महाकवि कालिदास: 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' के रचयिता, 'उपमा' के सम्राट और संस्कृत साहित्य के कविकुलगुरु | Mahakavi Kalidasa

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि कालिदास: संस्कृत साहित्य के कविकुलगुरु और उपमा के सम्राट

महाकवि कालिदास: संस्कृत साहित्य के 'कविकुलगुरु' और 'उपमा' के सम्राट

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, साहित्यिक और काव्यशास्त्रीय विश्लेषण: प्राचीन भारत का वह महानतम साहित्यकार जिसकी कलम से प्रकृति ने श्रृंगार किया, जिसके नाटकों ने जर्मन दार्शनिकों को झूमने पर विवश कर दिया, और जिनकी 'उपमाओं' ने संस्कृत साहित्य को विश्व के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया। (The Shakespeare of India, predating him by a millennium)

संस्कृत साहित्य के विस्तृत आकाश में अनगिनत तारे (कवि) चमके, लेकिन महाकवि कालिदास (Mahakavi Kalidasa) उस आकाश के पूर्ण चंद्रमा हैं। उन्हें 'कविकुलगुरु' (कवियों के कुल के गुरु) कहा जाता है।

उनका साहित्य केवल शब्दों का जाल नहीं है; यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—भारतीय दर्शन के इन चार पुरुषार्थों का अत्यंत संतुलित और संगीतमय गायन है। जब 18वीं शताब्दी में सर विलियम जोंस ने 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' का अंग्रेजी में अनुवाद किया, तो पश्चिमी जगत यह देखकर स्तब्ध रह गया कि प्राचीन भारत में शेक्सपियर से भी हजार साल पहले ऐसा परिष्कृत, मनोवैज्ञानिक और प्रकृति-प्रेमी साहित्य रचा जा चुका था।

📌 महाकवि कालिदास: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
उपाधि / नाम महाकवि, कविकुलगुरु, दीपशिखा कालिदास (काली देवी के दास)।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) सटीक जन्म/मृत्यु वर्ष अज्ञात है, लेकिन दो मुख्य ऐतिहासिक मत हैं:

1. पारंपरिक मत (1st Century BCE): जनश्रुतियों के अनुसार वे 'विक्रम संवत' (57 ई.पू.) चलाने वाले उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे।

2. आधुनिक अकादमिक मत (Late 4th - Early 5th Century CE): अधिकांश इंडोलॉजिस्ट्स और इतिहासकार उन्हें गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) के स्वर्ण युग का मानते हैं। वे चंद्रगुप्त द्वितीय (जिन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि ली थी) और कुमारगुप्त के समकालीन थे।
(उनका काल लगभग 380 ई. से 450 ई. के बीच सर्वमान्य है। 634 ई. के 'ऐहोल शिलालेख' में कालिदास का नाम स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण है)।
जन्म स्थान / कर्मभूमि उज्जयिनी (उज्जैन, मध्य प्रदेश) से उनका विशेष लगाव था ('मेघदूत' में उज्जैन का अत्यंत सजीव वर्णन है)। कश्मीरी विद्वान उन्हें कश्मीर का, और कुछ बंगाल का मानते हैं।
कुल प्रामाणिक कृतियाँ 7 (सप्त-कृतियाँ): 2 महाकाव्य, 2 खण्डकाव्य (गीतिकाव्य), और 3 नाटक।
काव्य-शैली वैदर्भी रीति (माधुर्य गुण से युक्त, कोमल और समास-रहित शब्दावली)।
प्रिय अलंकार उपमा (Simile) - "उपमा कालिदासस्य"।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: प्रथम शती ई.पू. या गुप्त काल?

कालिदास के जीवन के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वे प्रारंभिक जीवन में अत्यंत मूर्ख थे। वे उसी पेड़ की डाल काट रहे थे जिस पर वे बैठे थे। कुछ धूर्त पंडितों ने छल से उनका विवाह परम विदुषी राजकुमारी विद्योत्तमा से करा दिया। जब विद्योत्तमा को उनकी मूर्खता का पता चला, तो उसने उन्हें घर से निकाल दिया।

पत्नी के तिरस्कार से दुखी होकर कालिदास ने माता काली की घोर उपासना की और अपार विद्या प्राप्त की। घर लौटकर उन्होंने दरवाज़ा खटखटाते हुए कहा: "अनावृतकपाटं द्वारं देहि" (दरवाज़ा खोलो)। पत्नी ने अंदर से पूछा: "अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः?" (क्या वाणी में कुछ विशेष प्राप्त हुआ है?)।
कहा जाता है कि कालिदास ने इन तीनों शब्दों (अस्ति, कश्चित्, वाक्) से अपने तीन महान काव्यों की रचना कर दी:
- अस्ति से कुमारसम्भवम् (अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा...)
- कश्चित् से मेघदूतम् (कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा...)
- वाक् से रघुवंशम् (वागर्थाविव सम्पृक्तौ...)

