Dharmo Rakshati Rakshitah: हर हिन्दू को 'क्षत्रिय' क्यों बनना चाहिए? 🚩 Rashtra Raksha Truth

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

धर्म, राष्ट्र रक्षा और क्षत्रिय धर्म का महत्व

"राष्ट्रभक्ति ही ईश्वर भक्ति है, स्वराष्ट्र रक्षा ही ईश्वर पूजा है"

हमारे धर्म शास्त्रों ने स्वदेश, स्वधर्म एवं स्व-संस्कृति की रक्षा के लिए देशवासियों में संकल्प शक्ति एवं राष्ट्र भक्ति जगाने की विधियों के साथ-साथ सशस्त्र धर्मयुद्ध करने का भी स्पष्ट आदेश दिया है।

इसका मूल मंत्र है – ‘ब्रह्मबल’ और ‘क्षात्रबल’ का समुचित समन्वयन करना।

‘यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यंचौ चरतौ सह।
तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना’
(यजुर्वेद २०:२५)
अर्थ: “जिस देश में ‘ब्रह्म बल’ (ज्ञान-विज्ञान की शक्ति) और ‘क्षत्रिय बल’ (सैनिक शक्ति, राष्ट्र भक्ति व सामूहिक बल) मिलकर कार्य करते हैं, वह देश कल्याणकारी, सुरक्षित और सब प्रकार से उन्नत होता है।”

यही बात महाभारत में बार-बार कही गयी है:

“अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ||”
अर्थ: “आगे चारों वेद हों और पीठ पर बाणों सहित धनुष हो। एक तरफ शास्त्रादि के ‘ब्रह्मबल’ से और दूसरी तरफ शस्त्रादि के ‘क्षात्र बल’ से स्वधर्म एवं स्वदेश की रक्षा करो!”

क्षत्रिय धर्म की सर्वश्रेष्ठता

हिन्दू धर्म शास्त्रों में ‘क्षात्र या क्षत्रिय धर्म’ सबसे पहले स्थापित किया गया है। महाभारत के अनुसार:

  • आदि देव भगवान् से सबसे पहले क्षात्र धर्म ही प्रवृत्त हुआ है।
  • जो राजा (नेता) सैनिक दृष्टि से संपन्न नहीं है; धर्म परायण होते हुए भी, वे प्रजा की रक्षा नहीं कर सकते।
  • क्षत्रिय धर्म में सभी धर्मों का समावेश हो जाता है, इसलिए इसे ‘श्रेष्ठ धर्म’ कहते हैं।
“इस प्रकार संसार भर में क्षत्रीय धर्म ही सब धर्मों में श्रेष्ठ, सनातन, अविनाशी एवं मोक्ष तक पहुंचानेवाला सर्वतोमुखी है।”

राजधर्म को प्रधानता

महाभारत में क्षात्र धर्म को 'राजधर्म' भी कहा है।

“सब धर्मों में राजधर्म सबसे श्रेष्ठ है! इसी से सब वर्णों की पालना होती है!”

हिन्दू राजधर्म का अर्थ है – “राज्य सत्ता पाना और उसे पक्षपात रहित, समतावादी व्यवस्थानुसार लोक कल्याण के लिए न्यायपूर्वक चलाना।”

क्षत्रिय धर्म का वास्तविक स्वरूप

क्षत्रिय धर्म केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। इसकी परिभाषा अति व्यापक है:

  • शत्रु से युद्ध करते हुए बलिदान देना।
  • समस्त प्राणियों पर दया करना।
  • प्रजा की रक्षा करना और लोक व्यवहार का ज्ञान रखना।
  • विवाद ग्रस्त व पीड़ित स्त्री-पुरुषों को दुखों से मुक्ति दिलाना।

अतः समाज के हर वर्ग के स्त्री-पुरुषों पर होने वाले अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाला प्रत्येक व्यक्ति क्षत्रिय है

धर्म एवं राष्ट्र रक्षा के सन्दर्भ में, प्रत्येक हिन्दू पहले क्षत्रिय है, फिर कुछ और!

धर्मो रक्षति रक्षितः

प्राचीन काल में राजा और सेना धर्म की रक्षा करते थे, परन्तु आज के प्रजातंत्र में हिन्दू को अपने राष्ट्र व धर्म की रक्षा स्वयं करनी होगी। मनुस्मृति का आदेश:

“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ||”
अर्थ: “मारा हुआ व उपेक्षित किया हुआ धर्म, मारने वाले का नाश करता है; और रक्षित किया हुआ धर्म, रक्षक की रक्षा करता है!”

प्रजातंत्र में कर्तव्य और समाधान

आज हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा केवल कर्म-काण्ड से नहीं हो सकती। बिना राजशक्ति के अध्यात्म पंगु है।

  • वीर सावरकर का सूत्र: “राजनीति का हिन्दुकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण करो!”
  • सामूहिक शक्ति: राष्ट्रभक्तों के त्याग और प्रचार से ‘हिन्दू वोट बैंक’ को सुदृढ़ करना होगा।
  • आत्म-रक्षा: आज देश की सुरक्षा केवल सेना या कोर्ट के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय में राष्ट्र रक्षा का दृढ़ संकल्प होना अनिवार्य है।

राष्ट्र रक्षा के लिए आह्वान

हे आर्यों! हे हिन्दुओं! मत भूलो!

तुम विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राचीनतम जाति हो। मानवता का सन्देश तुमने ही दिया है। आज यदि धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी है, तो अपने अन्तःकरण में सोये हुए क्षत्रियत्व को जगाओ।

सम्प्रदाय, भाषा और प्रांत के भेदभाव भुलाकर धर्म रक्षा का संकल्प लो।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!