महाकवि कुमारदास: 'जानकीहरण' महाकाव्य के रचयिता, श्रीलंका के राजा और कालिदास के अनन्य प्रशंसक | Mahakavi Kumaradasa

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि कुमारदास: 'जानकीहरण' के प्रणेता और समुद्र-पार के संस्कृत सम्राट

महाकवि कुमारदास: 'जानकीहरण' महाकाव्य के रचयिता और कालिदास के अनन्य प्रशंसक

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, साहित्यिक और काव्यशास्त्रीय विश्लेषण: प्राचीन श्रीलंका (सिंहल द्वीप) का वह राजा-कवि, जिसने कालिदास के 'रघुवंशम्' से प्रेरित होकर ऐसा महाकाव्य लिखा कि भारतीय आलोचकों ने उसे 'रावण' के समान ही शक्तिशाली और दुस्साहसी मान लिया।

संस्कृत महाकाव्यों के इतिहास में एक अलिखित नियम बन गया था कि महाकवि कालिदास के 'रघुवंशम्' के बाद अब कोई अन्य कवि 'रामकथा' पर महाकाव्य लिखने का दुस्साहस नहीं करेगा। यदि कोई लिखता भी था, तो उसकी तुलना तुरंत कालिदास से की जाती थी और उसे हीन मान लिया जाता था।

लेकिन भारत के दक्षिणी छोर से परे, सिंहल द्वीप (श्रीलंका) से एक ऐसी काव्यात्मक आवाज़ उठी जिसने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के विद्वानों को अपना लोहा मनवा लिया। वह आवाज़ थी महाकवि कुमारदास (Kumaradasa) की और उनका अमर ग्रंथ था 'जानकीहरण' (Janakiharanam)। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संस्कृत भाषा केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं में कैद नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक धड़कन है।

📌 महाकवि कुमारदास: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
पूरा नाम एवं उपाधि कुमारदास (श्रीलंकाई परंपरा के अनुसार उन्हें 'कुमारधातुसेन' या 'कुमारदास' नामक राजा माना जाता है)।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग छठी शताब्दी ईस्वी का अंत या सातवीं शताब्दी का आरंभ (Late 6th - Early 7th Century CE)।
श्रीलंकाई महावंश (Mahavamsa) के अनुसार: वे सिंहल के राजा 'कुमारधातुसेन' थे, जिन्होंने 517 ई. से 526 ई. तक शासन किया। चूँकि 7वीं सदी के आचार्य वामन और दण्डी उनके श्लोकों का उद्धरण देते हैं, अतः उनका काल 6वीं-7वीं शताब्दी पूर्णतः प्रामाणिक है।
जन्म स्थान सिंहल द्वीप (वर्तमान श्रीलंका / Sri Lanka)।
एकमात्र महाकाव्य जानकीहरण (Janakiharanam) - सीता के अपहरण (Abduction) पर आधारित 20 सर्गों का महाकाव्य।
काव्य-परंपरा कालिदास की 'वैदर्भी रीति' के प्रबल अनुयायी (Follower)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: श्रीलंका के राजा 'कुमारधातुसेन'

संस्कृत के कई महान कवि निर्धन थे, लेकिन कुमारदास के विषय में यह सर्वमान्य जनश्रुति है कि वे श्रीलंका के एक शक्तिशाली राजा थे। सिंहली इतिहास-ग्रंथ 'महावंश' में एक राजा 'कुमारधातुसेन' (517-526 ई.) का वर्णन है, जिन्हें ही संस्कृत विद्वान महाकवि 'कुमारदास' मानते हैं।

यद्यपि श्रीलंका की मातृभाषा सिंहली (Sinhalese) और धार्मिक भाषा पाली (Pali) थी, फिर भी कुमारदास का संस्कृत व्याकरण (पाणिनीय) और भारतीय काव्यशास्त्र पर असाधारण अधिकार था। उनके महाकाव्य में अयोध्या, सरयू नदी और हिमालय का इतना जीवंत वर्णन है कि लगता है जैसे वे जीवन भर भारत में ही रहे हों।

