मनुष्य का जीवन कर्मों के जटिल जाल से बुना हुआ है। कभी-कभी हमारे द्वारा किए गए पहाड़ जितने पुण्य भी राई भर पाप के सामने छोटे पड़ जाते हैं, विशेषकर तब, जब वह भूल किसी ब्राह्मण, संत या धर्म के धन से जुड़ी हो। द्वारका लीला के अंतर्गत श्रीमद्भागवत का यह अत्यंत रहस्यमयी प्रसंग हमें बताता है कि इक्ष्वाकु वंश के परम प्रतापी और महादानवीर 'राजा नृग' को अनजाने में हुई एक छोटी सी भूल के कारण 'गिरगिट' (Chameleon) की योनि क्यों प्राप्त हुई और साक्षात परब्रह्म श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार कैसे किया।
एक दिन द्वारका में साम्ब, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और भानु आदि यदुवंशी राजकुमार वन में खेलने गए। वे सब भगवान श्रीकृष्ण के ही पुत्र और पौत्र थे। खेलते-खेलते जब वे बहुत थक गए और उन्हें प्यास लगी, तो जल की तलाश में वे एक सूखे कुएं के पास पहुँचे। उन्होंने कुएं के भीतर झांककर देखा, तो जल तो नहीं था, लेकिन भीतर का दृश्य देखकर वे सभी बालक आश्चर्यचकित रह गए।
उस सूखे कुएं के भीतर एक अत्यंत विशाल और भयंकर 'गिरगिट' (Chameleon) फंसा हुआ था। वह इतना बड़ा था कि पर्वत के एक टुकड़े के समान प्रतीत हो रहा था। यदुवंशी बालकों को उस पर दया आ गई। उन्होंने चमड़े की रस्सियों और लताओं का फंदा बनाकर उसे बाहर निकालने का प्रयास किया, लेकिन वह गिरगिट इतना भारी था कि वे राजकुमार अपनी पूरी शक्ति लगाने के बाद भी उसे रत्ती भर भी हिला नहीं सके।
हताश होकर बालक दौड़ते हुए द्वारका लौटे और उन्होंने यह अद्भुत घटना भगवान श्रीकृष्ण को बताई। विश्व के रक्षक, करुणासागर श्रीकृष्ण तुरंत उस वन में सूखे कुएं के पास आ पहुँचे।
कुएं के पास पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कारते हुए उस विशाल गिरगिट को देखा। जो परमात्मा अपनी एक उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा सकते हैं, उनके लिए यह क्या बड़ी बात थी? भगवान ने अत्यंत सहजता से अपना बायां हाथ कुएं में डाला और उस भारी-भरकम गिरगिट को एक ही झटके में बाहर निकाल लिया।
तद्युक्त्वा कृकलासत्वं सद्यो रूपं विधारयन् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.64.10)
उस दिव्य पुरुष ने साष्टांग दंडवत होकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम किया। भगवान सब कुछ जानते हुए भी, यदुवंशी बालकों और संसार को शिक्षा देने के उद्देश्य से उस पुरुष से पूछने लगे— "हे महाभाग! आप दिखने में तो किसी देवलोक के वासी प्रतीत होते हैं। परंतु आप इस भयंकर गिरगिट की योनि में कैसे आ गए? कृपया अपना परिचय दें और अपने इस पतन का कारण बताएं।"
उस पुरुष ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनयपूर्वक कहा— "हे कमलनयन! हे द्वारकाधीश! मैं इक्ष्वाकु (राम जी के वंश) का पुत्र 'नृग' हूँ। दानवीरों की गिनती में शायद आपने मेरा नाम सुना होगा। मैं वही राजा नृग हूँ।"
राजा नृग ने अपने दान की महिमा बताते हुए कहा, "हे प्रभु! मैंने अपने जीवन में कितनी गायों का दान किया है, उसकी गिनती कोई नहीं कर सकता। पृथ्वी पर जितने धूल के कण हैं, आकाश में जितने तारे हैं, या वर्षा की जितनी बूंदें हैं, मैंने उतनी ही गायों का दान ब्राह्मणों को किया था। मेरी गाएं साधारण नहीं थीं; वे सभी दूध देने वाली, सुंदर सींगों पर सोना मढ़ी हुई, खुरों में चांदी जड़ी हुई और दिव्य वस्त्रों से ढकी हुई थीं। मैं केवल सुपात्र, वेदों के ज्ञाता, तपस्वी और गरीब ब्राह्मणों को ही दान देता था।"
राजा नृग ने अपनी भूल का वर्णन करते हुए कहा— "हे प्रभु! एक दिन मैंने एक तपस्वी ब्राह्मण को बहुत सी गायें दान में दीं। उनमें से एक गाय, जो मैंने उस ब्राह्मण को दान कर दी थी, वह भटक कर वापस मेरी गौशाला में आ गई और मेरी गायों के झुंड में मिल गई। मुझे इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं चला।"
"अगले दिन, मैंने उसी गौशाला से कुछ गायें दूसरे ब्राह्मण को दान कर दीं। दुर्भाग्यवश, पहले ब्राह्मण की वह भटकी हुई गाय भी उस दूसरे ब्राह्मण के पास चली गई। जब दूसरा ब्राह्मण उस गाय को ले जा रहा था, तब रास्ते में पहले ब्राह्मण ने उसे देख लिया और कहा— 'यह गाय तो मेरी है, राजा नृग ने कल मुझे दान में दी थी!'"
