Gangaur Vrat Katha in Hindi: गणगौर की संपूर्ण कहानी | शिव-पार्वती और नारद जी का प्रसंग

Sooraj Krishna Shastri
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गणगौर व्रत कथा

अखंड सौभाग्य और शिव-पार्वती के प्रेम की दिव्य कहानी

चैत्र शुक्ल तृतीया (गणगौर) का दिन भारतीय संस्कृति में सुहागिनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन की पौराणिक कथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पृथ्वी भ्रमण से जुड़ी है।

एक बार भगवान शंकर, माता पार्वती और नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण के लिए निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँचे।

१. निर्धन और धनी स्त्रियों की भक्ति

गाँव में भगवान के आगमन का समाचार सुनकर निर्धन वर्ग की स्त्रियाँ तुरंत अपनी थालियों में हल्दी, अक्षत और जल लेकर पूजा के लिए पहुँच गईं। उनकी निश्छल भक्ति देख पार्वती जी प्रसन्न हुईं।

पार्वती जी ने उन पर सारा 'सुहाग रस' छिड़क दिया और उन्हें अटल सुहाग का वरदान देकर विदा किया।

थोड़ी देर बाद धनी वर्ग की स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार करके, सोने-चाँदी की थालियों में छप्पन भोग लेकर आईं। उन्हें देखकर भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए प्रश्न किया:

भगवान शिव: "देवि! तुमने तो सारा सुहाग रस निर्धन स्त्रियों को दे दिया। अब इन धनी स्त्रियों को क्या दोगी?"
माता पार्वती: "प्राणनाथ! उन स्त्रियों को मैंने ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है, इसलिए उनका सुहाग धोती (वस्त्र) की तरह रहेगा। परन्तु इन स्त्रियों को मैं अपनी उंगली चीरकर रक्त का सुहाग रस दूँगी। ये मेरे समान सौभाग्यवती होंगी।"

जब धनी स्त्रियों ने पूजन समाप्त किया, तो पार्वती जी ने अपनी उंगली चीरकर रक्त के छींटे उन पर डाल दिए। जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसने वैसा ही अखंड सुहाग प्राप्त कर लिया।

२. पार्वती जी की गुप्त पूजा और बालू का शिवलिंग

इसके बाद पार्वती जी भगवान शिव से आज्ञा लेकर नदी तट पर स्नान करने चली गईं। वहाँ उन्होंने बालू (रेत) से शिवलिंग बनाया और विधि-विधान से पूजा की।

उन्होंने भोग लगाया और प्रदक्षिणा करके दो कण प्रसाद ग्रहण किया। उसी समय पार्थिव शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान दिया:

✋ शिव का वरदान
"आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी, उसका पति चिरंजीवी होगा और अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करेगी।"

३. मायावी महल और दूध-भात

पूजन में अधिक समय लग गया। जब पार्वती जी लौटीं, तो महादेव ने देरी का कारण पूछा। पार्वती जी ने उस गुप्त पूजा को छिपाने के लिए कहा:

माता पार्वती: "नदी किनारे मुझे मेरे मायके वाले (भाई-भावज) मिल गए थे। उन्होंने दूध-भात खाने और ठहरने का आग्रह किया, इसी कारण देर हो गई।"

अंतर्यामी भगवान शिव सब जानते थे, फिर भी लीला रचते हुए बोले- "तो चलो, मैं भी तुम्हारे मायके चलकर दूध-भात खाऊँगा।"

पार्वती जी संकट में पड़ गईं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव से अपनी लाज रखने की प्रार्थना की। वे शिवजी के पीछे-पीछे चलने लगीं। और तभी चमत्कार हुआ!

🏰 माया का महल:
नदी तट पर एक भव्य महल दिखाई दिया। महल के अंदर शिवजी के साले और सरहज (पार्वती जी के कल्पित भाई-भाभी) ने उनका जोरदार स्वागत किया। वे दो दिन वहाँ रहे और खूब आदर-सत्कार प्राप्त किया।

४. नारद जी और माला का रहस्य

तीसरे दिन जब पार्वती जी ने चलने को कहा, तो शिवजी तैयार नहीं हुए। तब पार्वती जी रूठकर अकेले चल दीं, जिसके कारण शिवजी और नारद जी को भी साथ चलना पड़ा।

चलते-चलते भगवान शिव बोले- "मैं तो अपनी माला तुम्हारे मायके में ही भूल आया।"

पार्वती जी माला लाने जाने लगीं, लेकिन शिवजी ने उन्हें रोका और नारद जी को भेजा। नारद जी जब वहाँ पहुँचे, तो दंग रह गए।

वहाँ कोई महल नहीं था, न कोई बस्ती थी। दूर-दूर तक केवल घना जंगल था। तभी बिजली कौंधी और नारद जी ने देखा कि शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी हुई है।

नारद जी माला लेकर भागे और शिवजी के पास पहुँचकर बोले- "प्रभु! यह कैसा चमत्कार है? वहाँ तो जंगल के सिवा कुछ नहीं है।"

भगवान शिव (हँसते हुए): "मुनिवर! यह सब पार्वती की ही लीला (माया) थी। उन्होंने अपनी पूजा को गुप्त रखने के लिए यह रचना रची थी।"
माता पार्वती (विनम्रता से): "मैं किस योग्य हूँ नाथ! यह सब तो आपकी ही कृपा का प्रभाव है।"

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