3. राजशेखर की अमर प्रशस्ति: रावण और कुमारदास की तुलना

10वीं शताब्दी के महान भारतीय आलोचक राजशेखर ने कुमारदास की प्रशंसा में एक अत्यंत विलक्षण और 'श्लेष' (Pun) से भरा हुआ श्लोक लिखा है, जो संस्कृत साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है:

जानकीहरणं कर्तुं रघुवंशे स्थिते सति।
कविः कुमारदासश्च रावणश्च यदि क्षमः॥
(अर्थ: 'रघुवंश' के उपस्थित रहते हुए 'जानकी-हरण' (सीता का अपहरण / या जानकीहरण नामक काव्य की रचना) करने का सामर्थ्य केवल दो ही लोगों में था—एक तो रावण में (जिसने राम के होते हुए सीता का हरण किया), और दूसरा कवि कुमारदास में (जिन्होंने कालिदास के 'रघुवंशम्' काव्य के होते हुए 'जानकीहरण' महाकाव्य की रचना की)।)

राजशेखर ने यह स्पष्ट कर दिया कि कालिदास की अमर कृति के सामने अपनी कृति को खड़ा करने का जो 'साहित्यिक दुस्साहस' कुमारदास ने किया, वह वास्तव में अत्यंत वंदनीय था।

4. 'जानकीहरण' महाकाव्य: 20 सर्गों में रामकथा का विस्तार

'जानकीहरण' (The Abduction of Janaki) 20 सर्गों का एक पूर्ण और शास्त्रीय महाकाव्य है।

महाकाव्य की विषय-वस्तु

कालिदास के 'रघुवंशम्' में राम की कथा केवल कुछ सर्गों (सर्ग 10 से 15) तक सीमित है। लेकिन कुमारदास ने रामायण की संपूर्ण कथा को विस्तार दिया।

महाकाव्य का आरंभ राजा दशरथ और अयोध्या के अत्यंत सुंदर वर्णन से होता है। इसके बाद राम का जन्म, विश्वामित्र के साथ वन-गमन, ताड़का वध, सीता स्वयंवर, वनवास, और अंत में रावण द्वारा सीता का हरण (जानकी-हरण) तथा राम-रावण युद्ध का अत्यंत ओजस्वी चित्रण है। यद्यपि ग्रंथ का नाम 'जानकीहरण' है, लेकिन इसका अंत रावण के वध और राम के राज्याभिषेक (सुखांत) के साथ होता है।

5. कालिदास और कुमारदास की किंवदंती: 'कमले कमलोत्पत्तिः'

श्रीलंकाई परंपरा (Ceylon Tradition) में कालिदास और कुमारदास की मित्रता और मृत्यु की एक अत्यंत प्रसिद्ध और रुला देने वाली किंवदंती (Legend) है। यद्यपि इतिहासकार मानते हैं कि दोनों के बीच लगभग 100-200 वर्षों का अंतर था, फिर भी यह कथा दोनों कवियों के आध्यात्मिक जुड़ाव को दर्शाती है:

एक श्लोक की कीमत और चिता की आग

कहा जाता है कि कुमारदास (राजा) ने एक गणिका (Courtesan) के घर की दीवार पर एक अधूरी कविता (समस्या-पूर्ति) लिखी और घोषणा की कि जो इसे पूरा करेगा उसे भारी इनाम मिलेगा। वह आधी पंक्ति थी:
"कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न च दृश्यते।"
(अर्थ: कमल पर कमल की उत्पत्ति केवल सुनी जाती है, कभी देखी नहीं गई।)

संयोगवश, महाकवि कालिदास श्रीलंका भ्रमण पर आए थे और उसी गणिका के घर ठहरे थे। उन्होंने तुरंत दीवार पर श्लोक पूरा कर दिया:
"बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम्॥"
(अर्थ: हे बाले! यदि कमल पर कमल नहीं उगता, तो तुम्हारे इस कमल-समान मुख पर ये दो नीले कमल (तुम्हारी दो सुंदर आँखें) कैसे खिल रहे हैं?)

