पंडित विष्णुशर्मा: 'पंचतंत्र' के रचयिता, नीति कथा साहित्य के जनक और प्राचीन भारत के प्रथम 'एजुकेटर' | Vishnu Sharma

Sooraj Krishna Shastri
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पंडित विष्णुशर्मा: 'पंचतंत्र' के प्रणेता और नीति-कथा साहित्य के जनक

पंडित विष्णुशर्मा: 'पंचतंत्र' के रचयिता और नीति-कथा साहित्य के आदि-जनक

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: प्राचीन भारत का वह महान 'एजुकेटर' (Educator) जिसने राजनीति और कूटनीति के नीरस सिद्धांतों को 'पशु-पक्षियों की कहानियों' में पिरोकर, विश्व साहित्य को सबसे अधिक अनुवादित होने वाला धर्मनिरपेक्ष ग्रंथ प्रदान किया।

भारतीय साहित्य में यदि किसी एक ग्रंथ ने अपनी सीमाओं को लांघकर पूरे विश्व के बाल-मनोविज्ञान और राजनीतिक चिंतन को प्रभावित किया है, तो वह निस्संदेह 'पंचतंत्र' (Panchatantra) है। इसके रचयिता पंडित विष्णुशर्मा थे।

पंचतंत्र कोई 'बेडटाइम स्टोरी' (Bedtime Story) की किताब नहीं है। यह आचार्य कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' और महर्षि वात्स्यायन के 'कामसूत्र' का ही एक अत्यंत व्यावहारिक और सरल रूप है। विष्णुशर्मा ने यह ग्रंथ उन राजकुमारों के लिए लिखा था जो भारी-भरकम शास्त्र पढ़ने में असमर्थ थे। उन्होंने शेर, लोमड़ी, सियार, कौवे और कछुए जैसे पात्रों के माध्यम से मित्रता, कूटनीति, युद्ध, संधि और छल का ऐसा ताना-बाना बुना, जो आज के कॉरपोरेट मैनेजमेंट (Corporate Management) और राजनीति विज्ञान (Political Science) के लिए भी अचूक है।

📌 पंडित विष्णुशर्मा: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य विष्णुशर्मा (Pandit Vishnu Sharma)
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (300 BCE) से तीसरी शताब्दी ईस्वी (300 CE) के मध्य।
चूँकि पंचतंत्र में आचार्य 'चाणक्य' (300 ई.पू.) का अत्यंत आदर के साथ उल्लेख है, अतः यह निश्चित है कि विष्णुशर्मा चाणक्य के बाद हुए। ग्रंथ की भाषा, पल्लव वंशीय राजाओं के संदर्भ और 6ठी शताब्दी में इसके फारसी अनुवाद (Pahlavi) के साक्ष्य इसे मौर्य काल और गुप्त काल के बीच स्थापित करते हैं।
आश्रयदाता राजा दक्षिण भारत (या कुछ विद्वानों के अनुसार कश्मीर) के 'महिलारोप्य' नगर के राजा अमरशक्ति
महानतम कृति पंचतंत्र (Panchatantra) - पाँच भागों (तंत्रों) में विभक्त नीति-कथाओं का संग्रह।
साहित्यिक विधा नीति-कथा (Fables / Didactic Literature) - जिसमें पशु-पक्षियों के माध्यम से मानव-व्यवहार और राजनीति (Statecraft) सिखाई जाती है।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: महिलारोप्य का दरबार

पंडित विष्णुशर्मा के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जो भी जानकारी मिलती है, वह पंचतंत्र की 'कथामुख' (प्रस्तावना) से ही प्राप्त होती है। वे एक अत्यंत वृद्ध, परम ज्ञानी और अस्सी वर्ष (80 Years) की आयु पार कर चुके कुलीन ब्राह्मण थे, जिनकी इंद्रियां (Senses) शांत हो चुकी थीं और जिन्हें धन-संपत्ति का कोई लालच नहीं था।

विष्णुशर्मा के काल का निर्धारण एक जटिल विषय रहा है, लेकिन ग्रंथ के मंगलाचरण में वे प्राचीन नीतिशास्त्रियों को नमन करते हुए लिखते हैं: "मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससूताय। चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥" (मनु, बृहस्पति, शुक्राचार्य, पराशर और विद्वान चाणक्य को नमस्कार है)। यह सिद्ध करता है कि वे चाणक्य (मौर्य काल) के बाद के आचार्य हैं।

3. पंचतंत्र की उत्पत्ति: तीन मूर्ख राजकुमारों को पढ़ाने की चुनौती

पंचतंत्र की रचना का कारण एक अत्यंत रोचक घटना है। दक्षिण के महिलारोप्य नामक नगर में अमरशक्ति नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। राजा तो महान था, लेकिन उसके तीन पुत्र—बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनंतशक्ति—परम मूर्ख, जिद्दी और शास्त्र-विमुख (पढ़ाई से दूर भागने वाले) थे।

