आचार्य भरतमुनि: 'नाट्यशास्त्र' के प्रणेता और 'रस-निष्पत्ति' के महान मनोवैज्ञानिक
एक अत्यंत विस्तृत काव्यशास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण: वह प्राचीन महर्षि जिन्होंने कला, नाटक और साहित्य को केवल 'मनोरंजन' (Entertainment) नहीं, बल्कि मानव-चेतना को उदात्त करने वाला एक 'विज्ञान' (Aesthetics) माना और विश्व को 'रस' का अद्भुत सूत्र प्रदान किया।
- 1. प्रस्तावना: भारतीय सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) का उदय
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: भरतमुनि का ऐतिहासिक युग
- 3. 'नाट्यशास्त्र' - पंचम वेद की उत्पत्ति की कथा
- 4. 'रस सिद्धांत' (Theory of Rasa) का मूल आधार
- 5. रस-निष्पत्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (The Core Sutra)
- 6. विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी और स्थायी भाव का तंत्र
- 7. नाट्यशास्त्र के अष्ट-रस (The Eight Rasas)
- 8. चतुर्विध अभिनय: कला की अभिव्यक्ति के चार द्वार
- 9. निष्कर्ष: विश्व-रंगमंच के शाश्वत सूत्रधार
पाश्चात्य जगत में जो स्थान अरस्तू (Aristotle) की पुस्तक 'पोएटिक्स' (Poetics) का है, भारतीय ज्ञान परंपरा में उससे कहीं अधिक व्यापक, गहरा और वैज्ञानिक स्थान भरतमुनि रचित 'नाट्यशास्त्र' (Natyashastra) का है।
भरतमुनि केवल एक नाटककार या आलोचक नहीं थे; वे मानव-मन के 'डेप्थ साइकोलॉजिस्ट' (Depth Psychologist) थे। उन्होंने यह खोज निकाला कि कोई कविता पढ़ने, या कोई नाटक देखने पर हमारे भीतर रोंगटे क्यों खड़े हो जाते हैं? आँखों में आँसू क्यों आ जाते हैं? हृदय आनंद से क्यों भर जाता है? इसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को उन्होंने 'रस-निष्पत्ति' (Realization of Aesthetic Bliss) का नाम दिया, जो आज भी संपूर्ण भारतीय कला (नृत्य, संगीत, साहित्य, सिनेमा) की आत्मा है।
| पूरा नाम | आचार्य भरतमुनि (Acharya Bharata Muni) |
| जन्म एवं काल निर्धारण |
सटीक जन्म/मृत्यु तिथि अज्ञात है। आधुनिक अकादमिक मत (Indology): 200 ईसा पूर्व (BCE) से 200 ईस्वी (CE) के मध्य। यह तय है कि वे महाकवि कालिदास (4थी-5वीं सदी) और भास से बहुत पूर्व हुए थे, क्योंकि इन कवियों ने भरतमुनि के नियमों का पूरी तरह पालन किया है। |
| महानतम कृति | नाट्यशास्त्र (36 अध्याय और लगभग 6000 श्लोक) |
| उपाधि | काव्यशास्त्र और रस-सिद्धांत के प्रवर्तक (Father of Indian Aesthetics) |
| विश्वप्रसिद्ध सूत्र | "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" (रस-निष्पत्ति का सूत्र) |
| प्रसिद्ध टीकाकार | आचार्य अभिनवगुप्त (जिन्होंने 'अभिनवभारती' नामक प्रसिद्ध टीका लिखी)। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: भरतमुनि का ऐतिहासिक युग
प्राचीन भारतीय ऋषियों की तरह, भरतमुनि का व्यक्तिगत जीवन अंधकार में है। उन्होंने अपने ग्रंथ में कहीं भी अपने माता-पिता, जन्मस्थान या राजा का उल्लेख नहीं किया है। कुछ विद्वान मानते हैं कि 'भरत' किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि 'भ' (भाव), 'र' (राग), और 'त' (ताल) को जानने वाले अभिनेताओं/नर्तकों के समूह का नाम था।
हालांकि, अधिकांश विद्वान (जैसे पी.वी. काणे और कपिल देव द्विवेदी) यह मानते हैं कि भरतमुनि एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे, जिनका काल 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच था। उनके द्वारा रचित 'नाट्यशास्त्र' विश्व का सबसे प्राचीन उपलब्ध विश्वकोश (Encyclopedia) है जो रंगमंच (Theatre), वास्तुकला, संगीत, वाद्ययंत्र, और काव्य-समीक्षा पर विस्तार से बात करता है।
