Paundraka Vadh Katha: Nakli Vasudeva Krishna Ka Ant (Bhagwat Puran)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

पौण्ड्रक वध: नकली 'वासुदेव' का अंत और अहंकार का विनाश

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 66)

संसार में अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं है। जब मनुष्य शक्ति, पद और चाटुकारिता के मद में अंधा हो जाता है, तो वह स्वयं को ईश्वर मानने की भूल कर बैठता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित 'पौण्ड्रक वध' की कथा इसी मिथ्या अभिमान के विनाश का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह कथा हमें बताती है कि बाहरी वेशभूषा और नकल करने से कोई भगवान नहीं बन सकता; ईश्वरत्व तो केवल सत्य, धर्म और अनंत शक्ति में निहित है।

जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे और उनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल चुकी थी, उसी समय करूष देश में पौण्ड्रक नाम का एक राजा राज करता था। वह अत्यंत मूर्ख और घमंडी था। उसके आसपास रहने वाले मूर्ख और चापलूस मित्रों ने उसकी झूठी प्रशंसा कर-करके उसे यह विश्वास दिला दिया था कि "हे राजन! आप ही साक्षात वासुदेव हैं, इस पृथ्वी पर अवतरित हुए भगवान हैं।"

1. पौण्ड्रक का अहंकार और 'नकली कृष्ण' का वेश

चाटुकारों की बातों में आकर पौण्ड्रक का विवेक पूरी तरह नष्ट हो गया। वह स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण मानने लगा। उसने अपनी इस मूर्खता को सिद्ध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की तरह ही वेशभूषा धारण कर ली।

उसने अपने शरीर पर पीतांबर धारण किया, गले में वनमाला पहनी, और मोरपंख का मुकुट सजाया। उसने नकली कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स का चिह्न भी बनवा लिया। इतना ही नहीं, उसने लोहे या लकड़ी के बने नकली शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर लिए। अपने रथ की ध्वजा पर उसने गरुड़ का चिह्न अंकित करवा लिया। इस प्रकार, वह एक बहुरूपिये की तरह नकली वासुदेव बनकर अपने राज्य में घूमने लगा।

उसकी मूर्खता की पराकाष्ठा तब हुई जब उसने यह मान लिया कि द्वारका में रहने वाले श्रीकृष्ण असली नहीं हैं। उसने सोचा कि अब समय आ गया है कि असली वासुदेव (स्वयं) के सामने नकली वासुदेव (श्रीकृष्ण) को झुक जाना चाहिए।

2. द्वारकाधीश को अहंकार भरा संदेश

अपने मिथ्या अभिमान में चूर होकर, पौण्ड्रक ने एक दूत को द्वारका भेजा और भगवान श्रीकृष्ण के पास एक अत्यंत उद्दंडतापूर्ण संदेश भिजवाया। दूत ने द्वारका की सुधर्मा सभा में पहुँचकर, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण सिंहासन पर विराजमान थे, पौण्ड्रक का संदेश सुनाया:

॥ श्लोक ॥
वासुदेवोऽवतीर्णोऽहमेक एव न चापरः ।
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज ॥
यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत ।
त्यक्त्वैहि मां शरणं नो चेद् देहि ममाहवम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.66.5-6)
अर्थ: पौण्ड्रक ने कहलाया— "हे कृष्ण! इस पृथ्वी पर जीवों पर कृपा करने के लिए 'वासुदेव' नाम से केवल मैं ही अवतरित हुआ हूँ, मेरे सिवा कोई दूसरा वासुदेव नहीं है। तुम अपने इस झूठे नाम और वेश को त्याग दो। हे यदुवंशी! मूर्खताशद जो मेरे चिह्न (शंख, चक्र, गदा आदि) तुमने धारण कर रखे हैं, उन्हें छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, अन्यथा मुझसे युद्ध करो।"
3. भगवान की प्रतिक्रिया और युद्ध की तैयारी

पौण्ड्रक का यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण और अहंकारी संदेश सुनकर राजसभा में बैठे हुए उग्रसेन, बलराम जी और अन्य यदुवंशी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। वे सभी जोर-जोर से हँसने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने भी मुस्कुराते हुए दूत से कहा—

"हे दूत! तू अपने उस मूर्ख स्वामी से कहना कि जिन चिह्नों पर वह अपना अधिकार जता रहा है, मैं उन्हें अवश्य उस पर छोडूंगा, लेकिन तब, जब वह युद्धभूमि में मेरे सामने आएगा। उसकी मृत्यु अब निकट आ चुकी है। वह अपनी इस मूर्खता का फल शीघ्र ही पाएगा।"

