Shiva Aur Ravana: Guru Ne Bhakt Ko Gyan Kyon Nahi Diya?

Sooraj Krishna Shastri
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॥ विचारणीय दर्शन ॥

शिव और रावण: गुरु ने अपने सबसे बड़े भक्त को 'ज्ञान' क्यों नहीं दिया?

अहंकार का पतन और गुरु-शिष्य परंपरा का गूढ़ रहस्य

हमारे पुराणों और स्मृतियों में भगवान शिव को 'आदिगुरु' (प्रथम शिक्षक) माना गया है। देव, दानव, यक्ष, गंधर्व या मनुष्य— जिसने भी महादेव की शरण ली, शिव ने सबको ज्ञान दिया है, सबको जीवन का मार्ग समझाया है। यहाँ तक कि उन्होंने माता पार्वती को अमरकथा सुनाई और सप्तर्षियों को योग का ज्ञान दिया। लेकिन क्या आपने कभी विचार किया है कि भगवान शिव ने अपने सबसे बड़े और परम भक्त 'रावण' को कभी कोई ज्ञान क्यों नहीं दिया? उसे जीवन का सही मार्ग क्यों नहीं समझाया?

यह एक ऐसा रहस्य है, जो गुरु और शिष्य के संबंधों की पूरी परिभाषा को स्पष्ट कर देता है। एक बार किसी जिज्ञासु ने देवाधिदेव शिव से यही प्रश्न पूछ लिया— "प्रभु! आप सबको समझाते हैं, सबको ज्ञान बाँटते हैं, फिर आप अपने परम भक्त रावण को क्यों नहीं समझाते?"

भगवान शंकर ने मुस्कुराते हुए अत्यंत गहरा उत्तर दिया— "क्योंकि मैं रावण को समझता हूँ, इसलिए उसे नहीं समझाता। जो लोग रावण जैसों को समझाते हैं, वे खुद नासमझ हैं।"

अहंकार का गणित: 5 सिर बनाम 10 सिर

भगवान शंकर ने आगे कहा— "यह रावण मुझसे जब भी मिलता है, तो मुझमें ईश्वर या गुरु को नहीं देखता। यह मुझसे कहता है, 'गुरुजी इधर देखिए!' मैं पूछता हूँ, क्या देखूं? तो रावण अहंकार से भरकर कहता है— 'देखिए, आपके तो केवल 5 सिर (पंचानन शिव) हैं, लेकिन मेरे तो 10 सिर (दशानन) हैं!'"

रावण का यह कथन उसके भयंकर बौद्धिक अहंकार को दर्शाता है। वह समझता था कि दस सिर होने के कारण उसके पास शिव से दुगनी बुद्धि और दुगना ज्ञान है। भगवान शिव कहते हैं कि अब जो शिष्य स्वयं को अपने गुरु से दुगना ज्ञानी समझे, उसे गुरु समझाए भी तो क्या समझाए?

॥ ज्ञान प्राप्ति का सूत्र ॥
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 4.39)
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो श्रद्धावान है, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला है और ज्ञान प्राप्ति के लिए तत्पर है, केवल वही ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त हो जाता है।

सार: ज्ञान केवल 'श्रद्धावान' को मिलता है। अहंकारियों को, जो स्वयं को गुरु से श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें कभी सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
कैलाश को उठाना: भक्ति या शक्ति का प्रदर्शन?

रावण के अहंकार की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब वह एक बार कैलाश पर्वत गया। दर्शन करने या प्रार्थना करने के बजाय, उसने अपने बाहुबल के अहंकार में पूरे कैलाश पर्वत को ही अपने सिर पर उठा लिया!

कैलाश में अचानक भयंकर हलचल मच गई। पर्वत डगमगाने लगा। माता पार्वती ने चिंतित होकर पूछा— "हे देवाधिदेव! यह क्या हो रहा है? कैलाश क्यों डोल रहा है?"

भगवान शंकर ने अत्यंत सहजता से कहा— "देवि, चिंता मत करो। चेला आया है।"

माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा— "चेला आया है, तो इतनी हलचल और प्रलय क्यों है?"

शंकर जी ने हँसते हुए उत्तर दिया— "जब रावण जैसे चेले आएँगे, तो हलचल ही मचेगी। ये शांति लेकर नहीं, बल्कि अपना अहंकार दिखाने आते हैं।"

जब किसी ने रावण से पूछा कि तुम यह क्या कर रहे हो? तो रावण ने अत्यंत गर्व से कहा— "मैं अपने गुरुजी को शिरोधार्य कर रहा हूँ (अपने सिर पर बैठा रहा हूँ)।"

परंतु विचार कीजिए, भला यह कैसा शिरोधार्य है? गिरना शिष्य का काम है, और गिरे हुए को उठाना गुरु का काम है। शिष्य को तो गुरु के चरणों में लिपट जाना चाहिए, और गुरु उसे प्रेम से अपने हाथों से ऊपर उठाते हैं। लेकिन रावण जैसे अहंकारी शिष्य सोचते हैं कि वे अपनी शक्ति से अपने गुरु को ऊपर उठा रहे हैं! यह भक्ति नहीं, उद्दंडता है।
जीवन का संदेश: हमारा नाश कब सुनिश्चित होता है?

रावण महान पंडित था, चारों वेदों का ज्ञाता था और परम शिव भक्त था। परंतु उसके पास 'विनम्रता' नहीं थी। जब शिष्य यह मान ले कि वह गुरु से बड़ा हो गया है, जब वह अपनी उपलब्धियों का श्रेय गुरु को देने के बजाय गुरु को ही अपनी शक्ति दिखाना शुरू कर दे, तब उसका पतन सुनिश्चित हो जाता है। भगवान शिव ने उसे इसलिए नहीं बचाया क्योंकि रावण ने कभी शिव से ज्ञान और सद्बुद्धि माँगी ही नहीं, उसने हमेशा केवल 'शक्ति' माँगी।

आज के परिप्रेक्ष्य में: जब भी हम खुद को अपने गुरुजनों से श्रेष्ठ समझने लग जाएँ, तो समझ लीजिए कि हमारा नाश हमारे सिर पर आ गया है। चाहे वह स्कूल के शिक्षक हों, जीवन की पहली शिक्षा देने वाले माता-पिता हों, या अध्यात्म का मार्ग दिखाने वाले सतगुरु हों— हमारा स्थान हमेशा उनके चरणों में ही होना चाहिए। उनकी उंगली पकड़कर चलने में जो सुरक्षा और ज्ञान है, वह अहंकार की दौड़ में कहीं नहीं है। हमारा वास्तविक कल्याण गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा में ही निहित है!

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