Maa Saraswati aur Indian Culture: Kyu Western views se alag hai hamara Gyan-Darshan?

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

माँ सरस्वती और भारतीय संस्कृति: एक चिंतन

हमारा भारत और हिन्दू धर्म दुनिया से इस मायने में अलग और विलक्षण है कि हमने हमेशा ज्ञान के महत्त्व को सबसे पहले समझा और इसे बाकी सब चीजों के ऊपर रखा। दुनिया की अलग-अलग सभ्यताओं और संस्कृतियों में जहाँ भोजन, आवास, सुरक्षा आदि को क्रमिक विकास के केंद्र में रखा गया है; वहीं हमारे यहाँ सबसे पहले 'ज्ञान' की बात की गई है। 'विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु' कहते हुये हम जो प्रार्थना करते हैं उसमें भी सबसे पहले हमने 'ज्ञान' ही माँगा है और ज्ञान के बाद बाकी चीजों की इच्छा जताई है।

पश्चिम में इल्हाम होता है, वहां ज्ञान की प्राप्ति के लिये न तो साधना की आवश्यकता है, न ज्ञान की और न ही गुरु की बस जादू की तरह इल्म उतर जाता है। इसलिये आपने सेमेटिक मजहबों के नबियों और पैगम्बरों के बारे में कभी भी नहीं सुना होगा कि उन्होंने ज्ञान अर्जन के लिये कुछ किया या उनके कोई गुरु हुये पर अपने यहाँ ऐसा नहीं है। विष्णु अवतार राम और कृष्ण भी जब इस धरा पर आये तो कोई जादू नहीं हुआ, उन्हें भी वशिष्ठ, विश्वामित्र और संदीपनी जैसे गुरुओं के चरणों में बैठकर सरस्वती की उपासना करनी पड़ी। मतलब ज्ञान अनायास ही नहीं आ जाता, उसके लिये सरस्वती की साधना करनी पड़ती है।

ऋषि दयानंद कहते थे कि जब मानव-जाति इस धरती पर आई तब उसके मार्गदर्शन के लिये ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरस नाम के ऋषियों के हृदय में सबसे पहले वेद का प्रकाश किया था यानि हिन्दू इतिहास का पहला पन्ना वेदमंत्रों से खुलता है, उस वेद से खुलता है जिसका अर्थ ही है ज्ञान। सरस्वती की आराधना का क्रम वेदों के बाद भी नहीं रूकता। हम उपनिषदों की बात करते हैं तो उपनिषद का अर्थ ही है 'समीप उपवेशन' या 'समीप बैठना यानि विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना। हमारे सारे पुराण भी संवाद रूप में ही है। रामायण की कथा भी एक श्लोक "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः......" के विस्तार के नतीजे में ही साकार हुई। महाभारत में ही गीता है जिसमें विस्तार से 'ज्ञान-योग' की बात की गई है।

यानि हिन्दू धर्म में कोई कहीं हो या न हो ज्ञान की देवी 'माँ शारदा' सब जगह हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं- जब सूर्य अस्त हो जाता है, चंद्रमा की चांदनी भी नहीं रहती और आग भी बुझ जाती है, उस समय मनुष्य को प्रकाश देने वाली कौन-सी वस्तु है? ऋषि उत्तर में कहतें हैं - वह वाक है, उस अवस्था में वाक ही मानव को प्रकाश देता है। इस वाक् की अधिष्ठात्रि देवी माँ शारदा ही तो हैं वेदों की अधिष्ठात्रि हैं, जो शिव-तांडव स्तोत्र की प्रेरणा हैं। यही शारदा कुम्भकर्ण के निद्रासन वाले वरदान में हैं। यही शारदा भारत को ज्ञान का तलवार लेकर विश्व के सांस्कृतिक दिग्विजय का आदेश देने वाली भी हैं जब वो महर्षि कण्व और महर्षि और्व को मल्लेछ भूमि की ओर भेजतीं हैं।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना.....

संगीत और राग-रागिनियों में भी माँ सरस्वती ही हैं। हमारे ग्रंथों में माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी) को वाग्देवी सरस्वती के प्राकट्य का दिन माना गया है; इसलिये हमलोग वसंत पंचमी के दिन माँ की आराधना करते हैं और उनसे कहतें हैं कि तू है माँ तो हम शत्रुन्जयीं हैं, तू है तो हम लक्ष्मीवंत हैं, तू है तो हम यशस्वी हैं, तो है तो हम निरोगी हैं, तू है तो हमारा मान है और तू है तो हमें किसी और बात की चिंता नहीं है।

माँ ! तेरे वरदपुत्र महाराज भोज ने धारा नगरी में तेरे दिव्य-स्वरुप को प्रतिमा के रूप में स्थापित किया था। तेरे उस प्राकट्य-स्थली पर स्थित तेरी प्रतिमा को एक दुष्ट अलाउद्दीन खिलजी ने खंडित किया था। तूने हमें सामर्थ्यवान बनाया था कि हम तुझे फिर से वहां प्रतिस्थापित करने कर अपने पूर्वजों का संकल्प पूर्ण करें पर कुछ लोगों के सत्ता की हवस आपके सम्मान पर हावी हो गई। ऐसे सब लोगों में आप सद्बुद्धि का संचार करो माँ..... अकेले तेरे उपासक बनकर हम शक्ति और लक्ष्मी दोनों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकतें हैं। हमारे मन को शुभ-संकल्पों की ओर ले चलो माँ .. 'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला............'