दूत ने जाकर पौण्ड्रक को यह संदेश सुनाया। पौण्ड्रक आगबबूला हो गया। इधर, भगवान श्रीकृष्ण अपनी सेना लेकर काशी (वाराणसी) की ओर चल पड़े, क्योंकि पौण्ड्रक उस समय अपने मित्र काशीराज के यहाँ ठहरा हुआ था।

4. काशी के मैदान में विचित्र युद्ध

भगवान श्रीकृष्ण के आने का समाचार सुनकर पौण्ड्रक अपनी दो अक्षौहिणी सेना लेकर नगर से बाहर निकला। उसका मित्र काशीराज भी तीन अक्षौहिणी सेना के साथ उसकी सहायता के लिए आ गया। दोनों ओर की सेनाएं आमने-सामने डट गईं।

युद्धभूमि में एक अत्यंत विचित्र दृश्य उपस्थित हुआ। एक ओर साक्षात त्रिभुवनपति भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथ पर विराजमान थे, और दूसरी ओर उनका स्वांग रचाने वाला, नकली अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए, एक विदूषक (जोकर) जैसा दिखने वाला राजा पौण्ड्रक खड़ा था। उसके इस बनावटी रूप को देखकर भगवान की सेना के सैनिक भी अपनी हँसी नहीं रोक पा रहे थे। यह युद्ध कम और एक हास्य नाटक अधिक लग रहा था।

शत्रु सेना ने यदुवंशियों पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गदा, खड्ग, बाणों और चक्र से शत्रु सेना का संहार करना आरंभ किया। युद्धभूमि हाथियों, घोड़ों और सैनिकों के शवों से पट गई। खून की नदियां बहने लगीं।

5. नकली वासुदेव का अंत और सत्य की विजय

अंत में, भगवान श्रीकृष्ण ने उस ढोंगी पौण्ड्रक से कहा— "अरे मूर्ख पौण्ड्रक! तू जिन चिह्नों की बात कर रहा था, ले अब मैं उन्हें तुझ पर छोड़ता हूँ। मेरे नाम को धारण करने का ढोंग अब बंद कर।"

ऐसा कहकर भगवान ने पहले अपने तीखे बाणों से उसके रथ, घोड़ों और सारथि को नष्ट कर दिया। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। सूर्य के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र ने पलक झपकते ही उस नकली वासुदेव पौण्ड्रक का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे इंद्र वज्र से पर्वत की चोटी को काट देते हैं।

पौण्ड्रक का मित्र काशीराज अपनी सेना का विनाश देखकर घबरा गया। भगवान श्रीकृष्ण ने एक विशेष प्रकार का बाण चलाकर उसका भी सिर काट दिया और वह सिर हवा में उड़ता हुआ सीधे काशी नगर के राजद्वार पर जाकर गिरा। अपने राजाओं का अंत देखकर बची-खुची सेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई। इस प्रकार, भगवान ने अहंकार के उस पुतले का अंत किया।

कथा का आध्यात्मिक रहस्य

श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव जी महाराज इस कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गहरा पक्ष बताते हैं। यद्यपि पौण्ड्रक भगवान का शत्रु था और उसने उनका अपमान करने के लिए उनका वेश धारण किया था, लेकिन उसने जीवन भर निरंतर भगवान के उसी 'वासुदेव' स्वरूप का ध्यान किया। वह सोते-जागते, उठते-बैठते, ईर्ष्यावश ही सही, लेकिन हर पल केवल श्रीकृष्ण का ही चिंतन करता रहा।

॥ श्लोक ॥
सततं चिन्तयन् कृष्णं मायया धारिताकृतिम् ।
तन्मयत्वमवापान्ते कीटपेशस्कारी यथा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.66.24)
अर्थ: जिस प्रकार भृंगी कीड़े द्वारा पकड़ा गया कोई अन्य कीड़ा, भय के कारण निरंतर उसी का चिंतन करते-करते अंत में भृंगी का ही रूप प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार पौण्ड्रक भी वैरभाव से ही सही, लेकिन निरंतर भगवान के उस चतुर्भुज रूप का चिंतन करता रहा, इसलिए मृत्यु के समय उसे भगवान का सारूप्य मोक्ष (भगवान जैसा रूप) प्राप्त हो गया।

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान का नाम और चिंतन इतना प्रभावशाली है कि यदि कोई शत्रुभाव से भी उनका स्मरण करता है, तो उसका भी कल्याण हो जाता है। तो फिर जो प्रेम और भक्ति से उनका भजन करते हैं, उनकी सद्गति का तो कहना ही क्या! साथ ही, यह कथा मिथ्या अहंकार और पाखंड के विनाश का भी संदेश देती है। सत्य सूर्य के समान है, जिसे ढोंग के बादलों से अधिक देर तक नहीं छिपाया जा सकता।

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