महाकवि विशाखदत्त: 'मुद्राराक्षस' और प्राचीन भारत की कूटनीतिक बिसात
एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, राजनीतिक और नाट्यशास्त्रीय विश्लेषण: संस्कृत साहित्य का वह अनोखा नाटककार जिसने शृंगार और प्रेम-कथाओं को किनारे रखकर, आचार्य चाणक्य की कूटनीति, गुप्तचरों के जाल और राजसत्ता के षड्यंत्रों को रंगमंच पर एक 'स्पाई-थ्रिलर' (Spy Thriller) के रूप में उतार दिया।
- 1. प्रस्तावना: संस्कृत रंगमंच का 'पॉलिटिकल थ्रिलर'
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: राजघराने का कवि
- 3. 'मुद्राराक्षस': नाम का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 4. चाणक्य बनाम अमात्य राक्षस: दो महामस्तिष्कों का युद्ध
- 5. नाटक की अनूठी विशेषताएं: न नायिका, न विदूषक
- 6. चाणक्य का चरित्र-चित्रण: झोपड़ी में रहने वाला 'किंगमेकर'
- 7. 'देवीचन्द्रगुप्तम्': विशाखदत्त का दूसरा ऐतिहासिक नाटक
- 8. निष्कर्ष: 'अर्थशास्त्र' का नाटकीय रूपांतरण
प्राचीन भारतीय नाटकों को पढ़ने पर हमें अक्सर राजाओं की प्रेम-क्रीड़ाएं, अप्सराएं, वसंत ऋतु का वर्णन और विरह की कविताएं मिलती हैं (जैसे कालिदास या भास के नाटकों में)। लेकिन विशाखदत्त (Vishakhadatta) इन सबसे बिल्कुल अलग मिट्टी के बने थे।
उन्होंने अपने अमर नाटक 'मुद्राराक्षस' (Mudrarakshasam) में यह सिद्ध किया कि एक उत्कृष्ट नाटक लिखने के लिए 'रोमांस' या 'सुंदर नायिका' की आवश्यकता नहीं है। सत्ता कैसे हथियाई जाती है? दुश्मनों के खेमे में फूट कैसे डाली जाती है? जाली दस्तावेज़ (Forged documents) और विषकन्याओं (Poison girls) का उपयोग कैसे होता है? विशाखदत्त ने आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) के 'अर्थशास्त्र' को एक अत्यंत सजीव और रोमांचक नाटक का रूप दे दिया।
| पूरा नाम एवं वंश | विशाखदत्त। वे सामंत 'बटेश्वरदत्त' (वटेश्वरदत्त) के पौत्र (पोते) और महाराज 'भास्करदत्त' (या पृथु) के पुत्र थे। (वे स्वयं एक सामंत या राजघराने से संबंधित थे)। |
| जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) |
ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग चौथी शताब्दी के अंत से छठी शताब्दी (Late 4th - 6th Century CE) के मध्य। उनका दूसरा नाटक 'देवीचन्द्रगुप्तम्' गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) की ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। इसलिए उनका काल गुप्त साम्राज्य का स्वर्ण युग माना जाता है। |
| महानतम कृति (Masterpiece) | मुद्राराक्षस (Mudrarakshasam) - 7 अंकों का एक विशुद्ध कूटनीतिक (Political) नाटक। |
| अन्य महत्वपूर्ण कृति | देवीचन्द्रगुप्तम् (Devichandraguptam) - (आंशिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक नाटक)। |
| नाट्य-विशेषता | नायिका और विदूषक का पूर्ण अभाव। मुख्य रस: वीर और रौद्र (Ojas Guna)। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: राजघराने का कवि
'मुद्राराक्षस' की प्रस्तावना में विशाखदत्त स्वयं अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि वे महाराज भास्करदत्त के पुत्र हैं। 'महाराज' उपाधि से यह सिद्ध होता है कि विशाखदत्त एक सामान्य ब्राह्मण या भिक्षु नहीं थे, बल्कि वे स्वयं एक राजघराने (Royal family) या उच्च सामंत परिवार से थे। यही कारण है कि उन्हें राजनीति, युद्ध-कौशल और कूटनीति (Statecraft) का इतना गहरा और व्यावहारिक ज्ञान था।