गणिका इनाम का सारा धन स्वयं हड़पना चाहती थी, इसलिए उसने कालिदास की हत्या कर दी और शव को छिपा दिया। जब राजा कुमारदास को यह बात पता चली, तो वे अपने 'काव्य-गुरु' कालिदास की मृत्यु से इतने शोकाकुल हुए कि वे स्वयं कालिदास की धधकती चिता में कूद गए और अपने प्राण त्याग दिए।

यह कथा ऐतिहासिक रूप से चाहे सत्य न हो, लेकिन यह प्रमाणित करती है कि श्रीलंकाई साहित्य में कालिदास को कितना ऊँचा दर्जा प्राप्त था।

6. काव्य-शैली (Poetic Style): कालिदास और भारवि के बीच का सेतु

कुमारदास की काव्य-शैली 'वैदर्भी' (कालिदास जैसी कोमल) और 'पांचाली' (भारवि जैसी अलंकृत) के बीच का सेतु है।

  • अनुप्रास का मोह: कुमारदास को 'अनुप्रास' (Alliteration) अलंकार से बहुत प्रेम था। वे शब्दों की ध्वनियों के साथ खेलते हैं, जिससे कविता में एक संगीतमय झंकार उत्पन्न होती है।
  • प्रकृति और शृंगार: उनके द्वारा किया गया वसंत ऋतु, जल-क्रीड़ा और सूर्यास्त का वर्णन कालिदास की टक्कर का है। वे मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सूक्ष्मता से पकड़ते हैं।

7. पांडुलिपि की खोज: सिंहली टीका (Sanna) से संस्कृत का उद्धार

'जानकीहरण' का इतिहास भी भास के नाटकों की तरह ही 'पुनर्जन्म' का इतिहास है। भारत से यह महाकाव्य पूरी तरह लुप्त (Lost) हो गया था।

श्रीलंका में इस ग्रंथ की 'सन्न' (Sanna - सिंहली भाषा में शब्दशः टीका) उपलब्ध थी। आधुनिक काल में विद्वानों (जैसे धर्मकीर्ति और बाद में भारतीय विद्वानों) ने उस सिंहली (Sri Lankan) टीका का रिवर्स-इंजीनियरिंग (Reverse translation) करके मूल संस्कृत श्लोकों को फिर से जीवित किया। बाद में दक्षिण भारत से इसके कुछ मूल संस्कृत पन्ने भी प्राप्त हुए, जिससे इस महान ग्रंथ का उद्धार हो सका।

8. निष्कर्ष: समुद्र पार से आई संस्कृत की मधुर गूंज

महाकवि कुमारदास का 'जानकीहरण' केवल एक महाकाव्य नहीं है; यह सांस्कृतिक वैश्वीकरण (Cultural Globalization) का सबसे प्राचीन प्रमाण है। यह दर्शाता है कि संस्कृत भाषा और रामायण की कथा ने किस प्रकार समुद्र की लहरों को पार करके श्रीलंका के राजाओं के हृदयों पर राज किया था।

कुमारदास ने यह साबित कर दिया कि काव्य की उत्कृष्टता किसी क्षेत्र-विशेष की मोहताज नहीं होती। कालिदास के प्रति उनका जो साहित्यिक समर्पण था, उसने उन्हें संस्कृत 'महाकवियों' की उस विशिष्ट श्रेणी में हमेशा के लिए अमर कर दिया, जहाँ वे राजशेखर के शब्दों में "रघुवंश के रहते हुए जानकीहरण का दुस्साहस" करने वाले एकमात्र सम्राट माने जाते हैं।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • जानकीहरणम् - महाकवि कुमारदास (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)।
  • History of Classical Sanskrit Literature - M. Krishnamachariar.
  • महावंश (Mahavamsa) - श्रीलंका का ऐतिहासिक बौद्ध ग्रंथ (राजा कुमारधातुसेन के प्रसंग हेतु)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय (कुमारदास का ऐतिहासिक मूल्यांकन)।

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