Jaisi Karni Waisi Bharni: Prerak Prasang (Hindi Kahani)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ विचारणीय कथा ॥

जैसी करनी वैसी भरनी: सुहागरात को ही पत्नी ने क्यों लिया तलाक?

कर्मों का फल और माता-पिता की सेवा का महत्व

शादी की पहली रात (सुहागसेज) पर बैठी एक नवविवाहित स्त्री का पति जब भोजन का थाल लेकर कमरे के अंदर आया, तो पूरा कमरा उस स्वादिष्ट भोजन की खुशबू से महक उठा। रोमांचित होकर उस स्त्री ने अपने पति से निवेदन किया कि, "मांजी को भी यहीं बुला लेते हैं, तो हम तीनों साथ बैठकर प्रेम से भोजन करते।"

पति ने लापरवाही से कहा— "छोड़ो उन्हें! वो खाकर सो गई होंगी। आओ हम साथ में प्यार से भोजन करते हैं।"

उस स्त्री ने पुनः अपने पति से कहा कि, "नहीं, मैंने उन्हें खाते हुए नहीं देखा है।"

इस पर पति ने झुंझलाते हुए जवाब दिया— "क्यों तुम व्यर्थ की जिद कर रही हो? शादी के कार्यों से थक गयी होंगी, इसलिए सो गई होंगी। नींद टूटेगी तो खुद उठकर भोजन कर लेंगी। तुम आओ, हम खाना खाते हैं।"

पति की यह बात सुनकर उस स्त्री को गहरा आघात लगा। जो व्यक्ति अपनी बूढ़ी माँ को भूखा छोड़कर स्वयं स्वादिष्ट भोजन खाने आ सकता है, वह भविष्य में अपनी पत्नी का क्या सम्मान करेगा? उस दृढ़निश्चयी स्त्री ने तुरंत उसी रात तलाक (Divorce) लेने का कड़ा फैसला कर लिया।

तलाक लेकर उस स्त्री ने दूसरी शादी कर ली और इधर उसके पहले पति ने भी दूसरी शादी कर ली। दोनों अलग-अलग अपनी गृहस्थी बसा कर रहने लगे। समय अपनी गति से बीतता गया।

इधर उस स्त्री के दो बेटे हुए जो अत्यंत सुशील, संस्कारी और आज्ञाकारी थे। जब वह स्त्री 60 वर्ष की हुई, तो उसने अपने बेटों से कहा कि, "मैं चारों धाम की यात्रा करना चाहती हूँ, ताकि तुम्हारे सुखमय जीवन के लिए भगवान से प्रार्थना कर सकूँ।" आज्ञाकारी बेटे तुरंत अपनी माँ की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें चारों धाम की यात्रा पर ले गए。

यात्रा के दौरान एक जगह तीनों माँ-बेटे भोजन के लिए रुके। बेटे अत्यंत प्रेम से भोजन परोस कर अपनी माँ से खाने की विनती करने लगे। उसी समय, उस स्त्री की नज़र सामने खड़े एक फटेहाल, भूखे, और अत्यंत गंदे से एक वृद्ध पुरुष पर पड़ी। वह वृद्ध इस स्त्री के भोजन और उसके सुसंस्कारी बेटों की तरफ बहुत ही कातर और दयनीय नज़रों से देख रहा था।

उस स्त्री को उस वृद्ध पर दया आ गई। उसने अपने बेटों से कहा— "जाओ, पहले उस वृद्ध को नहलाओ और उसे साफ वस्त्र दो। फिर हम सब मिलकर उसे भोजन कराएंगे।"

बेटे जब उस वृद्ध को नहलाकर, साफ कपड़े पहनाकर अपनी माँ के सामने लाए, तो वह स्त्री उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गई! वह वृद्ध कोई और नहीं, बल्कि उसका वही पहला पति था, जिससे उसने शादी की सुहागरात को ही तलाक ले लिया था।

उस स्त्री ने उस वृद्ध से पूछा— "तुम्हारे साथ क्या हो गया जो तुम्हारी यह दयनीय हालत हो गई?"

उस वृद्ध ने शर्म से नज़रें झुकाते हुए भारी आवाज़ में कहा— "सब कुछ होते हुए भी मेरे बच्चे मुझे भोजन नहीं देते थे। वे मेरा दिन-रात तिरस्कार करते थे और अंततः उन्होंने मुझे घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।"

उस स्त्री ने उस वृद्ध की आँखों में देखते हुए एक बहुत गहरी बात कही— "इस बात का अंदाज़ा तो मुझे तुम्हारे साथ सुहागरात को ही लग गया था। जब तुमने अपनी बूढ़ी और थकी हुई माँ को भोजन कराने के बजाय, उस स्वादिष्ट भोजन का थाल लेकर मेरे कमरे में आ गए थे। मेरे बार-बार कहने के बावजूद भी तुमने अपनी माँ का तिरस्कार किया था। आज तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारे साथ वही कर रहे हैं। उसी कर्म का फल आज आप भोग रहे हैं।"

सार (Moral):
जैसा व्यवहार हम अपने माता-पिता और बुजुर्गों के साथ करेंगे, उसी को देख-देख कर हमारे बच्चों में भी वही संस्कार आते हैं। बच्चे सोचते हैं कि शायद हमारे घर की यही परंपरा है। माता-पिता की सेवा ही हमारा सबसे बड़ा और प्रथम दायित्व बनता है।

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