उनके काल को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद रहा है। कुछ उन्हें 9वीं शताब्दी का मानते थे, लेकिन 'देवीचन्द्रगुप्तम्' के श्लोकों की खोज के बाद (जो 11वीं सदी के भोजराज के 'शृंगारप्रकाश' में उद्धृत हैं), यह लगभग सर्वमान्य हो गया है कि विशाखदत्त गुप्त काल (5वीं शताब्दी के आसपास) के एक गौरवशाली नाटककार थे।
3. 'मुद्राराक्षस': नाम का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' दो शब्दों से मिलकर बना है: मुद्रा (Signet Ring / अंगूठी) + राक्षस (अमात्य राक्षस)। अर्थात्, वह नाटक जिसमें 'राक्षस' नामक मंत्री को एक 'मुद्रा' (अंगूठी) की सहायता से वश में किया गया हो।
आचार्य चाणक्य ने नंद वंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर बैठा दिया है। लेकिन नंद वंश का अत्यंत स्वामीभक्त और प्रतिभाशाली महामंत्री 'राक्षस' (Rakshasa) अभी जीवित है।
राक्षस चन्द्रगुप्त को हटाकर नंद वंश के किसी उत्तराधिकारी को फिर से गद्दी पर बैठाना चाहता है और इसके लिए वह मलयकेतु नामक राजा के साथ मिलकर पाटलिपुत्र पर आक्रमण की योजना बना रहा है। चाणक्य जानता है कि जब तक राक्षस जैसा बुद्धिमान मंत्री चन्द्रगुप्त का विरोधी है, तब तक मौर्य साम्राज्य सुरक्षित नहीं है। चाणक्य का लक्ष्य राक्षस को मारना नहीं है, बल्कि उसे चन्द्रगुप्त का महामंत्री (Prime Minister) बनने के लिए विवश करना है। यही इस नाटक का 'मास्टर-प्लॉट' है।
4. चाणक्य बनाम अमात्य राक्षस: दो महामस्तिष्कों का युद्ध
नाटक में तलवारों से युद्ध नहीं होता, युद्ध गुप्तचरों (Spies) के माध्यम से होता है।
चाणक्य का एक गुप्तचर (निपुणक) अमात्य राक्षस की नाम-मुद्रा (अंगूठी) चुरा लेता है। चाणक्य इस अंगूठी का उपयोग करके एक जाली पत्र (Forged Letter) तैयार करवाता है। इस पत्र और अपने गुप्तचरों (जैसे जैन भिक्षु जीवसिद्धि) के जाल से चाणक्य मलयकेतु के मन में यह शक (Doubt) पैदा कर देता है कि अमात्य राक्षस उसे (मलयकेतु को) धोखा देकर चन्द्रगुप्त से मिल गया है।
मलयकेतु अमात्य राक्षस का अपमान करके उसे निकाल देता है। अंततः, अपने एक मित्र (चंदनदास) की जान बचाने के लिए अमात्य राक्षस को चाणक्य के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ता है और चन्द्रगुप्त का मंत्रिपद स्वीकार करना पड़ता है।
5. नाटक की अनूठी विशेषताएं: न नायिका, न विदूषक
'मुद्राराक्षस' संस्कृत नाट्यशास्त्र के कई स्थापित नियमों को चुनौती देता है:
1. नायिका का अभाव (No Heroine): इस नाटक में कोई प्रेम-प्रसंग नहीं है। महिलाओं के नाम पर केवल एक चंदनदास की पत्नी का अत्यंत छोटा सा दृश्य है।
2. विदूषक का अभाव (No Jester): जहाँ राजनीति का इतना गंभीर और प्राणघातक खेल चल रहा हो, वहाँ मूर्खतापूर्ण हास्य (Comedy) के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए इसमें कोई विदूषक नहीं है।
3. विषकन्या (Poison Girl): नाटक में दिखाया गया है कि कैसे राक्षस ने चन्द्रगुप्त को मारने के लिए एक 'विषकन्या' भेजी थी, लेकिन चाणक्य ने अपनी चालाकी से उस विषकन्या के माध्यम से राजा पर्वतक (मलयकेतु के पिता) की ही हत्या करवा दी।
