महाकवि अश्वघोष: 'बुद्धचरित' के प्रणेता और संस्कृत के प्रथम शास्त्रीय महाकवि
एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, साहित्यिक और दार्शनिक विश्लेषण: कुषाण साम्राज्य का वह बौद्ध भिक्षु जिसने संस्कृत काव्य को 'शृंगार' की सीमाओं से निकालकर 'शांत रस' (मोक्ष) के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया। (The Pioneer of Classical Sanskrit Mahakavya)
- 1. प्रस्तावना: संस्कृत साहित्य का एक नया सूर्योदय
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: सम्राट कनिष्क के राजकवि
- 3. 'बुद्धचरित': तथागत का प्रथम और सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य
- 4. 'सौंदरनंद': मनोविज्ञान, प्रेम और वैराग्य का अद्भुत द्वंद्व
- 5. काव्य-प्रयोजन: "यह कविता आनंद के लिए नहीं, शांति के लिए है"
- 6. 'शारिपुत्र प्रकरण': संस्कृत का सबसे प्राचीन उपलब्ध नाटक
- 7. अश्वघोष और कालिदास: पूर्ववर्ती और परवर्ती का संबंध
- 8. निष्कर्ष: ब्राह्मणवादी भाषा में बौद्ध दर्शन का अमृत
संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि कालिदास को 'कविकुलगुरु' माना जाता है, लेकिन स्वयं कालिदास के काव्य की नींव जिस कवि ने रखी थी, वे थे—महाकवि अश्वघोष (Mahakavi Ashvaghosha)।
अश्वघोष केवल एक कवि नहीं थे, वे एक महान दार्शनिक, संगीतकार, नाटककार और बौद्ध धर्म के एक अत्यंत प्रभावशाली उपदेशक थे। वाल्मीकि (रामायण) और वेदव्यास (महाभारत) के 'इतिहास-काव्यों' के बाद, 'शास्त्रीय महाकाव्य' (Classical Epic) का जो परिष्कृत रूप (जिसमें प्रकृति, ऋतुओं, नगरों और युद्धों का सजीव वर्णन होता है) सामने आया, उसके प्रथम जन्मदाता अश्वघोष ही थे। उन्होंने 'बुद्धचरित' (Buddhacharita) और 'सौंदरनंद' (Saundarananda) की रचना करके विश्व साहित्य को एक ऐसी अमूल्य निधि दी जिसमें दर्शन और कविता एक-दूसरे के पर्याय बन गए।
| पूरा नाम | आचार्य भदन्त अश्वघोष (माता का नाम: सुवर्णाक्षी) |
| जन्म एवं काल निर्धारण |
प्रथम शताब्दी ईस्वी (1st Century CE / लगभग 80 ई. - 150 ई.)। चीनी और तिब्बती ऐतिहासिक स्रोतों तथा पुरातत्व के अनुसार, अश्वघोष कुषाण सम्राट कनिष्क (Kanishka) के समकालीन और उनके आध्यात्मिक गुरु थे। कनिष्क का काल 78 ईस्वी (शक संवत का आरंभ) माना जाता है। अश्वघोष ने कनिष्क द्वारा कश्मीर में आयोजित 'चतुर्थ बौद्ध संगीति' (Fourth Buddhist Council) में भी प्रमुख भूमिका निभाई थी। |
| जन्म स्थान | साकेत (वर्तमान अयोध्या, उत्तर प्रदेश)। जन्म से वे एक ब्राह्मण थे, बाद में बौद्ध भिक्षु बने। |
| महानतम महाकाव्य | बुद्धचरित (Buddhacharita) और सौंदरनंद (Saundarananda)। |
| महानतम नाटक | शारिपुत्र प्रकरण (Sariputra Prakarana) - (तुर्फान, मध्य एशिया से इसके हस्तलिखित अंश मिले हैं)। |
| दार्शनिक दृष्टिकोण | सर्वास्तिवाद (प्रारंभिक बौद्ध धर्म) और महायान (Mahayana) दर्शन का संक्रमण काल। मुख्य रस: शांत रस (Shanta Rasa)। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: सम्राट कनिष्क के राजकवि
अश्वघोष का जन्म अयोध्या (साकेत) के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। युवावस्था में वे सभी वेदों, वेदांगों, सांख्य और ब्राह्मणवादी दर्शन के प्रकांड विद्वान थे। वे एक अजेय तार्किक (Debater) थे। किंवदंतियों के अनुसार, मगध में एक महान बौद्ध भिक्षु पार्श्व (या पार्श्वनाथ) के साथ हुए एक दार्शनिक शास्त्रार्थ में वे हार गए। इस हार के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और भगवान बुद्ध के अनन्य उपासक बन गए।