3. 'नाट्यशास्त्र' - पंचम वेद की उत्पत्ति की कथा
नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में इस ग्रंथ की उत्पत्ति की एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक कथा है।
त्रेता युग में जब लोगों में दुःख, काम, और क्रोध बढ़ने लगा, तो इंद्र के नेतृत्व में देवता ब्रह्मा जी के पास गए। उन्होंने प्रार्थना की: "हमें एक ऐसा 'क्रीडनीयक' (मनोरंजन का साधन) दीजिए जो न केवल आनंद दे, बल्कि शिक्षा भी दे, और जिसे शूद्रों सहित सभी वर्ण सुन और देख सकें (क्योंकि चार वेदों के श्रवण का अधिकार सभी को नहीं था)।"
तब ब्रह्मा जी ने चारों वेदों के सार को मिलाकर 'पंचम वेद' (नाट्यवेद) की रचना की:
1. ऋग्वेद से 'पाठ्य' (संवाद/Dialogue) लिया।
2. सामवेद से 'गीत' (संगीत/Music) लिया।
3. यजुर्वेद से 'अभिनय' (Acting/Gestures) लिया।
4. अथर्ववेद से 'रस' (Emotions/Aesthetics) लिया।
ब्रह्मा जी ने यह नाट्यवेद भरतमुनि को सौंपा, जिन्होंने अपने 100 पुत्रों (शिष्यों) के साथ पृथ्वी पर इसका मंचन किया।
4. 'रस सिद्धांत' (Theory of Rasa) का मूल आधार
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का प्राण 'रस' (Rasa) है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है: "न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते" (रस के बिना नाट्य में किसी भी अर्थ की प्रवृत्ति नहीं होती)।
रस क्या है? सामान्य भाषा में रस का अर्थ है 'स्वाद' (Juice/Taste)। जिस प्रकार अनेक प्रकार के व्यञ्जनों, औषधियों और मसालों (Spices) को मिलाने से एक नए 'स्वाद' (जैसे पान या शर्बत का स्वाद) की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार नाटक में जब विभिन्न भाव, अभिनय और संवाद मिलते हैं, तो दर्शक के हृदय में जो एक अलौकिक आनंद उत्पन्न होता है, उसे 'रस' कहते हैं।
5. रस-निष्पत्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (The Core Sutra)
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय (षष्ठ अध्याय) में रस की उत्पत्ति (निष्पत्ति) का विश्व का सबसे प्रसिद्ध सूत्र दिया है:
यह सूत्र एक मनोवैज्ञानिक समीकरण (Psychological Equation) है। मनुष्य के हृदय में प्रेम, क्रोध, भय, शोक जैसे भाव जन्म से ही सोई हुई अवस्था (Dormant state) में मौजूद रहते हैं। इन्हें 'स्थायी भाव' (Permanent Emotions) कहा जाता है। जब ये स्थायी भाव मंच पर प्रस्तुत किए गए विभाव, अनुभाव आदि से मिलते हैं, तो वे 'रस' में बदल जाते हैं।
6. विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी और स्थायी भाव का तंत्र
रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया को समझने के लिए इन चार तकनीकी शब्दों (Technical terms) को समझना आवश्यक है:
जिस कारण से व्यक्ति के हृदय में भाव जागता है, उसे विभाव कहते हैं। इसके दो भाग हैं:
(a) आलंबन (Alambana): वह मुख्य व्यक्ति या वस्तु जिसके कारण भाव जागे। (जैसे दुष्यंत के मन में प्रेम जगाने के लिए 'शकुंतला' आलंबन है)।
(b) उद्दीपन (Uddipana): वह वातावरण जो उस भाव को और बढ़ाए। (जैसे वसंत ऋतु, चांदनी रात, एकांत, या शकुंतला की सुंदरता)।
भाव जागने के बाद जो शारीरिक और मानसिक चेष्टाएं (Physical reactions) होती हैं, वे अनुभाव हैं। (जैसे प्रेम में मुस्कुराना, क्रोध में आँखें लाल होना, या डर से पसीना आना)। यह भावों का 'अनुसरण' करते हैं।
3. व्यभिचारी / संचारी भाव (Vyabhichari / Transient Emotions)ये वे छोटे-छोटे भाव हैं जो पानी के बुलबुले की तरह उठते हैं और नष्ट हो जाते हैं, लेकिन मुख्य भाव (स्थायी भाव) को मजबूत करते हैं। भरतमुनि ने इनकी संख्या 33 बताई है (जैसे शंका, हर्ष, मोह, चिंता, ग्लानि आदि)।