विष्णुशर्मा की ऐतिहासिक प्रतिज्ञा

निराश राजा ने अपने दरबारियों से कहा: "ऐसे मूर्ख पुत्रों के होने से तो अच्छा था कि उनका जन्म ही न होता।" तब सुमति नामक एक मंत्री ने आचार्य विष्णुशर्मा का नाम सुझाया।

राजा ने विष्णुशर्मा को अपार धन का लालच देकर कहा कि वे राजकुमारों को राजनीति सिखा दें। विष्णुशर्मा ने धन ठुकरा दिया और एक ऐसी प्रतिज्ञा की जिसने इतिहास रच दिया: "हे राजन्! मैं अपनी विद्या को बेचता नहीं हूँ। लेकिन मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि मैंने केवल छह महीने (6 Months) के भीतर आपके इन मूर्ख पुत्रों को 'नीतिशास्त्र' में पारंगत नहीं कर दिया, तो मैं अपना नाम छोड़ दूँगा।"
और इसी छह महीने के 'क्रैश कोर्स' (Crash Course) का परिणाम था—'पंचतंत्र'।

4. 'पंच-तंत्र' (Five Principles): कूटनीति के पांच मनोवैज्ञानिक अंग

विष्णुशर्मा ने राजनीति (Statecraft) को पांच तंत्रों (Principles/Books) में विभाजित किया। प्रत्येक तंत्र की अपनी एक मुख्य 'फ्रेम स्टोरी' (Frame Story) है, जिसके भीतर कई छोटी-छोटी कहानियां गुंथी हुई हैं (कथा के भीतर कथा):

1. मित्रभेद (The Separation of Friends)

विषय: दो अच्छे दोस्तों के बीच कैसे फूट डाली जाती है? (Divide and Rule).
मुख्य कथा: 'पिंगलक' नामक शेर और 'संजीवक' नामक बैल की गहरी दोस्ती हो जाती है। 'करटक' और 'दमनक' नाम के दो चालाक सियार (Jackals) मंत्री अपनी कूटनीति से उन दोनों के बीच गलतफहमी पैदा करते हैं, जिससे अंततः शेर बैल को मार डालता है। यह तंत्र षड्यंत्र (Conspiracy) का सबसे गहरा विश्लेषण है।

2. मित्रसम्प्राप्ति (The Gaining of Friends)

विषय: कमजोर और अलग-अलग शक्तियों वाले लोग भी यदि सच्ची मित्रता कर लें, तो वे किसी भी शक्तिशाली शत्रु को हरा सकते हैं।
मुख्य कथा: एक कौवा, एक चूहा, एक कछुआ और एक हिरण। इन चार अलग-अलग स्वभाव वाले मित्रों ने आपसी सहयोग से कैसे बहेलिए (शिकारी) के जाल से एक-दूसरे की जान बचाई। यह गठबंधन (Alliances) का सिद्धांत है।

3. काकोलूकीयम् (Of Crows and Owls)

विषय: जन्मजात शत्रुओं (Natural Enemies) के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? युद्ध और शांति (War and Peace)।
मुख्य कथा: कौवों और उल्लुओं के बीच पीढ़ियों की दुश्मनी। कौवों का मंत्री 'चिरंजीवी' खुद को घायल करके उल्लुओं के किले में घुस जाता है, उनका विश्वास जीतता है, और सही समय आने पर उल्लुओं के पूरे किले को आग लगाकर नष्ट कर देता है। यह गुप्तचरी और शत्रु के विनाश (Espionage) का पाठ है।

4. लब्धप्रणाशम् (Loss of Gains)

विषय: जो हाथ में आ चुका है (लब्ध), वह मूर्खता के कारण कैसे नष्ट (प्रणाश) हो जाता है?
मुख्य कथा: बंदर और मगरमच्छ की कहानी। मगरमच्छ बंदर को अपनी पत्नी के लिए (उसका दिल खाने के लिए) नदी के बीच ले जाता है। बंदर अपनी चालाकी (Presence of mind) से कहता है कि "अरे! मैं तो अपना दिल पेड़ पर ही भूल आया।" मगरमच्छ बेवकूफी में उसे वापस किनारे लाता है और अपना शिकार खो देता है।

5. अपरीक्षितकारकम् (Ill-Considered Action)

विषय: बिना सोचे-विचारे और बिना पूरी तरह जांचे (अपरीक्षित) कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए।
मुख्य कथा: ब्राह्मण और नेवला (Mongoose)। ब्राह्मण की पत्नी बच्चे को छोड़कर पानी लेने जाती है। एक सांप आता है, जिसे नेवला मारकर बच्चे को बचाता है। ब्राह्मण खून से लथपथ नेवले को देखकर सोचता है कि उसने बच्चे को मार दिया है, और बिना जांचे नेवले की हत्या कर देता है। बाद में सच्चाई जानकर पछताता है। यह जल्दबाज़ी (Haste) के परिणामों का पाठ है।