जब शक्तिशाली कुषाण सम्राट कनिष्क ने पाटलिपुत्र (मगध) पर आक्रमण किया, तो उसने युद्ध के हर्जाने के रूप में मगध के राजा से दो चीजें मांगीं: एक भगवान बुद्ध का भिक्षापात्र (Alms bowl) और दूसरा महाकवि अश्वघोष। कनिष्क अश्वघोष को अपने साथ पुरुषपुर (पेशावर) ले गया, जहाँ अश्वघोष उनके राजकवि और गुरु बने।
3. 'बुद्धचरित': तथागत का प्रथम और सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य
गौतम बुद्ध के जीवन पर लिखा गया 'बुद्धचरित' (Buddhacharita) अश्वघोष की कीर्ति का सबसे बड़ा स्तंभ है। यह संस्कृत का पहला ऐसा महाकाव्य है जो पूर्णतः शास्त्रीय नियमों (सर्ग, अलंकार, प्रकृति-वर्णन) का पालन करता है।
मूल 'बुद्धचरित' में 28 सर्ग (Cantos) थे, जिसमें बुद्ध के जन्म से लेकर उनके निर्वाण और बुद्ध-धातु (अस्थियों) के विभाजन तक की पूरी कथा थी।
दुर्भाग्य से, आज संस्कृत में इसके केवल 14 सर्ग ही उपलब्ध हैं (बुद्ध के जन्म से लेकर बुद्धत्व प्राप्ति तक)। हालांकि, 5वीं शताब्दी में धर्मरक्ष द्वारा किया गया इसका चीनी अनुवाद (Chinese translation) और बाद का तिब्बती अनुवाद पूरे 28 सर्गों में आज भी सुरक्षित है।
बुद्धचरित की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अश्वघोष ने बुद्ध को केवल एक त्यागी संन्यासी के रूप में नहीं, बल्कि एक 'महामानव' (Hero) के रूप में चित्रित किया है, जो कामदेव (मार / Mara) की सेना को उसी प्रकार पराजित करता है जैसे कोई क्षत्रिय राजा शत्रुओं को पराजित करता है। तीसरे सर्ग में सिद्धार्थ का कपिलवस्तु की सड़कों पर भ्रमण और 'वृद्ध, रोगी और मृतक' को देखने का दृश्य विश्व साहित्य के सबसे कारुणिक वर्णनों में से एक है।
4. 'सौंदरनंद': मनोविज्ञान, प्रेम और वैराग्य का अद्भुत द्वंद्व
यदि 'बुद्धचरित' बुद्ध की कहानी है, तो 'सौंदरनंद' (Saundarananda) मानव मन के द्वंद्व (Psychological Conflict) की सबसे महान गाथा है। यह 18 सर्गों का महाकाव्य है।
कथा: इस महाकाव्य का नायक 'नंद' (Nanda) है, जो गौतम बुद्ध का सौतेला भाई है। नंद अपनी अत्यंत सुंदर पत्नी 'सुंदरी' (Sundari) से अथाह प्रेम करता है। जब बुद्ध कपिलवस्तु आते हैं, तो वे नंद को भिक्षा मांगने के बहाने विहार में ले जाते हैं और उसका जबरन 'मुंडन' (संन्यास) करवा देते हैं।
नंद का शरीर विहार में है, लेकिन उसका मन अपनी सुंदर पत्नी में अटका है। वह रोता है और भागने की कोशिश करता है। तब बुद्ध अपनी योगमाया से नंद को स्वर्ग ले जाते हैं और उसे 'अप्सराएं' दिखाते हैं। अप्सराओं को देखकर नंद सुंदरी को भूल जाता है और अप्सराओं को पाने के लिए तपस्या करने लगता है। अंत में, बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद उसे समझाते हैं कि स्वर्ग का सुख भी नश्वर है। तब जाकर नंद को सच्चा ज्ञान (वैराग्य) प्राप्त होता है।
5. काव्य-प्रयोजन: "यह कविता आनंद के लिए नहीं, शांति के लिए है"
सौंदरनंद के अंत में अश्वघोष ने एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक लिखा है, जो यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने 'काव्य' (Poetry) का मार्ग क्यों चुना, जबकि वे एक वैरागी भिक्षु थे:
श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात् कृता।
यन्मोक्षात् कृतमन्यदत्र हि मया तत्काव्यधर्मात् कृतं
पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति॥ (अर्थ: मोक्ष के अर्थ को गर्भ में धारण करने वाली मेरी यह रचना पाठकों की 'शांति' के लिए है, 'रति' (आनंद/मनोरंजन) के लिए नहीं। जिन लोगों का मन अन्यत्र (विषयों में) लगा है, उन्हें आकर्षित करने के लिए मैंने इसे 'काव्य' का रूप दिया है। जिस प्रकार एक वैद्य कड़वी औषधि (दवा) को शहद में मिलाकर पिलाता है ताकि वह मीठी लगे, उसी प्रकार मैंने मोक्ष के कड़वे उपदेश को काव्य के शहद में लपेटकर प्रस्तुत किया है।)
इस श्लोक से अश्वघोष ने भारतीय काव्यशास्त्र में 'शांत रस' (Shanta Rasa) को श्रृंगार और वीर रस के समान, बल्कि उनसे भी ऊपर, स्थापित कर दिया।
6. 'शारिपुत्र प्रकरण': संस्कृत का सबसे प्राचीन उपलब्ध नाटक
अश्वघोष केवल महाकवि नहीं थे; वे भारत के प्रथम ज्ञात नाटककार (Dramatist) भी थे। 19वीं सदी में जर्मन विद्वान हेनरिक ल्यूडर्स (Heinrich Lüders) को मध्य एशिया के तुर्फान (Turfan) नामक स्थान से एक संस्कृत नाटक के फटे हुए पन्ने मिले।
इस 9 अंकों के नाटक का नाम 'शारिपुत्र प्रकरण' है। इसमें बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों—शारिपुत्र और मौद्गल्यायन—के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कथा है।
यह नाटक ऐतिहासिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिद्ध करता है कि भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' के नियम (जैसे विदूषक का होना, प्राकृत और संस्कृत का एक साथ प्रयोग) प्रथम शताब्दी में पूरी तरह से विकसित हो चुके थे और अश्वघोष उनका बखूबी पालन कर रहे थे।
7. अश्वघोष और कालिदास: पूर्ववर्ती और परवर्ती का संबंध
संस्कृत साहित्य के शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट प्रमाणित किया है कि महाकवि कालिदास (जो अश्वघोष से लगभग 300 वर्ष बाद गुप्त काल में हुए) ने अश्वघोष की शैली, अलंकारों और दृश्यों का गहरा अध्ययन किया था।
- 'बुद्धचरित' में जब बुद्ध महल से निकलते हैं, तो अयोध्या की स्त्रियां उन्हें देखने के लिए झरोखों की ओर दौड़ती हैं। ठीक यही दृश्य कालिदास ने 'रघुवंशम्' में राजा अज के प्रवेश के समय उकेरा है।
- अश्वघोष का 'सौंदरनंद' में नन्द का विलाप कालिदास के 'कुमारसंभवम्' में रति-विलाप (कामदेव के भस्म होने पर) के अत्यंत निकट है।
अंतर केवल इतना है कि कालिदास 'सौंदर्य' और 'शृंगार' के कवि हैं, जबकि अश्वघोष 'वैराग्य' और 'तपस्या' के कवि हैं। अश्वघोष के काव्य का अंत 'निवृत्ति' (त्याग) में होता है।
8. निष्कर्ष: ब्राह्मणवादी भाषा में बौद्ध दर्शन का अमृत
महाकवि अश्वघोष का योगदान मात्र साहित्यिक नहीं है; यह एक सांस्कृतिक क्रांति थी। उनसे पहले बौद्ध धर्म के उपदेश मुख्यतः 'पाली' (Pali) भाषा में दिए जाते थे, क्योंकि पाली आम जनता की भाषा थी और संस्कृत ब्राह्मणों की।
अश्वघोष ने पहली बार संस्कृत भाषा (जो देववाणी मानी जाती थी) की अपार शक्ति और लालित्य का उपयोग भगवान बुद्ध के दर्शन को फैलाने के लिए किया। उन्होंने सिद्ध किया कि भाषा किसी धर्म या जाति की संपत्ति नहीं है। प्रथम शताब्दी ईस्वी में उनके द्वारा रचे गए ये महाकाव्य आज भी मानवीय संवेदनाओं, बौद्धिक गहराई और 'शांति' (Peace) की खोज के सबसे महान दस्तावेज़ हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- बुद्धचरितम् - महाकवि अश्वघोष (हिंदी अनुवाद: पं. सूर्यनारायण चौधरी, मोतीलाल बनारसीदास)।
- सौंदरनंद महाकाव्यम् - अश्वघोष (संस्कृत मूल एवं हिंदी व्याख्या)।
- A History of Indian Literature (Vol 2) - Maurice Winternitz (बौद्ध साहित्य और अश्वघोष)।
- Ashvaghosha and His Times - B.C. Law (कनिष्क और अश्वघोष का ऐतिहासिक संबंध)।