4. स्थायी भाव (Sthayi Bhava) - (Foundation)यह मनुष्य का वह मूल भाव है जो शुरू से अंत तक बना रहता है। जब विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव इस स्थायी भाव से आकर मिलते हैं, तब यह रस रूप में परिणत हो जाता है (जैसे 'रति' नामक स्थायी भाव 'शृंगार रस' बन जाता है)।
7. नाट्यशास्त्र के अष्ट-रस (The Eight Rasas)
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में मूल रूप से केवल 8 रसों का वर्णन किया है। (बाद में आचार्य अभिनवगुप्त और मम्मट ने 'शांत रस' को जोड़कर इसे 'नवरस' बना दिया)।
भरतमुनि के 8 रस और उनके 'स्थायी भाव' इस प्रकार हैं:
| रस (Rasa) | स्थायी भाव (Permanent Emotion) | वर्ण (रंग / Color) |
|---|---|---|
| 1. शृंगार (Shringara - Love/Beauty) | रति (Rati - Love) | श्याम (Dark Blue) |
| 2. हास्य (Hasya - Comic) | हास (Hasa - Mirth) | श्वेत (White) |
| 3. करुण (Karuna - Pathos) | शोक (Shoka - Sorrow) | कपोत (Dove-colored) |
| 4. रौद्र (Raudra - Anger) | क्रोध (Krodha - Anger) | रक्त (Red) |
| 5. वीर (Veera - Heroism) | उत्साह (Utsaha - Energy) | गौ़र (Light/Gold) |
| 6. भयानक (Bhayanaka - Terror) | भय (Bhaya - Fear) | कृष्ण (Black) |
| 7. बीभत्स (Bibhatsa - Disgust) | जुगुप्सा (Jugupsa - Disgust) | नील (Blue) |
| 8. अद्भुत (Adbhuta - Wonder) | विस्मय (Vismaya - Astonishment) | पीत (Yellow) |
8. चतुर्विध अभिनय: कला की अभिव्यक्ति के चार द्वार
रस-निष्पत्ति को मंच पर साकार करने के लिए नट (Actor) को 'अभिनय' करना पड़ता है। भरतमुनि ने अभिनय के चार प्रकार बताए हैं, जो आज भी भरतनाट्यम, कत्थक या सिनेमा की एक्टिंग का मूल आधार हैं:
- आंगिक (Angika): शरीर के अंगों (हाथ की मुद्राएं, चेहरे के हाव-भाव, आँखों की गति) द्वारा भाव प्रकट करना।
- वाचिक (Vachika): वाणी (संवाद, कविता, स्वर के उतार-चढ़ाव) द्वारा भाव प्रकट करना।
- आहार्य (Aharya): वेशभूषा, मेकअप, आभूषण और मंच-सज्जा (Stage Setting) के माध्यम से।
- सात्त्विक (Sattvika): यह सबसे कठिन है। जब अभिनेता उस भाव में इतना डूब जाए कि उसके शरीर में अपने आप पसीना (स्वेद), आंसू (अश्रु), या रोमांच (रौंगटे खड़े होना) आ जाए। इसे 'सात्त्विक भाव' कहते हैं।
9. निष्कर्ष: विश्व-रंगमंच के शाश्वत सूत्रधार
आचार्य भरतमुनि ने यह स्थापित किया कि कला केवल 'टाइमपास' नहीं है। रस-निष्पत्ति के चरम क्षण में, दर्शक अपने व्यक्तिगत अहंकार और दुखों को भूल जाता है (इसे बाद के आचार्यों ने 'साधारणीकरण' / Universalization कहा) और एक ऐसी मानसिक शांति का अनुभव करता है जो 'ब्रह्मानंद सहोदर' (ईश्वर-प्राप्ति के आनंद के समान) है।
चाहे हॉलीवुड का सिनेमा हो या कोई शास्त्रीय नृत्य, जब भी कोई दर्शक किसी दृश्य को देखकर रोता है, हंसता है या उत्साह से भर उठता है, तो वह अनजाने में भरतमुनि के 'रस-निष्पत्ति' सूत्र को ही जी रहा होता है। भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' केवल एक किताब नहीं है; यह मानवीय संवेदनाओं (Human Emotions) की सबसे प्राचीन और सबसे प्रामाणिक 'मैनुअल' (Manual) है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- नाट्यशास्त्र - आचार्य भरतमुनि (चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन - हिंदी अनुवाद सहित)।
- अभिनवभारती - आचार्य अभिनवगुप्त (नाट्यशास्त्र की दार्शनिक टीका)।
- रस-सिद्धांत - डॉ. नगेंद्र (हिंदी साहित्य में रस की विस्तृत मीमांसा)।
- भारतीय काव्यशास्त्र की रूपरेखा - आचार्य रामचंद्र शुक्ल।