दूसरे ब्राह्मण ने क्रोधित होकर कहा— 'नहीं! यह गाय आज राजा ने मुझे दी है, अतः यह मेरी है।'
दोनों ब्राह्मण विवाद करते हुए मेरे दरबार में पहुँचे। एक ने मुझ पर 'चोरी' का आरोप लगाया कि मैंने उसका दान किया हुआ धन वापस ले लिया, और दूसरे ने मुझ पर 'झूठ' का आरोप लगाया। मैं यह स्थिति देखकर कांप उठा। मैंने दोनों ब्राह्मणों के हाथ जोड़कर कहा— "हे भगवन! मुझसे अनजाने में यह भूल हुई है। मैं इस एक गाय के बदले आप दोनों को एक-एक लाख सोने से मढ़ी हुई गायें देने को तैयार हूँ। कृपया मुझे इस पाप से मुक्त कर दें।"
परंतु वे दोनों ब्राह्मण अत्यंत निष्ठावान और संतोषी थे। पहले ब्राह्मण ने कहा, "राजा! जो धन मुझे मिल गया, वह मेरा है। मैं उसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ूंगा।" और दूसरे ने कहा, "मैं भी दी हुई वस्तु को वापस नहीं करता।" ऐसा कहकर दोनों ब्राह्मण बिना कोई गाय लिए क्रोध में भरकर वहाँ से चले गए। इस प्रकार अनजाने में ही मुझ पर 'ब्राह्मण के धन के अपहरण' का महापाप लग गया।
राजा नृग ने आगे बताया— "जब मेरी मृत्यु हुई और मुझे यमराज के दरबार में ले जाया गया, तो यमराज ने मुझसे पूछा: 'हे राजन्! तुमने अपने जीवन में अत्यंत महान पुण्य किए हैं और एक छोटा सा पाप किया है। पहले तुम अपने पुण्यों का अपार फल (स्वर्ग का सुख) भोगना चाहोगे, या अपने पाप का दंड भुगतना चाहोगे?'"
"मैंने सोचा कि स्वर्ग के सुख भोगने के बाद जब पतन होगा तो कष्ट अधिक होगा, इसलिए मैंने यमराज से कहा कि मैं पहले अपने पाप का दंड भुगतना चाहता हूँ। ऐसा कहते ही मैं नीचे गिर पड़ा और मैंने स्वयं को एक सूखे कुएं में गिरगिट की योनि में पाया। मैंने अनजाने में ब्राह्मण का धन हड़पा था, इसलिए मुझे यह अधम योनि मिली।"
"परंतु हे प्रभु! मैंने जीवन भर ब्राह्मणों की सेवा की थी और आपमें मेरी अटूट श्रद्धा थी। उसी भक्ति के प्रभाव से, गिरगिट योनि में भी मुझे मेरे पूर्व जन्म की स्मृति (याद) बनी रही और आज आपके परम पवित्र करकमलों के स्पर्श से मेरे पापों का पूर्णतः नाश हो गया।" ऐसा कहकर राजा नृग ने भगवान की परिक्रमा की और देव-विमान में बैठकर देवलोक को प्रस्थान किया।
राजा नृग के स्वर्ग जाने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुत्रों और यदुवंशी राजकुमारों को पास बुलाया। यह घटना भगवान ने केवल राजा नृग के उद्धार के लिए नहीं रची थी, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों (यदुवंशियों) को अहंकार और सत्ता के मद से बचाने के लिए रची थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत कठोर शब्दों में धर्म का उपदेश दिया:
ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि ॥
(श्रीमद्भागवत 10.64.32)
भगवान ने स्पष्ट कहा— "हे यदुवंशियों! सत्ता के नशे में कभी भी किसी ब्राह्मण, संत, असहाय या मंदिर की संपत्ति पर बुरी नज़र मत डालना। आग तो केवल छूने वाले को जलाती है, लेकिन ब्राह्मण का धन यदि कपट से छीन लिया जाए, तो वह व्यक्ति की आने वाली कई पीढ़ियों को भस्म कर देता है। जो व्यक्ति दान देकर उसे वापस ले लेता है, उसे हजारों वर्षों तक नर्क की यातनाएं सहनी पड़ती हैं।"
राजा नृग की यह अद्भुत कथा हमें दो अत्यंत महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:
- दान की शुद्धता: दान देना बहुत अच्छी बात है, परंतु दिया हुआ दान भूलकर भी वापस नहीं लेना चाहिए। धर्म के नाम पर दिया गया धन यदि कोई राजनीति या बाहुबल से हड़पता है, तो उसका पतन निश्चित है, चाहे वह कितना भी बड़ा राजा क्यों न हो।
- ईश्वर की करुणा: यदि मनुष्य से अनजाने में कोई भूल हो जाए, परंतु उसके हृदय में ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और समाज (ब्राह्मण/संत) के प्रति आदर हो, तो एक न एक दिन भगवान स्वयं आकर उसे उस अंधकूप (भवसागर) से निकाल लेते हैं, जैसे भगवान ने अपने हाथों से राजा नृग को निकाला।

