सब कुछ मिट जाता है, बस दान रह जाता है | Shiksha Kshayam Gacchati Shloka
समय सबको मिटा देता है, सिवाय 'दान' के
सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः ।
जलं जलस्थानगतं च शुष्यति
हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥
Subaddhamūlā nipatanti pādapāḥ |
Jalaṁ jalasthānagataṁ ca śuṣyati
Hutaṁ ca dattaṁ ca tathaiva tiṣṭhati ||
"समय बीतने के साथ शिक्षा (सीखी हुई विद्या) नष्ट हो जाती है। मजबूत जड़ों वाले विशाल वृक्ष भी गिर जाते हैं। जलाशयों (तालाब/बाध) में भरा हुआ जल भी सूख जाता है। लेकिन, हवन (यज्ञ) में दी गई आहुति और जरूरतमंद को दिया गया दान—ये दोनों वैसे के वैसे (अमर) रहते हैं।"
📖 शब्दार्थ (Word Analysis)
| शब्द (Sanskrit) | अर्थ (Hindi) | English Meaning |
|---|---|---|
| शिक्षा | सीखी हुई विद्या/कौशल | Education/Skills |
| क्षयं गच्छति | नष्ट हो जाती है | Gets destroyed/depleted |
| कालपर्ययात् | समय बीतने पर | With the passage of time |
| सुबद्धमूलाः | मजबूत जड़ों वाले | Firmly rooted |
| पादपाः | वृक्ष/पेड़ | Trees |
| जलस्थानगतं | जलाशय में रखा हुआ | Stored in reservoir |
| हुतं | हवन/यज्ञ (देवताओं को दिया हुआ) | Offered in fire (Sacrifice) |
| दत्तं | दान (इंसानों को दिया हुआ) | Given in charity |
| तिष्ठति | स्थिर रहता है/अमर है | Remains/Endures |
(↔ तालिका को खिसका कर देखें)
🧠 संदर्भ और विश्लेषण
यह श्लोक महाकवि भास के नाटक 'कर्णभारम्' से लिया गया है। महाभारत युद्ध में जब कर्ण के रथ का पहिया धंस जाता है और उसे परशुराम जी का श्राप (विद्या भूलना) याद आता है, तब वह यह श्लोक कहता है। उसे अहसास होता है कि अस्त्र-शस्त्र और विद्या धोखा दे सकते हैं, लेकिन उसका किया हुआ 'दान' ही उसका साथ देगा।
श्लोक में तीन शक्तिशाली चीजों (ज्ञान, वृक्ष, जल) को नश्वर बताया गया है, जो 'काल' (Time) के सामने हार जाती हैं। केवल 'त्याग' ही काल को जीत सकता है।
🏙️ आधुनिक सन्दर्भ
यह श्लोक आज के भौतिकवादी समाज (Materialistic World) के लिए एक चेतावनी है:
- Skills Obsolescence: आज आप जो टेक्नोलॉजी (शिक्षा) सीख रहे हैं, 10 साल बाद वह पुरानी हो जाएगी (क्षयं गच्छति)।
- Economic Crashes: बैंक में जमा पैसा (जलाशय का जल) मंदी या महंगाई से सूख सकता है।
- Legacy: केवल वही लोग इतिहास में अमर हैं जिन्होंने समाज के लिए कुछ किया (जैसे टाटा, बिड़ला आदि)। उनका 'दत्तं' (दान) आज भी बोल रहा है।
🐢 संवादात्मक नीति कथा
🏹 महारथी कर्ण का अंतिम दान
महाभारत के युद्ध में कर्ण घायल अवस्था में जमीन पर पड़े थे। उनकी मृत्यु निकट थी। तभी भगवान कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण के वेश में उनकी परीक्षा लेने आए। उन्होंने कर्ण से कुछ दान मांगा।
कर्ण के पास कुछ नहीं था। उनका रथ टूट चुका था, विद्या विस्मृत हो चुकी थी। लेकिन, उनके दांत में सोना लगा था। कर्ण ने पास पड़ा पत्थर उठाया, अपना दांत तोड़ा और उस सोने को धोकर ब्राह्मण (कृष्ण) को अर्पित कर दिया।
कृष्ण का कथन: भगवान कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आए और बोले— "कर्ण! तुम्हारी विद्या चली गई, तुम्हारा बल चला गया, तुम्हारा रथ भी धंस गया। लेकिन इस अंतिम समय में किया गया तुम्हारा यह 'दान' और 'त्याग' तुम्हें सूर्य की तरह अमर रखेगा।"
निष्कर्ष: जब सब कुछ साथ छोड़ देता है, तब हमारे सत्कर्म ही कवच बनकर खड़े होते हैं।

