संसार में अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं है। जब मनुष्य शक्ति, पद और चाटुकारिता के मद में अंधा हो जाता है, तो वह स्वयं को ईश्वर मानने की भूल कर बैठता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित 'पौण्ड्रक वध' की कथा इसी मिथ्या अभिमान के विनाश का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह कथा हमें बताती है कि बाहरी वेशभूषा और नकल करने से कोई भगवान नहीं बन सकता; ईश्वरत्व तो केवल सत्य, धर्म और अनंत शक्ति में निहित है।
जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे और उनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल चुकी थी, उसी समय करूष देश में पौण्ड्रक नाम का एक राजा राज करता था। वह अत्यंत मूर्ख और घमंडी था। उसके आसपास रहने वाले मूर्ख और चापलूस मित्रों ने उसकी झूठी प्रशंसा कर-करके उसे यह विश्वास दिला दिया था कि "हे राजन! आप ही साक्षात वासुदेव हैं, इस पृथ्वी पर अवतरित हुए भगवान हैं।"
चाटुकारों की बातों में आकर पौण्ड्रक का विवेक पूरी तरह नष्ट हो गया। वह स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण मानने लगा। उसने अपनी इस मूर्खता को सिद्ध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की तरह ही वेशभूषा धारण कर ली।
उसकी मूर्खता की पराकाष्ठा तब हुई जब उसने यह मान लिया कि द्वारका में रहने वाले श्रीकृष्ण असली नहीं हैं। उसने सोचा कि अब समय आ गया है कि असली वासुदेव (स्वयं) के सामने नकली वासुदेव (श्रीकृष्ण) को झुक जाना चाहिए।
अपने मिथ्या अभिमान में चूर होकर, पौण्ड्रक ने एक दूत को द्वारका भेजा और भगवान श्रीकृष्ण के पास एक अत्यंत उद्दंडतापूर्ण संदेश भिजवाया। दूत ने द्वारका की सुधर्मा सभा में पहुँचकर, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण सिंहासन पर विराजमान थे, पौण्ड्रक का संदेश सुनाया:
भूतानामनुकम्पार्थं त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज ॥
यानि त्वमस्मच्चिह्नानि मौढ्याद् बिभर्षि सात्वत ।
त्यक्त्वैहि मां शरणं नो चेद् देहि ममाहवम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.66.5-6)
पौण्ड्रक का यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण और अहंकारी संदेश सुनकर राजसभा में बैठे हुए उग्रसेन, बलराम जी और अन्य यदुवंशी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। वे सभी जोर-जोर से हँसने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने भी मुस्कुराते हुए दूत से कहा—
"हे दूत! तू अपने उस मूर्ख स्वामी से कहना कि जिन चिह्नों पर वह अपना अधिकार जता रहा है, मैं उन्हें अवश्य उस पर छोडूंगा, लेकिन तब, जब वह युद्धभूमि में मेरे सामने आएगा। उसकी मृत्यु अब निकट आ चुकी है। वह अपनी इस मूर्खता का फल शीघ्र ही पाएगा।"
दूत ने जाकर पौण्ड्रक को यह संदेश सुनाया। पौण्ड्रक आगबबूला हो गया। इधर, भगवान श्रीकृष्ण अपनी सेना लेकर काशी (वाराणसी) की ओर चल पड़े, क्योंकि पौण्ड्रक उस समय अपने मित्र काशीराज के यहाँ ठहरा हुआ था।
भगवान श्रीकृष्ण के आने का समाचार सुनकर पौण्ड्रक अपनी दो अक्षौहिणी सेना लेकर नगर से बाहर निकला। उसका मित्र काशीराज भी तीन अक्षौहिणी सेना के साथ उसकी सहायता के लिए आ गया। दोनों ओर की सेनाएं आमने-सामने डट गईं।
शत्रु सेना ने यदुवंशियों पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गदा, खड्ग, बाणों और चक्र से शत्रु सेना का संहार करना आरंभ किया। युद्धभूमि हाथियों, घोड़ों और सैनिकों के शवों से पट गई। खून की नदियां बहने लगीं।
अंत में, भगवान श्रीकृष्ण ने उस ढोंगी पौण्ड्रक से कहा— "अरे मूर्ख पौण्ड्रक! तू जिन चिह्नों की बात कर रहा था, ले अब मैं उन्हें तुझ पर छोड़ता हूँ। मेरे नाम को धारण करने का ढोंग अब बंद कर।"
ऐसा कहकर भगवान ने पहले अपने तीखे बाणों से उसके रथ, घोड़ों और सारथि को नष्ट कर दिया। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। सूर्य के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र ने पलक झपकते ही उस नकली वासुदेव पौण्ड्रक का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे इंद्र वज्र से पर्वत की चोटी को काट देते हैं।
पौण्ड्रक का मित्र काशीराज अपनी सेना का विनाश देखकर घबरा गया। भगवान श्रीकृष्ण ने एक विशेष प्रकार का बाण चलाकर उसका भी सिर काट दिया और वह सिर हवा में उड़ता हुआ सीधे काशी नगर के राजद्वार पर जाकर गिरा। अपने राजाओं का अंत देखकर बची-खुची सेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई। इस प्रकार, भगवान ने अहंकार के उस पुतले का अंत किया।
श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव जी महाराज इस कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गहरा पक्ष बताते हैं। यद्यपि पौण्ड्रक भगवान का शत्रु था और उसने उनका अपमान करने के लिए उनका वेश धारण किया था, लेकिन उसने जीवन भर निरंतर भगवान के उसी 'वासुदेव' स्वरूप का ध्यान किया। वह सोते-जागते, उठते-बैठते, ईर्ष्यावश ही सही, लेकिन हर पल केवल श्रीकृष्ण का ही चिंतन करता रहा।
तन्मयत्वमवापान्ते कीटपेशस्कारी यथा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.66.24)
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान का नाम और चिंतन इतना प्रभावशाली है कि यदि कोई शत्रुभाव से भी उनका स्मरण करता है, तो उसका भी कल्याण हो जाता है। तो फिर जो प्रेम और भक्ति से उनका भजन करते हैं, उनकी सद्गति का तो कहना ही क्या! साथ ही, यह कथा मिथ्या अहंकार और पाखंड के विनाश का भी संदेश देती है। सत्य सूर्य के समान है, जिसे ढोंग के बादलों से अधिक देर तक नहीं छिपाया जा सकता।

