Principles of Child Development (बाल विकास के सिद्धांत) - Complete Notes for CTET & REET

Sooraj Krishna Shastri
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बाल विकास के सिद्धांत
(Principles of Child Development)

बाल विकास एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो यादृच्छिक (Random) न होकर कुछ निश्चित नियमों का पालन करती है। इन नियमों को समझने से शिक्षक और अभिभावक यह जान पाते हैं कि बालक के विकास की दिशा क्या होगी और उनसे किस उम्र में क्या अपेक्षा करनी चाहिए। नीचे सभी प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन उनके मनोवैज्ञानिक संदर्भ और प्रवर्तकों के साथ दिया गया है।

1. निरंतरता का सिद्धांत (Principle of Continuity)

समर्थक: बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner)

यह सिद्धांत बताता है कि विकास एक सतत (Continuous) प्रक्रिया है जो गर्भधारण (Conception) से शुरू होकर मृत्यु (Death) तक चलती है। यह कभी नहीं रुकती, हालांकि इसकी गति कभी धीमी तो कभी तेज हो सकती है।

  • व्याख्या: स्किनर के अनुसार, विकास में कोई आकस्मिक उछाल नहीं आता। जिस तरह एक पेड़ का बढ़ना रातों-रात नहीं होता, वैसे ही बच्चे में परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं।
  • उदाहरण: एक बच्चे की भाषा का विकास अचानक नहीं होता। वह पहले रोता है, फिर ध्वनियां निकालता है (Babbling), फिर एक शब्द बोलता है, और अंत में वाक्यों का निर्माण करता है।
  • महत्व: यह सिद्धांत शिक्षकों को धैर्य रखने की शिक्षा देता है।

2. व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धांत (Principle of Individual Differences)

जनक: सर फ्रांसिस गाल्टन (Sir Francis Galton)

यद्यपि विकास का क्रम सभी बच्चों में समान होता है, लेकिन विकास की दर (Rate) और स्वरूप अलग-अलग होता है। सर फ्रांसिस गाल्टन ने अपनी पुस्तक "Hereditary Genius" (1869) में सिद्ध किया कि कोई भी दो व्यक्ति, यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चे भी, पूर्णतः समान नहीं होते।

  • डग्लस और हॉलैंड का कथन: "विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति में भिन्नता होती है और यह भिन्नता जीवन भर बनी रहती है।"
  • उदाहरण: एक बच्चा 10 महीने में चलना सीख सकता है, जबकि दूसरा 14 महीने में। दोनों ही सामान्य हैं, यह केवल व्यक्तिगत भिन्नता है।
  • शैक्षिक निहितार्थ: शिक्षक को कभी भी दो बच्चों की तुलना (Comparison) नहीं करनी चाहिए और न ही पूरी कक्षा को एक ही लाठी से हांकना चाहिए।

3. विकास की दिशा का सिद्धांत (Principle of Developmental Direction)

जनक: अर्नाल्ड गेसेल (Arnold Gesell) - परिपक्वता सिद्धांत

विकास बेतरतीब नहीं होता, बल्कि यह एक निश्चित दिशा का पालन करता है। अर्नाल्ड गेसेल और भारतीय मनोवैज्ञानिक बी. कुप्पुस्वामी ने शारीरिक विकास की दो निश्चित दिशाएं बताई हैं:

क) सिफेलोकूडल (Cephalocaudal) - शीर्षाभिमुख:
इसका अर्थ है 'सिर से पैर की ओर'। गर्भ में पहले सिर विकसित होता है। जन्म के बाद भी बच्चा पहले सिर को संभालना सीखता है, फिर धड़ (कंधे/पीठ) को, और अंत में पैरों पर नियंत्रण पाता है।
ख) प्रॉक्सिमोडिस्टल (Proximodistal) - समीपाभिमुख:
इसका अर्थ है 'केंद्र से बाहर की ओर'। विकास शरीर के मध्य भाग (रीढ़ की हड्डी) से शुरू होकर बाहरी अंगों (भुजाएं, फिर हाथ, फिर उंगलियां) की ओर बढ़ता है।

4. सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं का सिद्धांत (Principle of General to Specific Responses)

समर्थक: ई.बी. हरलोक (E.B. Hurlock)

विकास हमेशा सामान्य (General) प्रतिक्रियाओं से शुरू होकर विशिष्ट (Specific) कौशल की ओर बढ़ता है। हरलोक का मानना था कि परिपक्वता के साथ व्यवहार परिष्कृत होता जाता है।

