महर्षि वेदव्यास: महाभारत के रचयिता, वेदों के विभाजक और भारतीय ज्ञान के सूर्य
एक अत्यंत विस्तृत, ऐतिहासिक और साहित्यिक विश्लेषण: वह चिरंजीवी महर्षि जिन्होंने बिखरे हुए वैदिक ज्ञान को संकलित किया, विश्व का सबसे विशाल महाकाव्य (महाभारत) रचा, और जिनके ज्ञान के जूठन से ही आज विश्व का सम्पूर्ण साहित्य पोषित है—"व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्"।
- 1. प्रस्तावना: ज्ञान के साक्षात अवतार
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: द्वापर से कलियुग की संध्या
- 3. 'वेदव्यास' उपाधि का रहस्य: वेदों का ऐतिहासिक विभाजन
- 4. 'महाभारत' - पंचम वेद और महानतम इतिहास काव्य
- 5. श्रीमद्भगवद्गीता: व्यास की दिव्य दृष्टि का प्रकटीकरण
- 6. अष्टादश 'पुराण संहिता': लोक-शिक्षा का विश्वकोश
- 7. 'ब्रह्मसूत्र' (वेदांत दर्शन): दार्शनिक प्रस्थान
- 8. गुरु पूर्णिमा: महर्षि व्यास के प्रति कृतज्ञता का पर्व
- 9. निष्कर्ष: ज्ञान के अमर प्रकाश-स्तंभ
संपूर्ण भारतीय वाङ्मय (Indian Literature) में यदि किसी एक व्यक्ति के नाम को निकाल दिया जाए, तो भारत का धर्म, इतिहास, दर्शन और साहित्य सभी निराधार हो जाएंगे—वह नाम है महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास (Maharishi Ved Vyasa)।
सनातन धर्म में उन्हें भगवान विष्णु का ही ज्ञान-अवतार माना जाता है। उन्होंने प्राचीन काल के अत्यंत जटिल और बिखरे हुए 'श्रुति' ज्ञान को चार वेदों में व्यवस्थित किया। जब उन्होंने देखा कि कलियुग में मनुष्यों की बुद्धि वेदों को समझने में अक्षम हो जाएगी, तो उन्होंने उस वैदिक ज्ञान को अत्यंत रोचक कहानियों, आख्यानों और इतिहास के रूप में 'महाभारत' और 'पुराणों' में पिरो दिया।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥ अर्थ: खिले हुए कमल के समान विशाल नेत्रों वाले और अपार बुद्धि के धनी हे महर्षि व्यास! आपको नमस्कार है। आपने महाभारत रूपी तेल से परिपूर्ण 'ज्ञान का दीपक' प्रज्वलित किया है। (गीता ध्यानम्)
| मूल नाम | कृष्णद्वैपायन (काले वर्ण के और द्वीप पर जन्म लेने के कारण) |
| जन्म एवं काल निर्धारण |
पारंपरिक मान्यता: द्वापर युग के अंत और कलियुग के आरंभ की संधिकाल (लगभग 3100 ईसा पूर्व)। वे सात चिरंजीवियों (अमर) में से एक हैं। आधुनिक अकादमिक मत: इंडोलॉजिस्ट्स के अनुसार 'व्यास' एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक 'पद' (Institution) या परंपरा है, जिसने वैदिक काल (ल. 1500 ई.पू.) से लेकर गुप्त काल (ल. 400 ई.) तक ग्रंथों का संपादन किया। |
| माता-पिता | महर्षि पराशर (पिता) और सत्यवती/मत्स्यगंधा (माता) |
| प्रमुख शिष्य (वेदों के) | पैल (ऋग्वेद), वैशम्पायन (यजुर्वेद), जैमिनि (सामवेद), सुमन्तु (अथर्ववेद), रोम हर्षण/सूत जी (पुराण)। |
| महानतम रचनाएँ | महाभारत (इतिहास), 18 महापुराण, ब्रह्मसूत्र (वेदांत दर्शन)। |
| आश्रम का स्थान | बद्रीनाथ के निकट 'व्यास गुफा' (माणा गाँव, उत्तराखंड)। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: द्वापर से कलियुग की संध्या