॥ अथ अग्निमहापुराणम् ॥

देवी सरस्वती की आठ मूर्तियाँ: लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, जया एवं मति।

लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टिर्जया मतिः
एताभिः पाहि चाष्टाभिमूर्तिभिर्मां सरस्वति

भागवत: प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि। स्वलक्षणा प्रादुरभूत्किलास्यतः स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम् ॥०२.०४.०२२॥

यह एक सुन्दर छन्द है जो वैदिक धारा को आगे ले जा रहा है। समस्त ऋग्वैदिक ऋषिकुलों के आप्री (आह्वान) मंत्रों में इळा, मही, भारती (सरस्वती) का महनीय स्थान रहा। इस छन्द में सरस्वती को पुरा (आरम्भ) काल में अज (अजन्मा ब्रह्मा) को सृष्टि करने की उनकी अपनी ही शक्ति को प्रेरित और अभिवर्द्धित करने के साथ साथ उसकी स्मृति भी दिलाने वाला बताया गया है।

तुलना के लिये ऋग्वेद की इस ऋचा को देखा जा सकता है:
महो अर्ण: सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो विश्वा वि राजति॥1.3.12॥ (शाकल)

शाक्त मत और आधुनिक विमर्श

वैदिक श्रौत परम्परा के समांतर ही स्त्री केन्द्रित शाक्त मत है। शैव मत से इसकी निकटता भी है और कभी पूरे उत्तर भारत में यह महत्त्वपूर्ण पंथ भी रहा। 52 (108 और 26 अंक भी प्रचलित हैं) शक्तिपीठ वर्तमान पाकिस्तान से लेकर तिब्बत, असम, बंगाल, तमिलनाडु, श्रीलंका होते हुये महाराष्ट्र तक समूची पुरानी भारत भूमि को घेरते हैं। वर्ष के दो विषुवों के पास छ: महीनों के अंतर पर चन्द्रसूर्य पंचांग में दो नवरात्रियाँ पड़ती हैं। प्रतिमाह तेरस(त्रयोदशी) को शिवरात्रि पड़ती है।

शाक्त मत तो वैसे भी गुह्य साधना का रहा है। शैलपुत्री से ले कर सिद्धिदात्री तक नौ रूपों में एक ओर तो कुंडलिनी साधना के सूत्र हैं तो दूसरी ओर विकासपरक सूत्र भी।

वामी (वामपंथी) विचारधारा पर चिंतन:
वामी हर परम्परा का भौतिक पाठ करने, रचने, गढ़ने और प्रचारित करने के लिये जाने जाते हैं। एक सीमा तक भौतिक व्याख्या समझने में सहायता करती है लेकिन आगे अतिरेकी बेहूदगी और उसके पश्चात साम्प्रदायिक (जी, मार्क्सवाद भी एक पंथ ही है जिसके प्रजापति मार्क्स और त्रिदेव लेनिन, स्टालिन, माओ हैं) एजेंडा के साथ मिथक गढ़ने की प्रवृत्ति उन्हें दयनीय बनाती है। अपने तर्कों में वे उतने बेहूदे और निर्लज्ज होते हैं कि सुविधानुसार आप के पर्व त्यौहार को मिथकीय आडम्बर भी कहते हैं और दूसरे किसी प्रसंग में उन्हें ऐतिहासिक दमन के प्रकरण भी बता देते हैं। हिन्दुओं के विघटन का स्वार्थ सधना चाहिये।

जो तप करेगा, बढ़ेगा। आप से बस यही पूछूँगा - दुर्गा सप्तसती या देवी भागवत पढ़े हैं? वेदादि? कोई पुराण? उपनिषद ...न, न, सब उपलब्ध हैं, आप को समझ में आये उस भाषा में। मॉडर्न सेकुलर बनने के चक्कर में आप ने स्वयं अपनी जड़ों को घृणित बता मट्ठा डाला और अब कोई दूसरा उलटबाँसी गढ़ रहा है तो आप को मिर्ची लग रही है! स्वयं पर, अपनी आस्था पर भरोसा रखिये।

वसंत पंचमी और कामदेव के 5 बाण

एक प्रश्न उठा - वसंत का स्वागत पाँचवे दिन ही क्यों? कुसमायुध कामदेव की ऋतु में विद्यादायिनी सरस्वती की उपासना क्यों? कामदेव अनंग हैं यानि देहविहीन। कुसुमायुध के तूणीर में खिली प्रकृति से लिये पाँच बाण रहते हैं जिनके नाम और प्रभाव अमरकोश में ऐसे दिये गये हैं:

अरविन्दम् अशोकं च चूतं च नवमल्लिका ।
नीलोत्पलं च पञ्चैते पञ्चबाणस्य सायकाः ॥
उन्मादनस् तापनश् च शोषणः स्तम्भनस् तथा ।
संमोहनस्श् च कामश् च पञ्च बानाः प्रकीर्तिताः॥

वसंत के पहले पाँच दिन ऐसे देखें क्या?