  • व्याख्या: नवजात शिशु किसी भी उत्तेजना के प्रति पूरे शरीर से प्रतिक्रिया देता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी प्रतिक्रियाएं केवल संबंधित अंग तक सीमित हो जाती हैं।
  • उदाहरण (पकड़ना): छोटा बच्चा किसी खिलौने को पकड़ने के लिए पूरा शरीर और दोनों हाथ फेंकता है (सामान्य क्रिया), लेकिन बाद में वह केवल उंगलियों का प्रयोग करके उसे उठा लेता है (विशिष्ट क्रिया)।

5. एकीकरण का सिद्धांत (Principle of Integration)

समर्थक: कुप्पुस्वामी (Kuppuswamy)

यह सिद्धांत 'सामान्य से विशिष्ट' का अगला चरण है। विशिष्ट अंगों का उपयोग सीखने के बाद, बच्चा उन्हें आपस में जोड़ना या एकीकृत (Integrate) करना सीखता है। कुप्पुस्वामी ने इसे 'पूर्ण से अंश' और 'अंश से पूर्ण' के समन्वय के रूप में समझाया है।

  • उदाहरण: साइकिल चलाते समय बच्चा एक साथ कई काम करता है—हाथों से हैंडल संभालना, पैरों से पैडल मारना, और आँखों से रास्ता देखना। इन अलग-अलग क्रियाओं का एकीकरण ही विकास है।

6. परस्पर संबंध का सिद्धांत (Principle of Interrelation)

समर्थक: गैरीसन (Garrison)

विकास के सभी आयाम (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक) एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। गैरीसन के अनुसार, "बालक का शरीर, मन और व्यक्तित्व एक दूसरे के ताने-बाने में बुना हुआ है।"

  • व्याख्या: यदि एक पक्ष प्रभावित होता है, तो दूसरे पक्ष भी अछूते नहीं रहते।
  • उदाहरण: जिस बच्चे का शारीरिक स्वास्थ्य खराब है, उसका संवेगात्मक व्यवहार (चिड़चिड़ापन) बिगड़ेगा और अंततः उसकी पढ़ाई (संज्ञानात्मक विकास) में भी बाधा आएगी।

7. वर्तुलाकार बनाम रेखीय विकास (Development is Spiral, not Linear)

संदर्भ: जेरोम ब्रूनर (सर्पिल पाठ्यक्रम अवधारणा)

विकास कभी भी एक सीधी रेखा (Linear) में, बुलेट ट्रेन की तरह नहीं चलता। यह स्प्रिंग की तरह वर्तुलाकार (Spiral) होता है।

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  • व्याख्या: बच्चा विकास की एक अवस्था में तेजी से आगे बढ़ता है, फिर वह कुछ समय के लिए रुकता है (विश्राम लेता है)। यह विश्राम काल इसलिए होता है ताकि वह प्राप्त किए गए विकास को मजबूत (Consolidate) कर सके। मजबूती मिलने के बाद ही वह अगली छलांग लगाता है।

8. परिपक्वता और अधिगम की अन्तःक्रिया (Interaction of Maturation and Learning)

प्रवर्तक: अर्नाल्ड गेसेल (परिपक्वता)

विकास दो शक्तियों का परिणाम है: परिपक्वता (Maturation) और अधिगम (Learning)।

  • परिपक्वता: यह आनुवंशिक रूप से निर्धारित जैविक विकास है (जैसे दांत आना, मांसपेशियों का कड़ा होना)। यह स्वतः होता है।
  • अधिगम: यह वातावरण, अभ्यास और प्रयास से प्राप्त होता है।
  • सिद्धांत: परिपक्वता सीखने के लिए सीमा रेखा तय करती है। उदाहरण के लिए, 3 महीने के बच्चे को चलना नहीं सिखाया जा सकता क्योंकि उसके पैर परिपक्व नहीं हैं।

9. वंशानुक्रम और वातावरण की अन्तःक्रिया (Principle of Heredity & Environment)

प्रवर्तक: आर.एस. वुडवर्थ (R.S. Woodworth)

विकास न तो केवल प्रकृति (Nature/Heredity) है और न ही केवल पोषण (Nurture/Environment)। वुडवर्थ ने इसका प्रसिद्ध समीकरण दिया:

