Bharat aur Bahubali ki Katha: क्या सच में मिट्टी के टुकड़े के लिए भाई ने भाई पर अस्त्र चलाया?

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

भरत और बाहुबली की पौराणिक कथा

"अहंकार से वैराग्य तक की एक अद्भुत यात्रा"

भाई-भाई का संघर्ष

सत्ययुग की बात है, महाराज ऋषभदेव ने अपना राज्य अपने दोनों पुत्रों—भरत और बाहुबली—में विभाजित कर दिया था ताकि उनमें कोई कलह न हो। भरत ज्येष्ठ थे और बाहुबली छोटे। दोनों ही वीर और पराक्रमी थे, परन्तु दोनों के विचारों में महान अन्तर था।

भरत महत्त्वाकांक्षी थे, जबकि बाहुबली भक्तिमान् एवं सन्तोषप्रिय थे। भरत के मन में 'चक्रवर्ती सम्राट' बनने की इच्छा थी। अपनी शक्ति के बल पर वे लगभग सभी राज्यों को जीत चुके थे, केवल उनके छोटे भाई बाहुबली का राज्य शेष था।

"यदि भरत प्रेम से कहते तो बाहुबली मान जाते, परन्तु विजय-मद में आकर भरत ने धमकी भरा सन्देश भिजवाया—'या तो मेरी अधीनता स्वीकार कर लो अथवा युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।'"

बाहुबली को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने संयत होकर उत्तर दिया: "मैं आपका सम्मान करता हूँ, परन्तु आप इस राज्य पर कुदृष्टि न डालें।" इस उत्तर से भरत क्रोधित हो उठे और युद्ध की घोषणा कर दी।

मल्लयुद्ध और चक्ररत्न का प्रयोग

भयंकर रक्तपात को रोकने के लिए मंत्रियों ने सुझाव दिया कि दोनों भाई आपस में 'मल्लयुद्ध' (कुश्ती) करके निर्णय कर लें। दोनों भाई अखाड़े में उतरे।

बाहुबली की भुजाओं में अपार शक्ति थी। जब भरत ने अपनी हार निकट देखी, तो आक्रोश में आकर उन्होंने बाहुबली पर "चक्ररत्न" नामक अमोघ अस्त्र चला दिया। यह अस्त्र कुटुम्बियों पर असर नहीं करता था, इसलिए वह बाहुबली के पास जाकर वापस लौट आया।

भरत के इस अनुचित व्यवहार से बाहुबली क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने अपनी शक्तिशाली भुजाओं से भरत को सिर से ऊपर उठा लिया और उन्हें जमीन पर पटकने ही वाले थे कि...

विवेक का जागरण (वैराग्य)

अचानक बाहुबली का विवेक जाग उठा। उन्होंने सोचा—"धिक्कार है पृथ्वी के इस छोटे-से टुकड़े पर जिसके लिये मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता को मारने को उद्यत हो गया।"

उन्होंने भरत को धीरे से नीचे उतारा और कहा: "संभालिये यह राज्य! मुझे ऐसा राज्य वैभव नहीं चाहिये जिसके लोभ में मनुष्य अपना विवेक खो बैठता है।"

बाहुबली ने उसी क्षण केवल राज्य ही नहीं, बल्कि संसार का भी त्याग कर दिया और सद्गुरु से दीक्षित होकर भक्ति-मार्ग पर चल पड़े।

सन्त कबीर की चेतावनी

संसारी मनुष्य धन-जायदाद के लिए अपनों का खून बहाने से भी नहीं हिचकिचाते। वे भूल जाते हैं कि हम यहाँ कुछ दिनों के मेहमान हैं। इसी सत्य को परमसन्त कबीर जी ने अपने दोहों में समझाया है:

हम जानै थे खायेंगे, बहु ज़मीन बहु माल।
ज्यों का त्यों ही रह गया, पकरि लै गया काल।।
अर्थ: मनुष्य सोचता है कि वह बहुत सारी ज़मीन और धन का भोग करेगा, परन्तु जब काल (मृत्यु) उसे पकड़ कर ले जाता है, तो सब कुछ यहीं धरा का धरा रह जाता है।
जात सबन कहँ देखिया, कहै कबीर पुकार।
चेता होहु तो चेति ल्यो, रैन दिवस चलै धार।।
अर्थ: कबीर जी पुकार कर कहते हैं कि सभी को यहाँ से जाते हुए देखा जा रहा है। काल की तेज़ धार रात-दिन चल रही है, इसलिए समझदारी इसी में है कि अभी से चेत जाओ (जाग जाओ)।
कबीर सो धन संचिये, जो आगे को होय।
सीस उठाये गाठरी, जात न देखा कोय।।
अर्थ: यदि धन इकट्ठा करना ही है, तो वह धन (भक्ति/पुण्य) इकट्ठा करो जो परलोक में साथ जाए। सांसारिक धन की गठरी सिर पर रखकर ले जाते हुए आज तक किसी को नहीं देखा गया।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!