  • पहले दिन हृदयक्षेत्र पर आघात और उन्माद।
  • दूसरे दिन ओठ - देह के ताप प्रभाव में ओठों की थरथराहट, अभिव्यक्ति!
  • तीसरे दिन मस्तिष्क भी विचलित और सभी उत्तेजनाओं को भीतर सोख लेना।
  • चौथे दिन आँखें, स्तम्भन पर ध्यान देने से खम्भे की तरह जड़ीभूत होना (आँखों में बसा लेना)।
  • और सबसे बाद में सम्मोहन तीर, सर्वत्र आघात।

तो पाँचवे दिन विद्या विवेक की देवी की आराधना होती है। सौन्दर्य से उपजे राग भाव को उदात्तता की ओर ले जाना ताकि शृंगार उच्छृंखल न हो, सरस हो। देवी हंस की सवारी करती हैं (नीर क्षीर विवेक)। वसंत पंचमी के दिन सरस्वती आराधना इसके लिये है कि ऋतु की शृंगार भावना रसवती हो किंतु विद्या के अनुशासन में! विद्या का सूत्र यह है - सा विद्या या विमुक्तये, जो मुक्त करे वह विद्या है।

विद्या को घृणा से भी जोड़ कर देखना होगा। यदि घृणा की युति विद्या से हो जाय तो दो बातें होती हैं - विश्लेषण और कर्म। विश्लेषण और विवेक आप को अन्ध कूप में गिरने से बचाते हैं। तो आज विद्या दिवस पर भीतर की घृणा का विश्लेषण करें, उसे विद्या से युत करें।

पावका न: सरस्वती वाजेभि: वाजिनीवती यज्ञम् वष्टु धियावसुः...

वैश्विक परिदृश्य में माँ सरस्वती

केवल भारत में ही नहीं बल्कि चीन, जापान, बाली, म्यांमार और कई देशों में भी होती है देवी सरस्वती की आराधना। हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल में जिसे आर्यावर्त देशान्तरे भरतखंडे जम्बूद्वीपे कहकर संबोधित किया जाता था, उससे काफी अलग और विशाल था। भारत ने यह विशाल साम्राज्य शस्त्रों के बल पर नहीं, वरन शास्त्रों और वेदों के प्रभावशाली दर्शन से सींचा था।

म्यांमार: वहां देवी सरस्वती को 'थुयथदी' के तौर पर पूजा जाता है। प्राचीन विहारों और मंदिरों में आज भी उनके नाम के आह्वान के साक्ष्य मिलते हैं। वहां कई विद्यार्थी परीक्षा देने से पहले इनका आशीर्वाद लेते हैं।

थाईलैंड: वहां सरस्वती को 'Suratsawadi' के तौर पर पूजा जाता है, जो वक्तव्य एवं ज्ञान की देवी मानी जाती हैं।

कंबोडिया: प्राचीन खमेर साहित्य में विस्तृत उल्लेख दिया गया है जिसमें कभी कभी वागेश्वरी तो कभी भारती के रूप में उल्लेख है।

बाली: हिन्दू बाली में सरस्वती का वही स्थान है जो भारत में है। स्थानीय बाली पंचांग के अनुसार सरस्वती दिवस उनके पंचांग का अंतिम दिन माना जाता है।

चीन: 'बियान चाइत्यान' देवी, देवी सरस्वती का चीनी स्वरूप है। बौद्ध सूत्र (गोल्डेन लाइट सूत्र) में उनकी काफी प्रशंसा की गयी है।

जापान: चीन की देवी बियान चाइत्यान जापान में 'बेंजाइतेन' (Benzaiten) बन गयीं। देवी बेंजाइतेन को बैठे हुये जापानी ल्यूट यानि 'बीवा' नामक वाद्ययंत्र बजाते हुये दिखाया गया है, ठीक उसी तरह जैसे देवी सरस्वती वीणा का वादन करती हैं। पूरे जापान भर में देवी बेंजाइतेन को समर्पित कई मंदिर हैं, जैसे Chiku bushima, Itsu kushima, और Eno shima (Nihon Sandai Benten)।

भारत और उसके पड़ोस में जो अभी समानताएं दिखाई दे रही हैं वो उससे कहीं ज़्यादा है। जो एक ही संस्कृति के आधार पर बनी है, जिसका प्रतीक हैं देवी सरस्वती की साझी विरासत।

ॐ नमो नारायण

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!