5. विष्णुशर्मा की शिक्षा-पद्धति: प्राचीन 'गेमिफिकेशन' (Gamification)

आधुनिक शिक्षा-शास्त्र में जिसे 'Story-based Learning' या 'Gamification' कहा जाता है, विष्णुशर्मा ने उसे 2000 साल पहले ही खोज लिया था।

उन्हें पता था कि यदि राजकुमारों को 'अर्थशास्त्र' के भारी सूत्र रटाए गए, तो वे सो जाएंगे। इसलिए उन्होंने 'दमनक' (चालाक सियार) के माध्यम से यह सिखाया कि एक मंत्री को राजा के क्रोध को कैसे शांत करना चाहिए। यह मानव मनोविज्ञान का चरम था जहाँ पशु बोलते हैं, राजनीति पर बहस करते हैं और वेद-उपनिषदों के श्लोक उद्धृत करते हैं।

6. पंचतंत्र का व्यावहारिक दर्शन: पुस्तकीय ज्ञान का विरोध

विष्णुशर्मा का सबसे बड़ा संदेश यह था कि केवल किताबें पढ़ना पर्याप्त नहीं है; 'व्यावहारिक ज्ञान' (Common Sense) उससे भी बड़ा है।

वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा।
बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः॥
(अर्थ: 'विद्या' (किताबी ज्ञान) से 'बुद्धि' (व्यावहारिक समझ / Common Sense) श्रेष्ठ है। जो केवल विद्या पढ़ते हैं परंतु उनमें व्यावहारिक बुद्धि नहीं होती, वे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे वे 'शेर को जीवित करने वाले' मूर्ख विद्वान नष्ट हो गए थे।)

(यह श्लोक उस कहानी का है जिसमें चार मित्र जंगल में मरे हुए शेर की हड्डियां जोड़कर अपनी 'विद्या' से उसमें जान डाल देते हैं, और वह जीवित शेर उन चारों किताबी मूर्खों को खा जाता है।)

7. 'कलीला व दिमना': पंचतंत्र की विश्व-यात्रा और अनुवाद

बाइबिल (Bible) के बाद विश्व में सबसे अधिक भाषाओं में अनुवादित होने वाली पुस्तक 'पंचतंत्र' ही है।

6ठी शताब्दी ईस्वी (570 CE) में फारस (Persia) के ससानिद सम्राट खुसरो प्रथम ने अपने वैद्य (Doctor) बर्ज़ुया (Borzuya) को भारत भेजा। बर्ज़ुया ने पंचतंत्र को पहलवी (मध्य फारसी) भाषा में अनूदित किया। बाद में 8वीं शताब्दी में इसका अरबी (Arabic) अनुवाद इब्न अल-मुकफ़्फ़ा ने 'कलीला व दिमना' (Kalila wa Demna) नाम से किया (जो वास्तव में 'करटक और दमनक' सियारों का अरबी अपभ्रंश था)।
यहीं से यह सीरियाई, ग्रीक, लैटिन और अंततः 11वीं शताब्दी में यूरोप तक पहुँची और 'ऐसप्स फेबल्स' (Aesop's Fables) से लेकर 'अरेबियन नाइट्स' तक हर विश्व-साहित्य को प्रभावित किया।

8. निष्कर्ष: मानव स्वभाव का सबसे बड़ा दर्पण

पंडित विष्णुशर्मा कोई सामान्य कथावाचक नहीं थे। वे राजनीतिक यथार्थवाद (Political Realism) के सबसे बड़े प्रवर्तक थे। 'पंचतंत्र' में कोई भी कहानी 'आदर्शवाद' (Idealism) पर खत्म नहीं होती। इसमें सियार अगर चालाक है, तो वह जीतता है; क्योंकि राजनीति में अच्छाई से ज़्यादा 'बुद्धिमानी' मायने रखती है।

विष्णुशर्मा ने अपनी छह महीने की उस चुनौती में न केवल उन तीन राजकुमारों को बुद्धिमान बनाया, बल्कि आने वाली सहस्राब्दियों तक पूरी मानव जाति को यह सिखा दिया कि "शत्रु, मित्र और स्वयं को कैसे पहचाना जाए।" विष्णुशर्मा का पंचतंत्र भारतीय ज्ञान-परंपरा (IKS) का वह मुकुट है जो आज भी हर देश और हर काल में प्रासंगिक (Relevant) है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • पञ्चतन्त्रम् - आचार्य विष्णुशर्मा (चौखम्बा प्रकाशन - मूल संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद)।
  • Kalila wa Dimna - The Arabic translation history of Panchatantra.
  • History of Indian Literature (Vol 3) - Maurice Winternitz (नीति कथा साहित्य का विश्वव्यापी प्रभाव)।
  • The Panchatantra (English Translation) - Arthur W. Ryder (1925).

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