि वाल्मीकि की स्तुति करते हुए कहते हैं कि हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं।
भावार्थ (Meaning):
श्रीराम कहते हैं— "हे मुनियों के स्वामी! आप भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों को देखने वाले (त्रिकालदर्शी) हैं। यह सम्पूर्ण विश्व आपके हाथ में रखे हुए एक बेर (बदर) के समान है।"
विश्लेषण (Analysis):
यहाँ 'बदर' (बेर) का उपमा-अलंकार अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक है। यदि कोई व्यक्ति अपनी हथेली पर एक छोटा सा बेर रख ले, तो वह उस बेर के हर हिस्से—ऊपर, नीचे, चारों ओर—को एक साथ, एक ही दृष्टि में देख सकता है। उसे बेर के पीछे का हिस्सा देखने के लिए घूमने की आवश्यकता नहीं है।
ठीक इसी प्रकार, जो त्रिकालदर्शी महापुरुष या स्वयं ईश्वर हैं, उनके लिए यह अनंत ब्रह्मांड और इसका तीनों कालों का विस्तार एक छोटे से बेर के समान 'हस्तामलक' (हाथ में रखे आंवले जैसा स्पष्ट) है। उनके लिए न कुछ छिपा है, न कुछ दूर है और न ही कुछ अज्ञात है।
काल-चक्र: भूत, वर्तमान और भविष्य का विज्ञान
समय को हम तीन खंडों में विभाजित करते हैं, परन्तु तात्विक दृष्टि से समय एक अखंड प्रवाह है।
1. वर्तमान: अतीत और भविष्य का सेतु
जैसा कि आपने अपने विचार में उल्लेख किया— "वर्तमान में हम जो भी करते हैं उसका बुनियाद अतीत हो जाता है और परिणाम भविष्य में आते हैं।" यह कर्म के विज्ञान का मूल सूत्र है।
वर्तमान क्षण स्वतंत्र नहीं है। यह अतीत के कर्मों, विचारों और संस्कारों का परिणाम है। हम आज जो हैं, वह कल के निर्णयों का फल है। इसी प्रकार, हम इस क्षण जो बीज बो रहे हैं, वही भविष्य का वृक्ष बनेगा।
एक त्रिकालदर्शी व्यक्ति या ईश्वर केवल घटना को नहीं देखता, वह उस 'सूत्र' को देखता है जो तीनों कालों को पिरोता है। वह बीज में वृक्ष को और वृक्ष में भविष्य के बीज को एक साथ देखने की क्षमता रखता है।
2. क्षण भंगुरता और निरंतरता
प्रत्येक क्षण जो अभी 'भविष्य' था, वह एक पल में 'वर्तमान' बना और अगले ही पल 'भूतकाल' हो गया। यह प्रक्रिया इतनी तीव्र है कि सामान्य बुद्धि इसे पकड़ नहीं पाती। लेकिन जो चेतना 'काल' से ऊपर उठ जाती है (कालातीत), उसके लिए यह विभाजन समाप्त हो जाता है। ईश्वर के लिए सृष्टि का आदि, मध्य और अंत एक चलचित्र (Movie) की रील की तरह एक साथ मौजूद है।
ईश्वर की सर्वज्ञता: वेदों और गीता का प्रमाण
ईश्वर केवल काल का साक्षी नहीं, बल्कि काल का रचयिता भी है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को अपनी सर्वज्ञता का परिचय दिया है।
व्याख्या: भगवान घोषणा करते हैं— "हे अर्जुन! मैं अतीत में जो कुछ हो चुका है, वर्तमान में जो हो रहा है और भविष्य में जो होने वाला है, उन सबको जानता हूँ। किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।"
यहाँ दो मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- असीमित स्मृति (Infinite Memory): मनुष्य की स्मृति छिद्रयुक्त घड़े के समान है। हम बचपन की बातें भूल जाते हैं, पूर्व जन्म की बातें तो दूर की बात है। लेकिन ईश्वर 'सर्वज्ञ' हैं। उनके पास ब्रह्मांड की प्रत्येक आत्मा के अनंत जन्मों का 'क्लाउड डेटा' (संचित कर्म) सुरक्षित है। एक चींटी के चलने से लेकर आकाशगंगाओं के टकराने तक, हर घटना उनकी चेतना में दर्ज है। इसी आधार पर वे कर्मफल का विधान रचते हैं। यदि ईश्वर को हमारा अतीत याद न रहे, तो कर्म का सिद्धांत ही ध्वस्त हो जाएगा।
- ईश्वर की अज्ञेयता (The Unknowable God): भगवान कहते हैं कि 'मैं सबको जानता हूँ, पर मुझे कोई (अपनी सीमित बुद्धि से) नहीं जानता।' यह एक विरोधाभास लगता है, किन्तु सत्य है। एक पात्र (बर्तन) सागर को अपने में नहीं समा सकता। हमारी बुद्धि एक छोटा पात्र है, और ईश्वर अनंत सागर।
