नवरात्रि का पावन पर्व माँ जगदम्बा की आराधना और शक्ति संचय का सर्वश्रेष्ठ समय है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महाव्रत में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों (नवदुर्गा) की पूजा की जाती है। प्रत्येक देवी का अपना एक विशिष्ट स्वरूप, मंत्र और प्रिय भोग होता है। जो साधक विधि-विधान से देवी के इन नौ स्वरूपों की उपासना करता है, उसके जीवन से सभी प्रकार के रोग, शोक, दरिद्रता और भय नष्ट हो जाते हैं।
नवरात्रि के प्रथम दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल पुष्प है तथा इनका वाहन वृषभ (बैल) है। यह मूलाधार चक्र को जाग्रत करती हैं।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।
- पूजन विधि: कलश स्थापना के पश्चात लाल पुष्पों (विशेषकर गुड़हल) से माँ की पूजा करें। घी का दीपक जलाएं और कुमकुम का तिलक करें।
- विशेष भोग: माँ शैलपुत्री को 'गाय के शुद्ध घी' का भोग अत्यंत प्रिय है। घी अर्पित करने से आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएँ हाथ में कमंडल है। यह स्वरूप त्याग, वैराग्य और संयम की वृद्धि करता है।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।
- पूजन विधि: देवी को श्वेत (सफेद) और सुगंधित पुष्प अर्पित करें। स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान लगाते हुए इनकी पूजा करें।
- विशेष भोग: माँ को 'चीनी, मिश्री और पंचामृत' का भोग लगाया जाता है। इससे आयु में वृद्धि होती है।
तृतीय दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथ अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित हैं।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नम:।
- पूजन विधि: माता को चमेली के पुष्प अथवा लाल कमल अर्पित करें। इनके घंटे की ध्वनि से सभी नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।
- विशेष भोग: माँ चंद्रघंटा को 'दूध या दूध से बनी मिठाई (खीर)' का भोग लगाया जाता है। इससे मानसिक शांति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
अपनी मंद हल्की हँसी से ब्रह्मांड (अण्ड) को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा कहा जाता है। इनकी आठ भुजाएं हैं। यह सूर्यमंडल के भीतर निवास करती हैं और इनकी पूजा से अनाहत चक्र जाग्रत होता है।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नम:।
- पूजन विधि: माँ को हरे और पीले रंग के वस्त्र व पुष्प अर्पित करें। कुमहड़े (पेठा) की बलि भी दी जाती है।
- विशेष भोग: देवी को 'मालपुआ' का भोग अत्यंत प्रिय है। इससे बुद्धि कुशाग्र होती है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
भगवान कार्तिकेय (स्कंद कुमार) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं और ये अपनी गोद में बालरूप स्कंद को लिए हुए हैं। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कन्दमात्रै नम:।
- पूजन विधि: पीले रंग के पुष्प (जैसे गेंदा) और पीले वस्त्र अर्पित करें। इनकी पूजा से भगवान कार्तिकेय की पूजा स्वतः हो जाती है।
- विशेष भोग: माँ स्कंदमाता को 'केले (Banana)' का भोग लगाया जाता है। इससे शरीर निरोगी रहता है।
महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं (गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए इन्हीं की पूजा की थी)।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नम:।
- पूजन विधि: पीले या लाल पुष्प (विशेषकर लाल गुलाब) अर्पित करें। विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए इनकी पूजा सर्वश्रेष्ठ है।
- विशेष भोग: माँ कात्यायनी को 'शहद (Honey)' का भोग अर्पित किया जाता है। इससे आकर्षण शक्ति और रूप की प्राप्ति होती है।
नवरात्रि का सातवाँ दिन महाशक्ति माँ कालरात्रि का है। इनका वर्ण घोर अंधकार की भांति काला है। इनके बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। ये दुष्टों का विनाश करने वाली 'शुभंकरी' हैं।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।
- पूजन विधि: नीले या रातरानी के पुष्प अर्पित करें। तंत्र-मंत्र की साधना और शत्रुओं के नाश के लिए मध्यरात्रि में इनकी पूजा की जाती है।
- विशेष भोग: देवी कालरात्रि को 'गुड़ (Jaggery)' का भोग अर्पित किया जाता है। इससे आकस्मिक संकटों और अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
कठोर तपस्या के कारण जब माता पार्वती का शरीर काला पड़ गया, तब शिव जी ने गंगा जल से उन्हें स्नान कराया, जिससे वे श्वेत वर्ण की हो गईं और 'महागौरी' कहलाईं। यह पूर्णतः शांत और सौम्य स्वरूप है।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्यै नम:।
- पूजन विधि: श्वेत वस्त्र और मोगरा या बेला के पुष्प अर्पित करें। इस दिन कन्या पूजन (कंजक पूजा) का विशेष महत्व है।
- विशेष भोग: माँ महागौरी को 'नारियल (Coconut)' का भोग लगाया जाता है। इससे संतान सुख और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
नवरात्रि के अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की उपासना होती है। यह सभी आठ सिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) को प्रदान करने वाली हैं। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से 'अर्धनारीश्वर' रूप प्राप्त किया था।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥
- बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नम:।
- पूजन विधि: माता को लाल चुनरी और लाल कमल का पुष्प अर्पित करें। इस दिन नवमी का हवन करके व्रत का पारण किया जाता है।
- विशेष भोग: माँ सिद्धिदात्री को 'तिल, हलवा, पूरी और चने' का भोग अत्यंत प्रिय है। इससे मोक्ष और लौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

