जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः | Janami Dharmam Shloka Meaning, Analysis & Story in Hindi

Sooraj Krishna Shastri
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विस्तृत श्लोक विश्लेषण - भगवद्दर्शन

॥ पांडव गीता ॥

दुर्योधन का मनोवैज्ञानिक रहस्योद्घाटन

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः |
जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ||
केनापि देवेन हृदि स्थितेन |
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ||
Jānāmi dharmaṃ na ca me pravṛttiḥ |
Jānāmyadharmaṃ na ca me nivṛttiḥ ||
Kenāpi devena hṛdi sthitena |
Yathā niyukto'smi tathā karomi ||

अन्वय एवं सरल अनुवाद

अन्वय: अहं धर्मं जानामि (परन्तु) मे प्रवृत्तिः न च। अहं अधर्मं जानामि (परन्तु) मे निवृत्तिः न च। हृदि स्थितेन केनापि देवेन यथा नियुक्तः अस्मि, तथा (एव) करोमि।
अनुवाद: मैं जानता हूँ कि धर्म क्या है, किंतु उसमें मेरी स्वाभाविक प्रवृत्ति (inclination) नहीं है। मैं यह भी जानता हूँ कि अधर्म क्या है, पर उससे पीछे हटने की शक्ति मुझमें नहीं है। मेरे हृदय में स्थित कोई 'अदृश्य शक्ति' मुझे जैसा करने को प्रेरित करती है, मैं वैसा ही करता हूँ।

विस्तृत शब्दार्थ (Etymology)

जानामि'ज्ञा' धातु - बौद्धिक ज्ञान होना (Intellectual knowing)
प्रवृत्तिःप्र + वृत् - किसी कार्य की ओर स्वाभाविक झुकाव
निवृत्तिःनि + वृत् - किसी लत या कार्य से पीछे हट जाना
केनापि देवेनकिसी (अज्ञात) देव द्वारा - यहाँ देव का अर्थ 'स्वभाव' या 'प्रारब्ध' है।
नियुक्तोऽस्मिनियुक्तः + अस्मि - जैसे किसी को ड्यूटी पर लगा दिया गया हो।

दार्शनिक विश्लेषण (Deep Insight)

यह श्लोक मनुष्य के 'बुद्धि' और 'मन' के बीच के महान अंतर को स्पष्ट करता है।

  • बुद्धि (Intellect): यह निर्णय लेती है कि क्या सही है (जानामि धर्मं)।
  • मन (Mind/Habits): यह अपने पुराने संस्कारों के वश में होकर कार्य करता है (तथा करोमि)।

दुर्योधन यहाँ कोई बहाना नहीं बना रहा, बल्कि वह उस कड़वे सत्य को स्वीकार कर रहा है कि उसकी वासनाएँ उसके विवेक से अधिक बलवान हो चुकी हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति की है जो शास्त्र तो पढ़ा है, पर जिसने साधना (Practice) नहीं की।

कठोपनिषद् का रथ रूपक (Comparison)

ऋषियों ने शरीर को रथ और बुद्धि को सारथी कहा है। यदि इंद्रियों रूपी घोड़े बेलगाम हो जाएँ, तो सारथी (बुद्धि) को रास्ता पता होने के बावजूद रथ गलत दिशा में ही जाएगा।

दुर्योधन का सारथी (बुद्धि) दुर्बल था, इसलिए उसके घोड़े (इंद्रियाँ) उसे अधर्म की ओर खींच ले गए।

व्याकरणात्मक विशेष

1. यण संधि: 'जानाम्यधर्मं' (जानामि + अधर्मम्)। यहाँ 'इ' का 'य्' हुआ है।

2. विसर्ग संधि: 'नियुक्तोऽस्मि' (नियुक्तः + अस्मि)।

3. समास: 'हृदिस्थितेन' - हृदि स्थितः (तृतीया तत्पुरुष), जो हृदय में स्थित है।

संवादात्मक बोधकथा: दो विचारधाराएँ

एक शिष्य ने गुरु से पूछा— "महाराज, हम गलत काम क्यों करते हैं जबकि हम जानते हैं कि वह गलत है?"

गुरु ने कहा— "बेटा, हमारे अंदर दो राजा युद्ध कर रहे हैं। एक राजा प्रकाश (ज्ञान) का है, दूसरा अंधकार (आलस्य/वासना) का। जीत उसकी होती है जिसे तुम रोज खाना खिलाते हो।"

निष्कर्ष: दुर्योधन ने अपने जीवन भर नकारात्मक विचारों के राजा को पुष्ट किया था, इसलिए अंत समय में उसका ज्ञान उसे बचा नहीं पाया।

आधुनिक जीवन में प्रयोग

आज के समय में यह श्लोक 'एडिक्शन' (Addiction) के मनोविज्ञान को समझाता है। एक व्यक्ति जानता है कि नशा बुरा है, लेकिन वह कहता है— "मैं क्या करूँ, मेरा मन नहीं मानता।" समाधान केवल सूचना (Information) में नहीं, बल्कि चित्त शुद्धि (Mental Purification) और योग में है।

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सनातन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास

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