महाकवि भारवि: 'किरातार्जुनीयम्' के रचयिता, बृहत्त्रयी के प्रणेता और 'अर्थगौरव' के सम्राट | Mahakavi Bharavi

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि भारवि: 'किरातार्जुनीयम्' और अर्थगौरव के सम्राट

महाकवि भारवि: 'किरातार्जुनीयम्' के रचयिता और 'अर्थगौरव' के सम्राट

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, काव्यशास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण: संस्कृत साहित्य का वह ओजस्वी महाकवि जिसने 'गागर में सागर' भरने की कला का आविष्कार किया और जिसके 18 सर्गों के महाकाव्य ने भारतीय राजनीति, कूटनीति और शिव-भक्ति का सबसे ओजस्वी मानक स्थापित किया।

संस्कृत महाकाव्यों की परंपरा में 'बृहत्त्रयी' (The Greater Triad) का सर्वोच्च स्थान है। इन तीन महान काव्यों में भारवि का 'किरातार्जुनीयम्', माघ का 'शिशुपालवधम्', और श्रीहर्ष का 'नैषधीयचरितम्' आते हैं। इन तीनों में महाकवि भारवि (Mahakavi Bharavi) सबसे प्राचीन हैं, जिन्होंने संस्कृत काव्य को कालिदास की कोमल 'वैदर्भी रीति' (शृंगार) से निकालकर ओजस्वी 'पांचाली रीति' (वीर रस) के कठोर और दार्शनिक मार्ग पर प्रशस्त किया।

भारतीय काव्यशास्त्र का एक स्वर्णिम नियम है: "उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्।" अर्थात्, यदि उपमाओं (Similes) के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं, तो 'अर्थगौरव' (Depth of Meaning - थोड़े शब्दों में बहुत गहरी बात कहना) के लिए भारवि संपूर्ण विश्व में अद्वितीय हैं।

📌 महाकवि भारवि: एक ऐतिहासिक एवं काव्यशास्त्रीय प्रोफाइल
मूल नाम एवं गोत्र मूल नाम 'दामोदर' था। 'भारवि' (सूर्य की चमक) उनकी उपाधि थी। (कौशिक गोत्र)।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: छठी शताब्दी ईस्वी का उत्तरार्ध (Late 6th Century CE)।
अकाट्य प्रमाण: 634 ईस्वी के 'ऐहोल शिलालेख' (Aihole Inscription) में जैन कवि रविकीर्ति ने स्वयं को कालिदास और भारवि के समान महान बताया है। चूँकि 634 ई. में भारवि एक किंवदंती बन चुके थे, अतः उनका काल निश्चित रूप से छठी शताब्दी के मध्य या अंत का है।
आश्रयदाता राजा कांचीपुरम के पल्लव राजा सिंहविष्णु और गंग वंश के राजा दुर्विनीत के समकालीन ('अवन्तिसुन्दरीकथा' के अनुसार)।
एकमात्र महाकाव्य किरातार्जुनीयम् (Kiratarjuniyam) - 18 सर्ग (Cantos) और लगभग 1040 श्लोक।
काव्य की विशेषता अर्थगौरव (गागर में सागर)। मुख्य रस: वीर रस
महानतम टीकाकार मल्लिनाथ (जिन्होंने किरातार्जुनीयम् पर 'घण्टापथ' नामक प्रसिद्ध टीका लिखी)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: ऐहोल शिलालेख का साक्ष्य

संस्कृत के अधिकांश कवियों के विपरीत, भारवि का काल-निर्धारण ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत स्पष्ट है। चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल शिलालेख (634 CE) में यह श्लोक अंकित है:

स विजयतां रविकीर्तिः कविताश्रितकालिदासभारविकीर्तिः। (अर्थ: वह रविकीर्ति विजय प्राप्त करे, जिसने अपनी कविता के बल पर कालिदास और भारवि के समान कीर्ति प्राप्त कर ली है।)

