भारतीय इतिहास के पन्नों में बाबा बन्दा सिंह बहादुर का नाम उस चमकते हुए सूर्य के समान है, जिसने मुगल साम्राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया था। उनका जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले की तहसील राजौरी क्षेत्र में भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण (राजपूत) कुल में विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (9 जून 1670 ई.) को हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम 'लक्ष्मण देव' रखा था। लक्ष्मण देव के भाग्य में किताबी विद्या नहीं थी, लेकिन राजपूती रक्त होने के कारण उन्हें छोटी सी उम्र में ही पहाड़ी जवानों की भांति घुड़सवारी, तीरंदाजी, कुश्ती और शिकार आदि का बहुत शौक़ था।
लक्ष्मण देव अभी मात्र 15 वर्ष की आयु के ही थे कि युवावस्था में शिकार खेलते समय उनके जीवन में एक हृदयविदारक घटना घटी। उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। घायल हिरणी उनके सामने गिर पड़ी, उसका पेट फटा और उसमें से एक जीवित शिशु निकला, जो लक्ष्मण देव की आँखों के सामने तड़पकर वहीं मर गया। एक मूक और निर्दोष प्राणी की इस दर्दनाक मृत्यु ने इस युवा राजपूत के हृदय को झकझोर कर रख दिया। उनका मन संसार से खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम 'माधोदास' रख लिया, अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए, और घर छोड़कर तीर्थयात्रा व तपस्या पर निकल पड़े। कई वर्षों तक अनेक साधुओं (जैसे जानकी प्रसाद और औघड़नाथ) से योग और तंत्र विद्या सीखी और अंततः महाराष्ट्र के नांदेड़ में गोदावरी नदी के तट पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे।
वर्ष 1708 का समय था। मुगलों के अत्याचार चरम पर थे। आनंदपुर साहिब और चमकौर के युद्धों के बाद सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दक्षिण की ओर यात्रा करते हुए नांदेड़ पहुँचे। जब गुरु साहिब माधोदास की कुटिया में आए, तो माधोदास ने अपनी तांत्रिक सिद्धियों से गुरु जी को डराने का प्रयास किया, परंतु गुरु साहिब के तेज के आगे उसकी एक न चली। माधोदास गुरु जी के चरणों में गिर पड़े और बोले— "मैं आपका बंदा (गुलाम) हूँ।"
गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस कठिन समय में माधोदास को वैराग्य छोड़कर देश और धर्म में व्याप्त मुग़ल आतंक से जूझने को कहा। गुरु जी ने उन्हें अमृत छकाकर सिख बनाया और नया नाम 'गुरबख्श सिंह' (जिन्हें इतिहास बाबा बन्दा सिंह बहादुर के नाम से जानता है) दिया। गुरुजी ने उन्हें पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और अपने सिखों के नाम हुक्मनामे देकर पंजाब भेजा, ताकि वे मुगलों— विशेषकर सरहिंद के नवाब वजीर खान (जिसने गुरु जी के छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को दीवार में जिंदा चुनवा दिया था) से बदला ले सकें।
गुरु साहिब का आदेश पाकर बाबा बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। रास्ते में जो भी धर्मप्रेमी हिंदू और सिख मुगलों से त्रस्त था, वह बंदा बहादुर की सेना में शामिल होता गया। उन्होंने सबसे पहले समाना पर हमला किया और श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। इसके बाद सधौरा के अत्याचारी शासक उस्मान खान का वध किया।
12 मई 1710 को 'चप्पड़चिड़ी' के मैदान में एक भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में बाबा बन्दा सिंह बहादुर ने नवाब वजीर खान को मौत के घाट उतार दिया और सरहिंद पर केसरिया परचम लहरा दिया। उन्होंने 'जमींदारी प्रथा' का अंत करके किसानों को भूमि का मालिक बनाया और गुरु नानक देव जी व गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम के सिक्के चलाए। जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।