विकास = वंशानुक्रम × वातावरण
(Development = Heredity × Environment)
  • व्याख्या: वुडवर्थ का मानना था कि यह संबंध योगात्मक (+) नहीं बल्कि गुणात्मक (×) है। बिना बीज (वंशानुक्रम) के फसल नहीं हो सकती और बिना खाद-पानी (वातावरण) के बीज नहीं पनप सकता।
  • जे.बी. वॉटसन का मत: वॉटसन वातावरण को अधिक महत्व देते थे। उन्होंने कहा था, "मुझे एक दर्जन स्वस्थ शिशु दो, मैं उन्हें डॉक्टर, वकील या चोर कुछ भी बना सकता हूँ।"

10. पूर्व-कथनीयता का सिद्धांत (Principle of Predictability)

चूँकि विकास एक सार्वभौमिक पैटर्न और दिशा का पालन करता है, इसलिए हम बच्चे के भविष्य के विकास का काफी हद तक पूर्वानुमान (Predict) लगा सकते हैं।

  • उदाहरण: कलाई की हड्डियों का एक्स-रे (X-Ray) देखकर डॉक्टर यह बता सकते हैं कि वयस्क होने पर बच्चे की अनुमानित लंबाई क्या होगी। इसी प्रकार बुद्धि परीक्षणों से अकादमिक सफलता का अनुमान लगाया जा सकता है।

11. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ का सिद्धांत

प्रवर्तक: लेव वायगोत्स्की (Lev Vygotsky)

आधुनिक बाल विकास में इस सिद्धांत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वायगोत्स्की के अनुसार, विकास शून्य में नहीं होता।

  • सिद्धांत: विकास सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) का प्रतिफल है। बच्चा समाज और संस्कृति के साथ अंतःक्रिया करके अपने संज्ञान का निर्माण करता है। "विकास बाहर से अंदर की ओर होता है।"

विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

उपरोक्त सिद्धांत निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होते हैं:

  • पोषण (Nutrition): संतुलित आहार न मिलने पर विकास की दर धीमी हो जाती है।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियां (Endocrine Glands): थायराइड और पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव शारीरिक और मानसिक विकास को नियंत्रित करता है।
  • पारिवारिक वातावरण: तनावपूर्ण माहौल संवेगात्मक अस्थिरता लाता है।

शिक्षा में विकास के सिद्धांतों की उपयोगिता

सिद्धांत कक्षा में उपयोग (Application)
व्यक्तिगत भिन्नता सभी बच्चों को एक ही गति से न पढ़ाएं। कमजोर बच्चों के लिए उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Classes) की व्यवस्था करें।
सामान्य से विशिष्ट पाठ्यक्रम को सरल से जटिल की ओर डिजाइन करें। पहले अक्षर सिखाएं, फिर शब्द।
परिपक्वता बच्चे की आयु और क्षमता के अनुसार ही उनसे अपेक्षा रखें। कक्षा 1 के बच्चे को अमूर्त गणित न पढ़ाएं।
एकीकरण सर्वांगीण विकास के लिए खेल, कला और संगीत को पढ़ाई के साथ जोड़ें।
निष्कर्ष: बाल विकास के सिद्धांत शिक्षकों के लिए एक मार्गदर्शक मानचित्र (Map) की तरह हैं। जब एक शिक्षक इन सिद्धांतों (जैसे- निरंतरता, व्यक्तिगत भिन्नता, वंशानुक्रम व वातावरण) को समझकर शिक्षण विधियों का चयन करता है, तो वह केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करता, बल्कि एक संतुलित और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

बाल विकास के प्रमुख चरण (Stages of Child Development)

बाल विकास को मुख्य रूप से 5 चरणों में विभाजित किया गया है। परीक्षाओं (CTET/REET) की दृष्टि से प्रत्येक चरण की विशेषताएं महत्वपूर्ण हैं:

