भगवान श्रीराम: धर्म और आदर्श आचरण की जीवंत परिभाषा
(Lord Shri Ram: The Definition of Dharma)
धर्म क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सदियों से ऋषि-मुनियों और शास्त्रों ने दिया है। इसका सबसे सरल और सटीक उत्तर है— "धारयति इति धर्मः"। अर्थात, वह गुण या आचरण जिसे हम अपने जीवन में धारण करते हैं, वही धर्म है। धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि हमारे चरित्र की शुद्धता है।
यदि कोई व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलना चाहता है, तो उसके लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम' का जीवन है। महर्षि वाल्मीकि ने कहा है— "रामो विग्रहवान् धर्मः" अर्थात् राम धर्म के साक्षात् विग्रह (मूर्ति) हैं। उनके आचरण का अनुकरण करना ही व्यक्ति को धर्मपरायण और धार्मिक बनाता है।
आइए, प्रभु श्रीराम के जीवन के माध्यम से धर्म के विविध आयामों को विस्तार से समझते हैं:
1. वचन पालन और पितृ-भक्ति (Duty and Sacrifice)
श्रीराम का जीवन 'रघुकुल रीति' का प्रमाण है— "प्राण जाइ पर बचनु न जाई"। उन्होंने न केवल स्वयं के वचनों को निभाया, बल्कि अपने पिता के दिए हुए वचनों की रक्षा के लिए राजसुख का क्षण भर में त्याग कर दिया।
2. गुरु सम्मान और शस्त्र का उद्देश्य (Respect for Mentors)
प्रभु श्रीराम ने सदैव अपने गुरुओं (वशिष्ठ और विश्वामित्र) का सम्मान किया। उन्होंने शस्त्र तभी उठाए जब धर्म की रक्षा और समाज के कल्याण के लिए उनकी आवश्यकता हुई।
3. सामाजिक समरसता और समानता (Social Equality)
श्रीराम के दरबार में 'राजा और रंक' का भेद नहीं था। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर भक्ति को कुल और जाति से ऊपर रखा। अपने बाल्यकाल के मित्र निषादराज को गले लगाकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि मित्रता और प्रेम में कोई ऊंच-नीच नहीं होती।
4. लाभ के स्थान पर न्याय का चयन (Choosing Justice over Gain)
जब बाली और सुग्रीव में से किसी एक को चुनना था, तो श्रीराम के पास शक्तिशाली बाली का विकल्प था। बाली को मित्र बनाकर रावण को हराना सुगम होता, क्योंकि बाली ने स्वयं रावण को पराजित किया था। किंतु श्रीराम ने 'रणनीतिक लाभ' के स्थान पर 'न्याय' को चुना। उन्होंने बाली के अधर्मी आचरण (छोटे भाई की पत्नी का अपमान) के कारण उसका वध किया।
5. स्त्री सम्मान और एक-पत्नी व्रत (Respect for Women)
श्रीराम ने आजीवन 'एक-पत्नी व्रत' का पालन कर पुरुषार्थ का उच्चतम मानक स्थापित किया। रावण के विरुद्ध युद्ध उनकी निजी प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं, बल्कि एक स्त्री के सम्मान की रक्षा का युद्ध था।
6. अपरिग्रह और विरक्ति (Detachment and Ethics)
लंका विजय के बाद श्रीराम चाहते तो स्वर्णमयी लंका को अयोध्या के राज्य में मिला सकते थे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा— "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"। उन्होंने लंका को लूटा नहीं, बल्कि विभीषण को राज सौंपकर अपना वचन निभाया।
निष्कर्ष: धर्म के व्यावहारिक सूत्र
प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि धर्म केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में होता है। उन्होंने निम्नलिखित गुणों के उच्चतम मानक स्थापित किए:
- यम का पालन: सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (संग्रह न करना) और ब्रह्मचर्य।
- त्याग: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार) और ईर्ष्या का त्याग ही धर्म का वास्तविक मार्ग है।
- सेवा: दान, ज्ञानार्जन, दया, सहिष्णुता, सत्कर्म, सम्मान और सेवा ही जीवन का सार है।
अतः, श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि धर्म कोई बोझ नहीं, बल्कि एक सुखी, मर्यादित और शांतिपूर्ण जीवन जीने की कला है। जो राम के आचरण को अपने जीवन में उतार लेता है, वही वास्तव में धर्म-रक्षक कहलाता है।