6. चाणक्य का चरित्र-चित्रण: झोपड़ी में रहने वाला 'किंगमेकर'
विशाखदत्त ने चाणक्य का जो चरित्र उकेरा है, वह विश्व साहित्य में अद्वितीय है। वह क्रूर है, कूटनीतिज्ञ है, लेकिन पूरी तरह से निःस्वार्थ (Selfless) है।
नाटक के तीसरे अंक में जब एक दरबारी (कंचुकी) चाणक्य के निवास स्थान पर जाता है, तो वह यह देखकर दंग रह जाता है कि जिसने पूरे मगध का साम्राज्य पलट दिया, वह मंत्री एक टूटी हुई घास-फूस की झोपड़ी में रहता है:
बटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोममेतत्।
शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभिः
विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम्॥ (कंचुकी कहता है: "आश्चर्य है! गोबर के कंडे (उपले) फोड़ने के लिए यह पत्थर का टुकड़ा रखा है, शिष्यों द्वारा लाई गई कुशा (घास) का यह ढेर है, और सूखने के लिए छत पर रखी गई लकड़ियों के बोझ से इस पुरानी झोपड़ी की छत भी नीचे झुक गई है।" - यही भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति चाणक्य का घर है!)
7. 'देवीचन्द्रगुप्तम्': विशाखदत्त का दूसरा ऐतिहासिक नाटक
विशाखदत्त का दूसरा प्रसिद्ध नाटक 'देवीचन्द्रगुप्तम्' (Devichandraguptam) है। यद्यपि यह नाटक अब पूर्ण रूप में नहीं मिलता, लेकिन अन्य ग्रंथों में इसके उद्धरण (Quotes) सुरक्षित हैं।
यह गुप्त साम्राज्य के एक बहुत बड़े ऐतिहासिक रहस्य को खोलता है। इसके अनुसार, सम्राट समुद्रगुप्त के बाद उसका बड़ा बेटा रामगुप्त गद्दी पर बैठा। जब शकों (Shaka king) ने आक्रमण किया, तो कायर रामगुप्त ने अपनी रानी 'ध्रुवदेवी' को शकों को सौंपने का समझौता कर लिया। तब उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त (द्वितीय) स्त्री के वेश (रानी के कपड़ों) में शक शिविर में गया, शक राजा की हत्या की, वापस आकर रामगुप्त को मारा और ध्रुवदेवी से विवाह कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। यह नाटक भी कूटनीति और साहस का अद्भुत प्रमाण है।
8. निष्कर्ष: 'अर्थशास्त्र' का नाटकीय रूपांतरण
महाकवि विशाखदत्त की कला 'मैकियावेलियन' (Machiavellian) राजनीति से बहुत ऊपर है। मैकियावेली (प्रिंस) की राजनीति जहाँ केवल स्वार्थ और सत्ता के लिए है, वहीं विशाखदत्त के चाणक्य की राजनीति एक 'अखंड भारत' और योग्य शासक (चन्द्रगुप्त) की स्थापना के लिए है।
विशाखदत्त ने आचार्य कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' (राजधर्म, मंडल सिद्धांत, षाड्गुण्य नीति) को एक सूखी थ्योरी की किताब से निकालकर उसे एक धड़कते हुए, सस्पेंस से भरे नाटक (Drama) में बदल दिया। 'मुद्राराक्षस' प्राचीन भारत की कूटनीतिक मेधा (Intellectual capability) का वह चमकता हुआ रत्न है, जिसका सानी पूरे विश्व साहित्य में कोई दूसरा नाटक नहीं कर सका।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- मुद्राराक्षस - महाकवि विशाखदत्त (चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, हिंदी व्याख्या सहित)।
- कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (विशाखदत्त की कूटनीति के आधारभूत सिद्धांत को समझने हेतु)।
- Sanskrit Drama - A.B. Keith (विशाखदत्त के राजनैतिक नाटकों का ऐतिहासिक विश्लेषण)।
- श्रृंगारप्रकाश - राजा भोज (जहाँ देवीचन्द्रगुप्तम् के श्लोक प्राप्त होते हैं)।