3. कालिदास की अमर संपदा: सप्त-कृतियाँ (The Seven Masterpieces)

यद्यपि कालिदास के नाम से अनेक ग्रंथ जोड़े जाते हैं, लेकिन विद्वानों द्वारा उनकी सात रचनाओं को ही प्रामाणिक माना गया है:

  • महाकाव्य (Epics): रघुवंशम् (सूर्यवंशी राजाओं का इतिहास), कुमारसम्भवम् (शिव-पार्वती विवाह और कार्तिकेय जन्म)।
  • खण्डकाव्य / गीतिकाव्य (Lyric Poetry): मेघदूतम् (यक्ष का विरह), ऋतुसंहारम् (छह ऋतुओं का वर्णन)।
  • नाटक (Plays): अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम्।

4. 'अभिज्ञानशाकुंतलम्': काव्येषु नाटकं रम्यं...

अभिज्ञानशाकुंतलम् (The Recognition of Shakuntala) कालिदास की नाट्य-कला का चरमोत्कर्ष है। इसके बारे में संस्कृत के आलोचकों ने कहा है:

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्॥
(अर्थ: सभी काव्य-रूपों में 'नाटक' सबसे सुंदर है, नाटकों में 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' सबसे सुंदर है। उस नाटक में भी 'चौथा अंक' (विदाई का दृश्य) सर्वश्रेष्ठ है, और उस चौथे अंक में महर्षि कण्व द्वारा कहे गए 'चार श्लोक' सर्वोत्कृष्ट हैं।)
मनोविज्ञान और प्रकृति का समन्वय

यह नाटक राजा दुष्यंत और महर्षि विश्वामित्र-मेनका की पुत्री शकुंतला की प्रेम कथा है। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण राजा शकुंतला को भूल जाता है, और बाद में एक अंगूठी (अभिज्ञान/Signet Ring) देखकर उसे सब याद आता है।

इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता 'प्रकृति' (Nature) का एक सजीव पात्र के रूप में उपयोग है। चौथे अंक में जब शकुंतला पति के घर (ससुराल) विदा होती है, तो तपोवन के वृक्ष अपने पत्ते गिराकर आंसू बहाते हैं, हिरण का बच्चा शकुंतला का पल्लू पकड़ कर रोकता है। महान जर्मन कवि गोएथे (Goethe) ने इस नाटक को पढ़कर इसे "स्वर्ग और पृथ्वी का मिलन" (Union of Heaven and Earth) कहा था।

5. 'रघुवंशम्': सूर्यवंशी राजाओं का आदर्श और शिव-पार्वती वंदना

रघुवंशम् (The Dynasty of Raghu) 19 सर्गों का एक विशाल महाकाव्य है। इसमें राजा दिलीप से लेकर अग्निर्ण तक सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) के 31 राजाओं (जिनमें भगवान राम भी शामिल हैं) का चरित्र-चित्रण है।

इस ग्रंथ का प्रथम श्लोक (मंगलाचरण) संपूर्ण संस्कृत साहित्य का सबसे प्रसिद्ध और दार्शनिक मंगलाचरण है:

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
(अर्थ: वाणी (शब्द) और अर्थ की सही प्राप्ति के लिए, मैं 'शब्द' और 'अर्थ' की भांति ही एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए, इस जगत के माता-पिता—माता पार्वती और भगवान परमेश्वर (शिव) की वंदना करता हूँ।)

रघुवंश में कालिदास ने 'आदर्श राजा' (Ideal King) की परिभाषा गढ़ी है। राजा दिलीप की गौ-सेवा, रघु का दिग्विजय, अज का विलाप और राम का मर्यादा-पालन—ये सभी प्रसंग भारतीय राजनीति और नैतिकता के उच्च मानक हैं।

6. 'मेघदूतम्': विश्व का प्रथम 'दूत-काव्य' और विप्रलम्भ शृंगार

मेघदूतम् (The Cloud Messenger) मात्र 111 से अधिक श्लोकों का एक छोटा सा 'गीतिकाव्य' (Lyric Poem) है, लेकिन इसने विश्व साहित्य में एक नई विधा—दूतकाव्य (Messenger Poetry) को जन्म दिया।

कथा: कुबेर के शाप से रामगिरि पर्वत (रामटेक) पर निर्वासन झेल रहा एक 'यक्ष' अपनी प्रियतमा (यक्षिणी) के विरह में तड़प रहा है। आषाढ़ के पहले दिन वह आकाश में एक काले मेघ (बादल) को उड़ते हुए देखता है। वह यक्ष उस जड़ बादल को सजीव मानकर, उसे अपना दूत (Messenger) बनाता है और अलकापुरी (हिमालय) में बैठी अपनी पत्नी तक अपना संदेश भेजने की प्रार्थना करता है।