महर्षि व्यास का जन्म यमुना नदी (कुछ स्रोतों के अनुसार गंगा) के एक द्वीप (Island) पर हुआ था। उनके पिता महान ज्योतिषी एवं तपस्वी महर्षि पराशर थे और माता निषाद-कन्या सत्यवती थीं। जन्म के तुरंत बाद ही वे अपनी माता से आज्ञा लेकर तपस्या के लिए हिमालय (बद्रिकाश्रम) चले गए।
महाभारत काल में वे कुरु वंश के पितामह और रक्षक थे। जब भी भीष्म, धृतराष्ट्र या युधिष्ठिर संकट में होते, व्यास जी प्रकट होकर उन्हें सही मार्ग दिखाते।
3. 'वेदव्यास' उपाधि का रहस्य: वेदों का ऐतिहासिक विभाजन
उनका मूल नाम 'कृष्णद्वैपायन' था। उन्हें 'वेदव्यास' (Veda Vyasa) क्यों कहा गया? 'व्यास' का अर्थ है—विस्तार करना, बांटना या संकलित करना (Compiler/Arranger)।
प्राचीन काल में वेद एक ही था (यजुर्वेद के रूप में या एक मिश्रित ज्ञान के रूप में)। महर्षि ने देखा कि आने वाले युग में लोगों की आयु, बुद्धि और स्मरण शक्ति कम हो जाएगी, जिससे वे इस विशाल वेद को कंठस्थ नहीं कर पाएंगे। अतः उन्होंने यज्ञ के कार्यों की दृष्टि से वेदों को चार भागों में विभाजित किया:
- ऋग्वेद: स्तुति और ज्ञान के लिए (शिष्य पैल को सौंपा)।
- यजुर्वेद: यज्ञ और कर्मकांड के लिए (शिष्य वैशम्पायन को सौंपा)।
- सामवेद: गान और उपासना के लिए (शिष्य जैमिनि को सौंपा)।
- अथर्ववेद: विज्ञान, चिकित्सा और लौकिक जीवन के लिए (शिष्य सुमन्तु को सौंपा)।
(विभजामास वेदान् वै तस्माद् व्यास इति स्मृतः) — वेदों का विभाजन करने के कारण वे 'वेदव्यास' कहलाए।
4. 'महाभारत' - पंचम वेद और महानतम इतिहास काव्य
वेदों का विभाजन करने के बाद भी महर्षि व्यास के मन में शांति नहीं थी। वेदों का ज्ञान स्त्रियों, शूद्रों और आम जनमानस (जिन्हें संस्कृत व्याकरण का कठोर ज्ञान नहीं था) के लिए दुर्लभ था। इसलिए उन्होंने एक ऐसे ग्रंथ की रचना का संकल्प लिया जिसमें कथा (Story) के माध्यम से वेदों का संपूर्ण ज्ञान दिया जा सके।
लेखक और लिपिक: कथा है कि ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान गणेश ने महाभारत लिखने का कार्य स्वीकार किया, बशर्ते व्यास जी श्लोक बोलना न रोकें। व्यास जी ने भी शर्त रखी कि गणेश जी श्लोक का अर्थ समझे बिना उसे नहीं लिखेंगे। इसी प्रक्रिया में 'ग्रंथियों' (कठिन श्लोकों) का निर्माण हुआ।
महाभारत को 'इतिहास काव्य' (Historical Poetry) कहा जाता है। 'इतिहास' का अर्थ है—"इति + ह + आस" (ऐसा ही निश्चित रूप से हुआ था)।
इसमें लगभग 1,00,000 (एक लाख) श्लोक हैं और यह 18 पर्वों में विभक्त है।
यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् यिहास्ति तदन्यत्र॥ अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में जो इस ग्रंथ (महाभारत) में है, वही अन्य जगह है। जो इसमें नहीं है, वह इस संसार में कहीं भी नहीं है। (महाभारत एक संपूर्ण विश्वकोश है)
5. श्रीमद्भगवद्गीता: व्यास की दिव्य दृष्टि का प्रकटीकरण
महाभारत के 'भीष्म पर्व' का एक छोटा सा हिस्सा 'श्रीमद्भगवद्गीता' (700 श्लोक) है। यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया साक्षात उपदेश है। लेकिन इसे हम तक पहुँचाया किसने?
