क्या गुस्सा भी अच्छा हो सकता है? | Kupito Api Gunayaiva Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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क्या गुस्सा भी अच्छा हो सकता है? | Kupito Api Gunayaiva Shloka Meaning

गुणवान का क्रोध भी वरदान है

कुपितोऽपि गुणायैव
गुणवान् भवति ध्रुवम्।
स्वभावमधुरं क्षीरं
क्वथितं हि रसोत्तरम्॥
Kupito'pi guṇāyaiva
guṇavān bhavati dhruvam |
Svabhāvamadhuraṁ kṣīraṁ
kvathitaṁ hi rasottaram ||
हिन्दी अनुवाद:
"गुणवान (सज्जन) व्यक्ति यदि क्रोधित भी होता है, तो वह निश्चित रूप से किसी (अच्छे) गुण या लाभ के लिए ही होता है। (जैसे) स्वभाव से मीठा दूध, उबाले जाने पर (तपने पर) और अधिक स्वादिष्ट (रसोत्तर) हो जाता है।"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
कुपितः अपि क्रोधित होने पर भी Even when angry
गुणाय एव गुण/लाभ के लिए ही Only for virtue/good
गुणवान् सज्जन/ज्ञानी व्यक्ति Virtuous person
ध्रुवम् निश्चित रूप से Certainly/Surely
स्वभाव-मधुरं जो स्वभाव से मीठा है Naturally sweet
क्षीरं दूध Milk
क्वथितं हि उबाले जाने पर ही When boiled
रसोत्तरम् अधिक स्वादिष्ट/रसीला More tasty/excellent

(↔ तालिका को खिसका कर देखें)

🧠 दृष्टान्त (Analogy)

1. दूध और अग्नि:
कवि ने क्रोध की तुलना 'अग्नि' (Fire) से और सज्जन की तुलना 'दूध' (Milk) से की है। साधारण व्यक्ति क्रोध में जलकर राख (कोयला) हो जाता है, लेकिन सज्जन व्यक्ति क्रोध की आंच में तपकर 'रबड़ी' या 'खोया' बन जाता है, जो और अधिक कीमती है।
2. उद्देश्य (Intent):
मूर्ख का क्रोध 'विनाश' (Destruction) के लिए होता है, जबकि ज्ञानी का क्रोध 'सुधार' (Correction) के लिए होता है। इसे 'सात्विक क्रोध' कहा जाता है।

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

यह श्लोक 'Parenting' (परवरिश) और 'Mentorship' (मार्गदर्शन) का आधार है:

  • माता-पिता की डांट: जब माँ बच्चे को डांटती है (उबालती है), तो उसे बच्चे से नफरत नहीं होती। वह चाहती है कि बच्चे की बुराइयां भाप बनकर उड़ जाएं और उसके गुण निखर कर आएं।
  • बॉस या कोच: एक अच्छा कोच खिलाड़ी पर चिल्लाता है ताकि वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दे सके। यह क्रोध 'गुणायैव' (गुण बढ़ाने के लिए) है।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

🏺 कुम्हार और घड़ा

एक बच्चा कुम्हार को घड़ा बनाते हुए देख रहा था। कुम्हार एक हाथ से गीली मिट्टी को बाहर से जोर-जोर से पीट रहा था (थपकी दे रहा था)।

बच्चे ने पूछा: "काका! आप इस मिट्टी को क्यों मार रहे हो? इसे दर्द नहीं होता?"

कुम्हार ने मुस्कुराते हुए कहा: "बेटा, ध्यान से देखो। मेरा एक हाथ बाहर से चोट मार रहा है (क्रोध), लेकिन मेरा दूसरा हाथ घड़े के अंदर है जो इसे सहारा दे रहा है (प्रेम)। अगर मैं बाहर से नहीं मारूंगा, तो यह टेढ़ा-मेढ़ा बनेगा। और अगर अंदर से सहारा नहीं दूंगा, तो यह टूट जाएगा।"

निष्कर्ष: सज्जन व्यक्ति का क्रोध कुम्हार की उस बाहरी थपकी जैसा होता है—जो चोट तो पहुँचाता है, पर केवल जीवन को सुंदर आकार देने के लिए।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

अगर कोई अपना (हितैषी) आप पर क्रोध करे, तो बुरा न मानें।
याद रखें—दूध उबलकर ही 'रबड़ी' बनता है और सोना तपकर ही 'कुंदन' बनता है।
उस क्रोध के पीछे छिपे 'सुधार' को पहचानें।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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