आचार्य आनंदवर्धन: 'ध्वन्यालोक' के प्रणेता, 'ध्वनि संप्रदाय' के जनक और काव्यशास्त्र के युग-प्रवर्तक | Anandavardhana

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य आनंदवर्धन: 'ध्वन्यालोक' और काव्य की 'आत्मा' के उद्घोषक

आचार्य आनंदवर्धन: 'ध्वन्यालोक' के प्रणेता और काव्यशास्त्र के युग-प्रवर्तक

एक अत्यंत विस्तृत काव्यशास्त्रीय, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: कश्मीर का वह महान दार्शनिक जिसने अलंकार और रीति के स्थापित महलों को ध्वस्त कर यह सिद्ध किया कि—जिस प्रकार घंटी पर चोट मारने के बाद जो 'गूंज' (Echo) देर तक हवा में तैरती रहती है, वही 'ध्वनि' (छिपा हुआ अर्थ) कविता की वास्तविक 'आत्मा' है।

संस्कृत साहित्य में 9वीं शताब्दी से पहले, आलोचक इस बात पर बहस करते थे कि कविता का सौंदर्य किसमें है? भामह ने कहा 'अलंकार' (आभूषण) में, वामन ने कहा 'रीति' (शैली) में। लेकिन ये सब कविता की केवल 'बाहरी' सजावट की बातें थीं।

तब आचार्य आनंदवर्धन (Acharya Anandavardhana) का उदय हुआ। उन्होंने 'ध्वन्यालोक' (Dhvanyaloka) की रचना करके 'ध्वनि संप्रदाय' (School of Suggestion) की स्थापना की। उन्होंने कहा कि सुंदर शब्द और सुंदर अर्थ तो केवल कविता का शरीर हैं। कविता की 'आत्मा' वह 'व्यंग्यार्थ' (Suggested meaning / ध्वनि) है, जो शब्दों के शांत हो जाने के बाद पाठक के हृदय में गूंजता है। आनंदवर्धन के इस सिद्धांत ने भारतीय आलोचना-शास्त्र को हमेशा के लिए बदल दिया।

📌 आचार्य आनंदवर्धन: एक ऐतिहासिक एवं दार्शनिक प्रोफाइल
पूरा नाम एवं पिता आचार्य आनंदवर्धन। इनके पिता का नाम 'नोण' (Nona) था।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: 9वीं शताब्दी ईस्वी का मध्य (Mid 9th Century CE / लगभग 850 ईस्वी)।
ऐतिहासिक प्रमाण: कल्हण की 'राजतरंगिणी' (Rajatarangini) में अत्यंत स्पष्ट उल्लेख है कि आनंदवर्धन कश्मीर के राजा अवंतिवर्मन (King Avantivarman) के राजदरबार के प्रमुख रत्न थे। राजा अवंतिवर्मन का शासनकाल 855 ईस्वी से 883 ईस्वी तक रहा है। अतः आनंदवर्धन का काल भारतीय इतिहास के सबसे अकाट्य कालों में से एक है।
महानतम कृति ध्वन्यालोक (Dhvanyaloka) - (ध्वनि + आलोक = ध्वनि का प्रकाश)। इसे 'सहृदयालोक' भी कहा जाता था।
प्रवर्तक (Founder of) ध्वनि संप्रदाय (The School of Suggestion/Dhvani)
काव्यशास्त्र का महासूत्र "काव्यस्यात्मा ध्वनिः" (ध्वनि ही काव्य की आत्मा है)।
सर्वश्रेष्ठ टीकाकार आचार्य अभिनवगुप्त (जिन्होंने 10वीं सदी में ध्वन्यालोक पर 'लोचन' नामक विश्वप्रसिद्ध टीका लिखी)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: कश्मीर नरेश अवंतिवर्मन का स्वर्ण युग

प्राचीन भारत में कश्मीर 'शारदा पीठ' (सरस्वती का निवास) कहलाता था। 9वीं शताब्दी में जब राजा अवंतिवर्मन ने कश्मीर पर राज किया, तो युद्धों की जगह ज्ञान-विज्ञान को प्रश्रय मिला।

कल्हण राजतरंगिणी में लिखते हैं: "मुक्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः। प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः॥" (अर्थात् राजा अवंतिवर्मन के साम्राज्य में मुक्ताकण, शिवस्वामी, रत्नाकर और आनंदवर्धन जैसे महान कवियों ने ख्याति प्राप्त की)। आनंदवर्धन केवल एक आलोचक नहीं थे; वे 'विषमबाणलीला' (प्राकृत) और 'अर्जुनचरित' (संस्कृत) जैसे काव्यों के रचयिता एक उच्च कोटि के कवि भी थे।