तर्क की सीमा और 'अतर्क्य' स्वरूप
आपने बहुत ही सटीक पंक्ति उद्धृत की है:
तर्क की विफलता:
तर्क (Logic) हमेशा 'द्वैत' (Duality) पर काम करता है। तर्क के लिए एक 'ज्ञाता' और एक 'ज्ञेय' (जानने योग्य वस्तु) का होना आवश्यक है। लेकिन ईश्वर द्वैत से परे 'अद्वैत' सत्ता है।
वैदिक शास्त्र स्पष्ट करते हैं— 'नैषा तर्केण मतिरापनेया'। अर्थात्, उस परम सत्य को तर्क-वितर्क द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
मन और वाणी भौतिक आकाश से बने हैं, जबकि ईश्वर 'चिदाकाश' (चेतना का आकाश) हैं।
- मन केवल वहीं तक सोच सकता है जहाँ तक उसने देखा या सुना है।
- बुद्धि केवल उपलब्ध आंकड़ों (Data) का विश्लेषण कर सकती है।
- वाणी केवल शब्दों का जाल बुन सकती है।
चूँकि ईश्वर इन तीनों के स्रोत हैं, इसलिए ये तीनों स्रोत को नहीं पकड़ सकते। जैसे सूर्य की किरण टॉर्च लेकर सूर्य को खोजने नहीं जा सकती, वैसे ही मन ईश्वर को नहीं खोज सकता।
शक्ति-जागरण और दिव्य दृष्टि
प्रश्न उठता है कि यदि बुद्धि और तर्क से ईश्वर को नहीं जाना जा सकता, तो क्या उन्हें जानना असंभव है?
उत्तर है— नहीं। उन्हें जानने का तरीका भिन्न है। वह तरीका है— शक्ति जागरण और कृपा।
1. घट-घट वासी:
ईश्वर कहीं सातवें आसमान पर नहीं बैठे। वे 'जन-जन' में व्याप्त हैं। शक्ति हर आत्मा के भीतर सुप्त अवस्था में है। आवश्यकता केवल उसे जगाने की है। जिसे हम 'त्रिकालदर्शिता' कहते हैं, वह वास्तव में चेतना का विस्तार ही है।
2. संजय और दिव्य दृष्टि:
महाभारत का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर या सद्गुरु की कृपा से स्थूल शरीर की सीमाएँ टूट जाती हैं। संजय धृतराष्ट्र के महल में बैठे थे, कुरुक्षेत्र मीलों दूर था। बीच में दीवारें थीं, शोर था, दूरी थी। लेकिन महर्षि व्यास की कृपा ने संजय को 'दिव्य चक्षु' (Wi-Fi of Consciousness) प्रदान किए।
संजय ने न केवल युद्ध देखा, बल्कि भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकली गीता सुनी और उस 'विराट स्वरूप' का दर्शन भी किया, जिसे देखना देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। यह सिद्ध करता है कि "आसन पर आसीन होकर भी विश्व दर्शन किये जा सकते हैं।" यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि उच्च आध्यात्मिक विज्ञान है।
प्राप्ति का उपाय: भक्ति और शरणागति
जब सारे द्वार बंद हो जाते हैं, तब 'प्रेम' का द्वार खुलता है। भगवान ने स्वयं अपनी प्राप्ति का रहस्य खोला है:
1. केवल प्रेम (Only Love):
भगवान कहते हैं, "केवल भक्ति के द्वारा ही मुझे तत्व से जाना जा सकता है।"
ज्ञान अहंकार पैदा कर सकता है। तर्क संशय पैदा कर सकता है। लेकिन भक्ति 'समर्पण' पैदा करती है। जब भक्त कहता है— "हे नाथ! मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं, आप जैसे भी हैं, मेरे हैं और मैं आपका हूँ।"—तभी ईश्वर का रहस्य खुलता है।
2. प्रवेश (Merging):
श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है— "विशते तदनन्तरम्"। अर्थात्, जानने के बाद भक्त मुझमें प्रवेश कर जाता है।
ईश्वर को जानने का अर्थ है—ईश्वर हो जाना।
जिस प्रकार नमक की पुतली सागर की गहराई नापने गई और गलकर सागर ही बन गई, उसी प्रकार जब जीव ईश्वर को जानने चलता है, तो उसका क्षुद्र अहं (Ego) गल जाता है। जब 'मैं' मिट जाता है, तो केवल 'वह' बचता है। यही वास्तविक त्रिकालदर्शिता है। जब आप परमात्मा से एक हो जाते हैं, तो परमात्मा का ज्ञान आपका ज्ञान हो जाता है।