महर्षि वेदव्यास ने ही धृतराष्ट्र के सारथी संजय को 'दिव्य दृष्टि' (Divine Vision) प्रदान की थी, जिसके माध्यम से संजय ने युद्ध भूमि से कोसों दूर बैठे हुए भी कृष्ण और अर्जुन का संवाद सुना और धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता का दार्शनिक ढांचा और शब्द-चयन महर्षि व्यास की लेखनी का चरमोत्कर्ष है।
6. अष्टादश 'पुराण संहिता': लोक-शिक्षा का विश्वकोश
वेदों के ज्ञान को लोक-कथाओं, राजवंशों के इतिहास और भूगोल के साथ मिलाकर महर्षि व्यास ने 'पुराण संहिता' (Puranic Corpus) का निर्माण किया। उन्होंने यह ज्ञान अपने पांचवें शिष्य सूत रोम हर्षण को दिया।
कुल 18 महापुराण हैं (जैसे विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, स्कंद पुराण आदि)। एक पुराण के पांच मुख्य लक्षण (Pancha-lakshana) होते हैं: सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय), वंश (देवताओं के वंश), मन्वन्तर (मनुओं का काल), और वंशानुचरित (सूर्य और चंद्र वंशी राजाओं का इतिहास)।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥ अर्थ: अठारह पुराणों में महर्षि व्यास के केवल दो ही मुख्य वचन (सार) हैं—दूसरों का उपकार करना ही पुण्य है, और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना ही पाप है।
7. 'ब्रह्मसूत्र' (वेदांत दर्शन): दार्शनिक प्रस्थान
जहाँ महाभारत और पुराण 'आम जनता' के लिए थे, वहीं विद्वानों और दार्शनिकों के लिए उपनिषदों के बिखरे हुए ज्ञान को एक तार्किक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता थी।
इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए महर्षि व्यास (जिन्हें इस संदर्भ में 'बादरायण' भी कहा जाता है) ने 'ब्रह्मसूत्र' (Brahma Sutras) की रचना की। यह वेदांत दर्शन का आधारभूत ग्रंथ है। बाद में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माध्वाचार्य जैसे सभी महान आचार्यों को अपना मत सिद्ध करने के लिए इसी 'ब्रह्मसूत्र' पर भाष्य (Commentary) लिखना पड़ा।
8. गुरु पूर्णिमा: महर्षि व्यास के प्रति कृतज्ञता का पर्व
भारत में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। इसे 'व्यास पूर्णिमा' भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था और इसी दिन उन्होंने चारों वेदों का संपादन पूर्ण किया था।
सनातन परंपरा में 'व्यास-पीठ' (कथावाचक का आसन) सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। जो भी व्यक्ति उस पीठ पर बैठता है, वह महर्षि व्यास का प्रतिनिधि माना जाता है।
9. निष्कर्ष: ज्ञान के अमर प्रकाश-स्तंभ
कहा जाता है: "व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" (यह संपूर्ण संसार और इसका समस्त ज्ञान महर्षि व्यास का जूठन मात्र है)। इसका अर्थ यह है कि धर्म, राजनीति, मनोविज्ञान, दर्शन, या साहित्य का ऐसा कोई भी विषय नहीं है जिसका वर्णन महर्षि व्यास ने पहले ही न कर दिया हो।
महर्षि वेदव्यास केवल एक ग्रंथ के रचयिता नहीं हैं; वे भारतीय संस्कृति के 'आर्किटेक्ट' (Architect) हैं। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक स्मृति को ग्रंथों के रूप में ऐसी अमरता प्रदान की, जिसे सदियों के विदेशी आक्रमण और समय की आंधियां भी मिटा नहीं सकीं। जब तक गंगा में जल प्रवाहित होता रहेगा और हिमालय खड़ा रहेगा, महर्षि वेदव्यास का नाम और उनका महाभारत इस पृथ्वी पर गूंजता रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- महाभारत (गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण - श्लोक और अनुवाद)।
- श्रीमद्भागवत महापुराण (प्रथम स्कंध - जहाँ व्यास जी के असंतोष और पुराण रचना की कथा है)।
- ब्रह्मसूत्र (शांकरभाष्य सहित)।
- A History of Indian Literature (Vol 1) - Maurice Winternitz (महाभारत और पुराणों का ऐतिहासिक मूल्यांकन)।