3. 'ध्वन्यालोक' (Dhvanyaloka): ग्रंथ की त्रि-स्तरीय संरचना

'ध्वन्यालोक' संस्कृत आलोचना-शास्त्र का मैग्ना-कार्टा (Magna Carta) माना जाता है। इस ग्रंथ की संरचना तीन स्तरों (Three Tiers) पर बुनी गई है:

  • कारिका (Karika): छोटे-छोटे पद्य (श्लोक) जिनमें मूल सिद्धांत छिपा है। (कुल 116 कारिकाएं हैं)।
  • वृत्ति (Vritti): उन कारिकाओं की गद्य में की गई विस्तृत दार्शनिक व्याख्या।
  • उदाहरण (Udaharana): अपनी बात को सिद्ध करने के लिए कालिदास, वाल्मीकि, अमरुक और प्राकृत की 'गाथा सप्तशती' से लिए गए काव्यात्मक उदाहरण।

4. "काव्यस्यात्मा ध्वनिः": ध्वनि सिद्धांत का महा-उद्घोष

आनंदवर्धन ने अपने ग्रंथ का प्रारंभ ही एक ऐसी क्रांतिकारी घोषणा से किया, जिसने पिछले सभी आचार्यों को चुनौती दे डाली:

काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्वः
तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये।
(अर्थ: काव्य की आत्मा 'ध्वनि' है, ऐसा प्राचीन विद्वानों द्वारा पहले से कहा जाता रहा है। लेकिन कुछ लोग इसके अस्तित्व से इंकार करते हैं (अभाववादी), और कुछ लोग इसे केवल 'लक्षणा' (भाक्त) मान लेते हैं। मैं आनंदवर्धन उस 'ध्वनि' के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करूँगा।)

ध्वनि का अर्थ: आनंदवर्धन ने 'ध्वनि' शब्द वैयाकरणों (Grammarians - भर्तृहरि के 'स्फोटवाद') से उधार लिया। जिस प्रकार घंटी (Bell) पर एक बार चोट मारने के बाद जो मूल आवाज़ निकलती है, वह 'वाच्यार्थ' है; लेकिन उस चोट के बाद जो अनुरणन (गूंज/Echo) देर तक हवा में तैरती रहती है, वह 'ध्वनि' (Suggested Meaning) है। कविता वही महान है जिसमें यह गूंज (ध्वनि) हो।

5. शब्द की तीन शक्तियां: अभिधा, लक्षणा और 'व्यंजना' (ध्वनि)

ध्वनि सिद्धांत को समझने के लिए आनंदवर्धन ने शब्द की तीन शक्तियों (Word Powers) का अत्यंत तार्किक विश्लेषण किया:

अर्थ कैसे निकलता है?

1. अभिधा (Abhidha - Literal Meaning): डिक्शनरी का सीधा अर्थ। जैसे: "गंगा में गांव है।" (सीधा अर्थ: नदी के पानी के बीच गांव है - जो कि असंभव है)।

2. लक्षणा (Lakshana - Indicative Meaning): जब सीधा अर्थ काम न करे, तो लक्षणा का प्रयोग होता है। "गंगा में गांव है" का अर्थ होगा "गंगा के किनारे/तट पर गांव है।" (यह भामह और वामन तक की सीमा थी)।

3. व्यंजना / ध्वनि (Vyanjana / Dhvani - Suggested Meaning): आनंदवर्धन ने पूछा—कवि ने सीधा यह क्यों नहीं कहा कि गांव किनारे पर है? उसने "गंगा में गांव है" क्यों कहा? उत्तर है—यह बताने के लिए कि उस गांव में गंगा जैसी 'पवित्रता' और 'शीतलता' है। यह पवित्रता और शीतलता न तो शब्द में लिखी है, न लक्षणा में है; यह 'ध्वनित' (Suggest) हो रही है। यही 'ध्वनि' है!