इस काव्य को 'मन्दाक्रान्ता' छंद में लिखा गया है (जिसकी लय अत्यंत धीमी और करुणा से भरी होती है)। इसमें कालिदास ने रामगिरि से लेकर अलकापुरी तक के भारत के भूगोल—नदियों (रेवा, नर्मदा, क्षिप्रा), पर्वतों और नगरों (उज्जयिनी)—का इतना सटीक और सजीव 'एरियल व्यू' (Aerial View) खींचा है कि आज भी गूगल मैप (Google Maps) उसकी सटीकता पर आश्चर्य करता है।

7. 'उपमा कालिदासस्य': उपमा अलंकार का काव्यात्मक विज्ञान

संस्कृत साहित्य में एक श्लोक अत्यंत प्रसिद्ध है: "उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्। दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥" अर्थात्, कालिदास 'उपमा' (Simile) अलंकार के सम्राट हैं।

उपमा का जादू और 'दीपशिखा कालिदास' की उपाधि

उपमा का अर्थ है दो भिन्न वस्तुओं में समानता दिखाना (जैसे—चांद सा मुखड़ा)। कालिदास की उपमाएं केवल 'सजावट' नहीं होतीं, वे दृश्य को पूरी तरह स्पष्ट (Visualise) कर देती हैं।

रघुवंशम् (6.67) में इन्दुमती के स्वयंवर का दृश्य है। राजकुमारी इन्दुमती वरमाला लेकर राजाओं की कतार के सामने से गुजर रही है। वह जिस राजा के सामने से आगे बढ़ जाती है, उस राजा का चेहरा निराशा से अंधकारमय हो जाता है। कालिदास लिखते हैं:

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः॥

(अर्थ: रात के अंधेरे में महलों के राजमार्ग पर चलती हुई दीपक की लौ (दीपशिखा) के समान वह इन्दुमती जिस-जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती, वह-वह राजा उस महल की अटारी के समान अंधकारमय (विवर्ण/उदास) हो जाता था।)
इस एक उपमा ने उन्हें 'दीपशिखा कालिदास' की उपाधि दिला दी।

8. 'वैदर्भी रीति' और प्रकृति का मानवीकरण (Personification)

कालिदास 'वैदर्भी रीति' के प्रवर्तक माने जाते हैं। बाद के कवियों (जैसे बाणभट्ट या भवभूति) ने अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिए बहुत लंबे-लंबे और क्लिष्ट शब्द (कठोर समास) लिखे। लेकिन कालिदास की भाषा नदी के जल जैसी पारदर्शी (Transparent) है। उसमें माधुर्य (Sweetness) और प्रसाद गुण है। उनके शब्द सीधे हृदय में उतरते हैं।

इसके अतिरिक्त, कालिदास के साहित्य में 'प्रकृति' कोई बैकग्राउंड (Background) नहीं है, बल्कि वह कथा का एक सक्रिय पात्र (Active Character) है। मेघदूत का बादल, शाकुंतलम् के वृक्ष और हिरण, ऋतुसंहार की ऋतुएं—ये सभी मानवों की तरह रोते, हंसते और सहानुभूति प्रकट करते हैं।

9. निष्कर्ष: भारत की सांस्कृतिक आत्मा के गायक

महाकवि कालिदास (लगभग 4थी-5वीं शती ई.) केवल एक 'रोमांटिक कवि' नहीं थे। उन्होंने रघुवंश में 'धर्म' सिखाया, मेघदूत में 'काम' (प्रेम) की पराकाष्ठा दिखाई, कुमारसम्भव में तपस्या (मोक्ष) की शक्ति दिखाई और अभिज्ञानशाकुंतलम् में इन सभी का समन्वय किया।

कहा जाता है: "पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः।" (जब प्राचीन काल में श्रेष्ठ कवियों की गिनती शुरू हुई, तो कालिदास का नाम सबसे छोटी उंगली—कनिष्ठिका—पर रखा गया। लेकिन उनके बाद कोई दूसरा उनके समान कवि मिला ही नहीं, इसलिए उसके पास वाली उंगली 'अनामिका' (बिना नाम वाली) कहलाने लगी)। कालिदास भारतीय ज्ञान परंपरा के वह मुकुटमणि हैं, जिनकी चमक समय बीतने के साथ और अधिक बढ़ती जा रही है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूतम् एवं रघुवंशम् (मूल संस्कृत श्लोक एवं मल्लिनाथ की 'संजीवनी' टीका)।
  • Kalidasa: His Art and Culture - Dr. Ram Gopal.
  • A History of Indian Literature (Vol 3) - Maurice Winternitz (कालिदास का काल निर्धारण - गुप्त युग)।
  • कालिदास ग्रंथावली (अनुवाद: डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, चौखम्बा प्रकाशन)।

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