इसके अतिरिक्त, दंडी की 'अवन्तिसुन्दरीकथा' से पता चलता है कि दंडी के प्रपितामह (परदादा) 'दामोदर' (भारवि) पल्लव नरेश सिंहविष्णु (575–600 ई.) के घनिष्ठ मित्र थे। इन दोनों ठोस ऐतिहासिक साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि भारवि का रचनाकाल 550 ईस्वी से 600 ईस्वी के मध्य था।

3. 'किरातार्जुनीयम्': शिव और अर्जुन के महासंग्राम की कथा

भारवि ने केवल एक ग्रंथ लिखा—'किरातार्जुनीयम्', और इसी एक ग्रंथ ने उन्हें अमर कर दिया। इस महाकाव्य की कथा महाभारत के 'वन पर्व' से ली गई है।

महाकाव्य का कथानक (The Plot)

पांडव द्यूत-क्रीड़ा (जुआ) हारने के बाद द्वैतवन में वनवास काट रहे हैं। द्रौपदी और भीम युधिष्ठिर को तुरंत युद्ध करने के लिए उकसाते हैं (प्रथम सर्ग)। लेकिन महर्षि व्यास की सलाह पर, अर्जुन दिव्यास्त्र (पशुपतास्त्र) प्राप्त करने के लिए हिमालय के इंद्रकील पर्वत पर घोर तपस्या करने जाते हैं।

अर्जुन की तपस्या की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव एक जंगली शिकारी 'किरात' (Kirata) का वेष धारण कर आते हैं। तभी 'मूक' नामक एक दानव जंगली सूअर (Wild Boar) बनकर अर्जुन पर हमला करता है। अर्जुन और किरात (शिव) दोनों एक साथ सूअर पर बाण चलाते हैं।
"यह शिकार मेरा है!" इस बात पर अर्जुन और किरात में भयंकर युद्ध (मल्लयुद्ध) छिड़ जाता है। अर्जुन की वीरता से प्रसन्न होकर शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं और उसे अजेय 'पशुपतास्त्र' प्रदान करते हैं।

4. 'भारवेरर्थगौरवम्': कम शब्दों में अथाह अर्थ (Depth of Meaning)

भारवि की ख्याति 'अर्थगौरव' के कारण है। अर्थगौरव का अर्थ है—शब्द कम हों, लेकिन उनमें निहित अर्थ और जीवन-दर्शन अत्यंत गहरा और व्यापक हो।

किरातार्जुनीयम् के द्वितीय सर्ग का यह श्लोक 'अर्थगौरव' का विश्व का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। यह इतना प्रसिद्ध है कि भारतीय परंपरा में इसे जीवन का मूलमंत्र माना गया:

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
(अर्थ: बिना सोचे-विचारे अचानक (जल्दबाज़ी में) कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञान (विवेकहीनता) घोर विपत्तियों का घर है। जो व्यक्ति अच्छी तरह विचार करके (विमर्श करके) कार्य करता है, गुणों की लोभी संपत्तियां (सफलताएं) स्वयं उसका चुनाव कर लेती हैं।)

5. राजनीति और कूटनीति का विश्वकोश: प्रथम सर्ग का वनेचर

किरातार्जुनीयम् का प्रथम सर्ग राजनीति विज्ञान (Political Science) और गुप्तचर व्यवस्था (Espionage) का मास्टरपीस है।

युधिष्ठिर दुर्योधन की राज्य-व्यवस्था जानने के लिए एक वनेचर (गुप्तचर/Spy) को हस्तिनापुर भेजते हैं। वनेचर लौटकर युधिष्ठिर को रिपोर्ट देता है। वह चापलूसी (Flattery) नहीं करता, बल्कि जो सच है—कि दुर्योधन अत्यंत नीति-कुशलता से राज कर रहा है और जनता उससे खुश है—वह निडर होकर बताता है। भारवि वनेचर के मुख से कहलवाते हैं:

हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। (अर्थ: ऐसी बात जो 'हितकारी' (फायदेमंद) भी हो और मन को 'अच्छी' (मनोहारी) भी लगे, संसार में अत्यंत दुर्लभ है। अर्थात् सच्ची बात प्रायः कड़वी ही होती है।)