6. 'ध्वनि' (व्यंग्यार्थ) का व्यावहारिक उदाहरण: "गतोऽस्तमर्कः"

आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत को समझने का सबसे सुंदर और शास्त्रीय उदाहरण है एक छोटा सा वाक्य: "गतोऽस्तमर्कः" (सूर्य डूब गया है / The sun has set)।

एक वाक्य, अनेक 'ध्वनियां' (Echoes)

वाच्यार्थ (सीधा अर्थ) केवल इतना है कि शाम हो गई है। लेकिन आनंदवर्धन कहते हैं कि 'ध्वनि' (व्यंजना) के कारण संदर्भ और श्रोता के अनुसार इसके अनगिनत अर्थ हो सकते हैं:
1. चोर के लिए ध्वनि: "अब चोरी करने का समय आ गया है।"
2. ब्राह्मण के लिए ध्वनि: "संध्या वंदन (पूजा) का समय हो गया है।"
3. प्रेमिका के लिए ध्वनि: "मेरे प्रेमी से छुपकर मिलने का समय हो गया है।"
4. मजदूर के लिए ध्वनि: "काम बंद कर घर जाने का समय हो गया है।"

आनंदवर्धन कहते हैं कि शब्द अपना सीधा अर्थ बताकर शांत हो जाता है, और उसके बाद जो यह नया अर्थ (चोरी, पूजा, प्रेम) निकलता है, वही 'ध्वनि' (काव्य की आत्मा) है।

7. ध्वनि के तीन प्रकार: वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि और रस ध्वनि

आनंदवर्धन ने ध्वनि (Suggested Meaning) को तीन सर्वोच्च श्रेणियों में बाँटा:

  • वस्तु ध्वनि: जहाँ कोई साधारण बात (Fact) ध्वनित हो रही हो।
  • अलंकार ध्वनि: जहाँ कोई सीधा अर्थ किसी छिपे हुए 'अलंकार' (जैसे उपमा) को जन्म दे रहा हो।
  • रस ध्वनि (The Ultimate Soul): यह सर्वोच्च शिखर है। जहाँ शब्दों के पीछे से 'रस' (शृंगार, करुण, वीर आदि) की अनुभूति ध्वनित हो। आनंदवर्धन ने स्पष्ट किया कि 'रस' को शब्दों में बांधकर (Abhidha) व्यक्त नहीं किया जा सकता, उसे केवल 'ध्वनित' (Suggest) किया जा सकता है।

8. अभिनवगुप्त की 'लोचन' टीका: ध्वनि सिद्धांत की अमरता

आनंदवर्धन का 'ध्वन्यालोक' इतना गूढ़ और दार्शनिक था कि उनके बाद के कई आचार्यों (जैसे महिमभट्ट) ने इस पर भयंकर प्रहार किए। ध्वनि सिद्धांत को डूबने से बचाने के लिए 10वीं शताब्दी में कश्मीर के ही सर्वमहान दार्शनिक आचार्य अभिनवगुप्त (Abhinavagupta) सामने आए।

अभिनवगुप्त ने ध्वन्यालोक पर 'लोचन' (Locana - आँख) नामक टीका लिखी। उन्होंने कहा कि ध्वन्यालोक को पढ़ने के लिए आपको एक 'तीसरी आँख' (लोचन) चाहिए, जो मैं दे रहा हूँ। अभिनवगुप्त की इस टीका ने आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत को अजेय बना दिया और उसे भारतीय काव्यशास्त्र का सर्वोच्च सिद्धांत (Ultimate Truth) घोषित कर दिया।

9. निष्कर्ष: जो कहा नहीं गया, वही सबसे सुंदर है

आचार्य आनंदवर्धन (9वीं शती) ने दुनिया को बताया कि कविता की महानता उसमें नहीं है जो पन्नों पर स्याही से लिखा है; कविता की महानता उन दो पंक्तियों के बीच की 'खाली जगह' (Silence / Suggestion) में है।

जैसे एक सुंदर स्त्री का सौंदर्य उसके कपड़ों (अलंकार) में नहीं, बल्कि उसके रूप के पीछे छिपे लावण्य (Charm) में है, वैसे ही काव्य का सौंदर्य 'ध्वनि' में है। आनंदवर्धन वह मील का पत्थर हैं जिन्होंने 'शब्द-शास्त्र' को 'मनोविज्ञान' और 'दर्शन' के धरातल पर खड़ा कर दिया। उनके 'ध्वनि संप्रदाय' के बिना भारतीय साहित्य और कला की आत्मा को समझना सर्वथा असंभव है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • ध्वन्यालोकः - आचार्य आनंदवर्धन (अभिनवगुप्त की 'लोचन' टीका और हिंदी अनुवाद सहित)।
  • राजतरंगिणी - कल्हण (आनंदवर्धन और अवंतिवर्मन के ऐतिहासिक साक्ष्य हेतु)।
  • History of Sanskrit Poetics - Dr. P.V. Kane (ध्वनि सिद्धांत का विस्तृत और ऐतिहासिक विवेचन)।
  • भारतीय काव्यशास्त्र की रूपरेखा - आचार्य रामचंद्र शुक्ल।

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