विश्वासघाती लोग धरती पर बोझ हैं? | Upakarini Vishrabdhe Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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विश्वासघाती लोग धरती पर बोझ हैं? | Upakarini Vishrabdhe Shloka Meaning

उपकारिणि विश्रब्धे
शुद्धमतौ यः समाचरति पापम् ।
तं जनमसत्यसन्धं
भगवति वसुधे कथं वहसि ॥
Upakāriṇi viśrabdhe śuddhamatau yaḥ samācarati pāpam |
Taṁ janamasatyasandhaṁ bhagavati vasudhe kathaṁ vahasi ||
हिन्दी अनुवाद:
"जो व्यक्ति उपकार करने वाले, विश्वास करने वाले और निष्कपट (शुद्ध बुद्धि वाले) मनुष्य के साथ पाप (धोखा/अहित) करता है, हे भगवती वसुंधरा! उस असत्य-प्रतिज्ञ (झूठे) मनुष्य के भार को आप कैसे सहन करती हैं?"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

श्लोक के एक-एक शब्द का विस्तृत अर्थ नीचे दिया गया है:

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
उपकारिणि उपकार करने वाले पर Towards a benefactor
विश्रब्धे विश्वास करने वाले पर Towards the trusting one
शुद्धमतौ निष्कपट/शुद्ध बुद्धि पर Towards the innocent
यः समाचरति पापम् जो पाप/बुरा करता है Who commits sin/harm
तं जनम् उस (नीच) मनुष्य को That person
असत्यसन्धम् झूठे/विश्वासघाती को Treacherous/Liar
भगवति वसुधे हे देवी पृथ्वी! O Goddess Earth!
कथं वहसि (भार) कैसे उठाती हो? How do you bear?

(↔ तालिका को दायें-बायें खिसका कर देखें)

🧠 व्याकरणात्मक विश्लेषण

1. सप्तमी विभक्ति (Locative Case):
शब्द 'उपकारिणि', 'विश्रब्धे', और 'शुद्धमतौ' में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है। यहाँ इसका अर्थ 'स्थान' नहीं, बल्कि 'विषय में' या 'के प्रति' (Towards whom) है। यानी, पाप किसके प्रति किया गया?
2. सम्बोधन (Vocative Case):
'भगवति वसुधे' - यहाँ पृथ्वी को जड़ वस्तु न मानकर 'भगवती' (देवी) कहकर पुकारा गया है। कवि सीधे पृथ्वी से प्रश्न पूछ रहे हैं, जिससे श्लोक में भावनात्मक गहराई (Emotional Depth) आती है।
3. सन्धि विच्छेद:
जनमसत्यसन्धम् = जनम् + असत्य + सन्धम् (जो सत्य की संधि/मर्यादा को तोड़ चुका हो)।

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

यह श्लोक आज के कलयुग में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ स्वार्थ के लिए सम्बन्धों की बलि दी जाती है:

  • कॉर्पोरेट राजनीति (Corporate Betrayal): अक्सर दफ्तरों में देखा जाता है कि जिस सीनियर या मेंटोर ने किसी जूनियर को काम सिखाया (उपकार किया), वही जूनियर प्रमोशन पाने के लिए अपने गुरु की पीठ पीछे बुराई करता है (पाप करता है)।
  • मित्रता में धोखा: जिसे आपने अपना सबसे गहरा राज़ बताया (विश्वास किया), वही व्यक्ति मज़ाक बनाकर उसे सार्वजनिक कर देता है।
  • धरती का बोझ: हमारे समाज में कहावत है- "यह आदमी धरती पर बोझ है।" यह मुहावरा इसी श्लोक की भावना से प्रेरित है। प्रकृति सब कुछ सहती है, लेकिन विश्वासघाती का भार उसे भी भारी लगता है।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

🌊 दयालु नाविक और धूर्त चोर

दृश्य: नदी में भीषण बाढ़ आई थी। लहरें उफान पर थीं।

एक नाविक अपनी छोटी नाव से सुरक्षित स्थान की ओर जा रहा था। तभी उसने देखा कि एक आदमी पानी में डूब रहा है। वह आदमी मदद के लिए "बचाओ! बचाओ!" चिल्ला रहा था। नाविक, जो 'उपकारिणि' (उपकारी) स्वभाव का था, ने अपनी जान जोखिम में डालकर नाव मोड़ी और उस डूबते हुए आदमी को हाथ पकड़कर नाव में खींच लिया।

वह आदमी असल में एक भागा हुआ चोर था। जैसे ही उसे होश आया, उसकी नज़र नाविक की कमर पर बंधी पैसों की थैली पर पड़ी। नाविक जब चप्पू चलाने में व्यस्त हुआ, तो चोर ने सोचा, "यह नाविक अकेला है और बूढ़ा है।"

विश्वासघात: जिस नाविक ने उसे जीवनदान दिया, उस 'शुद्धमतौ' (निष्कपट) नाविक को चोर ने पीछे से धक्का देकर उफनती नदी में गिरा दिया और नाव व पैसे लेकर भागने लगा।

नाविक किसी तरह तैरकर किनारे लगा। उसने कांपते हुए आसमान और धरती की ओर देखा और कहा—

"हे माँ वसुंधरा! मैंने इसे जीवन दिया और इसने मुझे मृत्यु दी। ऐसे कृतघ्न (Ungrateful) मनुष्य का भार तुम कैसे उठा रही हो? इसे तो अभी फटकर पाताल में समा लेना चाहिए।"

निष्कर्ष: थोड़ी दूर जाते ही नाव एक चट्टान से टकराई। चोर, जिसे तैरना नहीं आता था, पानी में डूब गया। प्रकृति भी कृतघ्नता को अधिक समय तक सहन नहीं करती।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

संसार में 'पाप' का प्रायश्चित हो सकता है, लेकिन 'विश्वासघात' का नहीं।
उपकार को भूलना गलत है, लेकिन उपकार करने वाले का ही अहित करना 'महापाप' है।
हमें सदैव कृतज्ञ (Grateful) बने रहना चाहिए।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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