अवस्था (Stage) आयु (Age) मुख्य विशेषताएं (Key Characteristics)
प्रसवपूर्व अवस्था
(Prenatal Stage)
गर्भधारण से जन्म तक
(9 माह / 280 दिन)
शारीरिक विकास की गति सबसे तीव्र होती है। अंग निर्माण और शरीर की संरचना इसी चरण में होती है।
शैशवावस्था
(Infancy)
जन्म से 2 वर्ष इंद्रियों (Senses) द्वारा सीखना, वस्तु स्थायित्व (Object Permanence), अनुकरण करना, तीव्र शारीरिक व मानसिक वृद्धि।
प्रारंभिक बाल्यावस्था
(Early Childhood)
2 से 6 वर्ष खिलौनों की आयु (Toy Age), भाषा विकास का सबसे संवेदनशील समय, जिज्ञासा (Curiosity), पूर्व-स्कूली आयु (Pre-school age)।
उत्तर बाल्यावस्था
(Late Childhood)
6 से 12 वर्ष गैंग एज (Gang Age) या टोली की आयु, स्कूल जाने की आयु, तार्किक चिंतन (मूर्त) की शुरुआत, समाजीकरण।
किशोरावस्था
(Adolescence)
12 से 18 वर्ष तूफान और तनाव की अवस्था (स्टेनली हॉल), पहचान का संकट (Identity Crisis), अमूर्त चिंतन, वीर पूजा (Hero Worship)।

बाल विकास के सिद्धांतों की सारांश तालिका (Master Summary of Principles)

नीचे सभी प्रमुख सिद्धांतों, उनके समर्थकों और मुख्य विचारों का निचोड़ प्रस्तुत है। यह अंतिम समय के रिवीज़न (Last Minute Revision) के लिए अत्यंत उपयोगी है।

सिद्धांत (Principle) समर्थक/जनक (Scholar) मुख्य विचार/सार (Core Concept)
1. व्यक्तिगत भिन्नता
(Individual Differences)
फ्रांसिस गाल्टन (Francis Galton) कोई भी दो बालक (यहाँ तक कि जुड़वाँ भी) रुचियों, योग्यता और विकास की गति में समान नहीं होते।
2. वंशानुक्रम × वातावरण
(Heredity × Environment)
आर.एस. वुडवर्थ (Woodworth) विकास न केवल प्रकृति है, न केवल पोषण। यह दोनों का गुणात्मक (Multiplicative) परिणाम है।
3. विकास की दिशा
(Development Direction)
अर्नाल्ड गेसेल (Gesell) & कुप्पुस्वामी (i) सिफेलोकूडल: सिर से पैर की ओर।
(ii) प्रॉक्सिमोडिस्टल: केंद्र से बाहर (हाथ-पैर) की ओर।
4. सामान्य से विशिष्ट
(General to Specific)
ई.बी. हरलोक (Hurlock) बच्चा पहले पूरे शरीर से प्रतिक्रिया करता है (सामान्य), बाद में केवल विशिष्ट अंगों का प्रयोग करता है।
5. निरंतरता का सिद्धांत
(Continuity)
बी.एफ. स्किनर (Skinner) विकास एक कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है (Womb to Tomb)। यह धीमी या तेज हो सकती है, पर रुकती नहीं।
6. एकीकरण का सिद्धांत
(Integration)
कुप्पुस्वामी (Kuppuswamy) पहले अंगों को अलग-अलग चलाना, फिर उनमें समन्वय (Coordination) स्थापित करना। (जैसे: हाथ और आँखों का समन्वय)।
7. वर्तुलाकार विकास
(Spiral Development)
जेरोम ब्रूनर (संदर्भित) विकास सीधी रेखा (Linear) में नहीं होता। यह आगे बढ़ता है, फिर परिपक्वता के लिए पीछे मुड़ता है (Spiral), फिर आगे बढ़ता है।
8. परस्पर संबंध
(Interrelation)
गैरीसन (Garrison) शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक विकास एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक खराब होगा तो सब खराब होंगे।
9. परिपक्वता सिद्धांत
(Maturation Theory)
अर्नाल्ड गेसेल (Gesell) सीखने के लिए शारीरिक और मानसिक परिपक्वता अनिवार्य है। (जैविक घड़ी का महत्व)।
10. सामाजिक-सांस्कृतिक
(Sociocultural)
लेव वायगोत्स्की (Vygotsky) विकास सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) का परिणाम है। समाज पहले आता है, विकास बाद में।
11. संज्ञानात्मक विकास
(Cognitive Development)
जीन पियाजे (Piaget) बच्चे 'नन्हें वैज्ञानिक' हैं जो अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं। विकास 4 चरणों में होता है।
12. सामाजिक अधिगम
(Social Learning)
अल्बर्ट बंडूरा (Bandura) बच्चे दूसरों के व्यवहार का अवलोकन (Observation) और नकल (Imitation) करके विकसित होते हैं।

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