6. 'चित्रकाव्य' (Verbal Acrobatics): एक अक्षर से संपूर्ण श्लोक

भारवि ने किरातार्जुनीयम् के 15वें सर्ग में 'चित्रकाव्य' (Visual Poetry / Verbal Acrobatics) का ऐसा चमत्कार किया है, जिसे देखकर आधुनिक भाषा-विज्ञानी भी चकित रह जाते हैं।

एकाक्षर श्लोक (Single-Consonant Verse)

अर्जुन और शिव की सेना के बीच भयंकर युद्ध चल रहा है। इस युद्ध की भयानकता को दर्शाने के लिए भारवि ने एक ऐसा श्लोक लिखा जिसमें 'न' (N) के अलावा किसी दूसरे व्यंजन (Consonant) का प्रयोग ही नहीं हुआ है:

"न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥"


(अर्थ: वह मनुष्य मनुष्य नहीं है जो अपने से हीन शत्रु द्वारा घायल (पराजित) कर दिया जाए; और जो अपने से हीन को मारता है, वह भी वास्तव में उसे नहीं मारता (बल्कि अपना ही पतन करता है)। जिसके पास अनेक प्रकार के हथियार हैं, वह घायल नहीं होता; लेकिन जो घायल को मारता है, वह स्वयं पापी है।)

7. मल्लिनाथ की टीका: 'नारिकेल-फल-सम्मितम्' (नारियल के समान)

भारवि की कविता ऊपर से पढ़ने में बहुत कठोर (Hard) लगती है, क्योंकि वे दर्शन और राजनीति के भारी शब्दों का प्रयोग करते हैं। 14वीं शताब्दी के महान टीकाकार मल्लिनाथ ने किरातार्जुनीयम् पर 'घण्टापथ' (राजमार्ग) नामक टीका लिखी। उन्होंने भारवि की कविता की तुलना 'नारियल के फल' से की है:

नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः सपदी तद्विभज्यते। (अर्थ: भारवि की वाणी नारियल के फल के समान है। यह ऊपर से (छिलके की तरह) अत्यंत कठोर है, लेकिन जब आप इसके भीतर प्रवेश करते हैं, तो यह मीठे रस (नारियल के जल और गिरी) से भरी हुई है।)

8. निष्कर्ष: ओज और गंभीरता के अमर गायक

महाकवि भारवि का 'किरातार्जुनीयम्' केवल एक शिव-भक्ति का काव्य नहीं है; यह एक 'कर्म-योग' (Philosophy of Action) का ग्रंथ है। जब वनवास में युधिष्ठिर शांति और धैर्य की बात करते हैं, तो द्रौपदी उन्हें क्षत्रिय-धर्म याद दिलाते हुए कहती है: "शांति से केवल मुनियों को मोक्ष मिलता है, राजाओं को नहीं।"

भारवि ने संस्कृत महाकाव्यों की धारा को हमेशा के लिए बदल दिया। उनके बाद माघ (शिशुपालवधम्) और श्रीहर्ष ने उन्हीं के द्वारा बनाए गए 'चित्रकाव्य' और 'राजनीतिक विमर्श' के मार्ग का अनुसरण किया। जब तक भारतीय मनीषा में 'गंभीर चिंतन' और 'वीर रस' का आदर रहेगा, तब तक 'भारवेरर्थगौरवम्' की गूंज हिमालय के शिखरों के समान अटल रहेगी।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • किरातार्जुनीयम् - महाकवि भारवि (मल्लिनाथ की 'घण्टापथ' टीका सहित)।
  • A History of Indian Literature (Vol 3) - Maurice Winternitz (भारवि का ऐतिहासिक मूल्यांकन)।
  • Sanskrit Poetry from Vidyakara's Treasury - Daniel H.H. Ingalls.
  • ऐहोल शिलालेख (रविकिर्ति रचित) - Epigraphia Indica, Vol. VI.

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