बन्दा बहादुर के इस पराक्रम से मुग़ल दरबार दिल्ली (बादशाह फर्रुखसियर) में दहशत फैल गई। मुगलों ने दस लाख की भारी फौज लेकर पंजाब पर हमला किया। अप्रैल 1715 में 'गुरुदास नंगल' की गढ़ी में बाबा बन्दा और उनके साथियों को मुग़ल सेना ने घेर लिया। आठ महीने तक घेराबंदी चली। अंदर अन्न-जल समाप्त हो गया। सिखों ने पेड़ों की छाल, पत्ते और घास खाकर दिन बिताए, परंतु हार नहीं मानी। अंततः 17 दिसम्बर, 1715 को विश्वासघात से अब्दुर समद खान की सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्दकर, हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ उनके 740 विश्वासी सिख साथी भी कैद किये गये थे। मुगलों की क्रूरता का आलम यह था कि युद्ध में वीरगति पाए लगभग 2000 सिखों के सिर काटकर उन्हें भालों की नोक पर टाँगकर जुलूस के रूप में दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का माँस नोचा जाता रहा, ताकि वे दर्द से चिल्लाएं, पर वे शांत रहे।
काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने या मौत गले लगाने का प्रस्ताव दिया। परंतु एक भी सिख ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। दिल्ली में आज जहाँ 'हार्डिंग लाइब्रेरी' (चांदनी चौक के पास) है, वहाँ 7 मार्च, 1716 से प्रतिदिन सौ वीरों की हत्या की जाने लगी। जल्लाद थक जाते थे, लेकिन सिखों के मुँह से 'वाहेगुरु' के सिवा कुछ नहीं निकलता था।
जब बन्दा बहादुर की बारी आई, तो मुग़ल दरबारी मुहम्मद अमीन खान ने उनसे पूछा— "तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है?"
बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते हैं? बन्दा ने उत्तर दिया, "मैं अब मौत से नहीं डरता; क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है।" यह सुनकर सब ओर सन्नाटा छा गया। उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने के लिए, उनके पाँच वर्षीय पुत्र 'अजय सिंह' को उनकी गोद में लेटाकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर अपने ही बच्चे को मारने को कहा गया। बन्दा ने इससे इन्कार कर दिया।
इस पर जल्लाद ने उस मासूम बच्चे के दो टुकड़े कर दिए और उसके तड़पते हुए दिल का माँस बन्दा बहादुर के मुँह में ठूँस दिया। कोई साधारण मनुष्य होता तो प्राण त्याग देता, पर वे तो इन सबसे ऊपर उठ चुके थे। इसके बाद जल्लादों ने उनकी दोनों आँखें निकाल लीं। गर्म चिमटों से उनके शरीर का माँस नोचा गया, जिससे उनके शरीर में केवल हड्डियाँ शेष रह गईं। उनके हाथ-पैर काट दिए गए। फिर भी 9 जून, 1716 (कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में 8 जून) को उस अदम्य वीर ने धर्म नहीं छोड़ा। अंततः उन्हें हाथी से कुचलवा दिया गया। इस प्रकार बन्दा वीर बैरागी अपने नाम के तीनों शब्दों (बंदा, सिंह, बहादुर) को सार्थक कर बलिपथ पर अमर हो गए।
मुगलों जैसे ही क्रूर आज के वामपंथी इतिहासकार हैं, जिन्हें धर्म-रक्षक बंदा बैरागी के अप्रतिम बलिदान में ऐसा कुछ नहीं दिखा कि वे पाठ्य-पुस्तकों में एक पैराग्राफ भी उनको समर्पित करते। वो तो भला हो कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (जिन्होंने 'बंदी बीर' नामक कविता लिखी), स्वातंत्र्यवीर सावरकर और राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जैसे विचारकों का, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर बंदा वैरागी पर ग्रंथ रचे। वरना हिंदुओं और सिखों के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर का हमें नाम तक न पता होता।

