संसार में मित्रता प्रायः समान स्तर के लोगों में होती है— एक राजा की मित्रता दूसरे राजा से, और एक निर्धन की मित्रता दूसरे निर्धन से। परंतु श्रीमद्भागवत महापुराण का 'सुदामा चरित्र' इस भौतिक नियम को पूरी तरह से तोड़ देता है। यह कथा दर्शाती है कि त्रिभुवन के स्वामी, अनंत ब्रह्मांडों के अधिपति द्वारकाधीश श्रीकृष्ण, अपने गुरुकुल के उस परम दरिद्र और दीन मित्र को किस प्रकार अपने हृदय से लगाते हैं, जिसके पास पहनने के लिए पूरे वस्त्र तक नहीं थे। इसी के साथ 'पारिजात हरण' की कथा यह सिद्ध करती है कि वही परमात्मा अपनी भक्त पत्नी के प्रेम के वशीभूत होकर स्वर्ग के राजा से भी युद्ध करने को तत्पर हो जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के उज्जैन (अवंतिका) स्थित सांदीपनि मुनि के गुरुकुल में एक ब्राह्मण सहपाठी थे, जिनका नाम था— सुदामा। सुदामा जी ब्रह्म-ज्ञानी, अत्यंत शांत, इंद्रियों को वश में रखने वाले और संसार की भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह विरक्त थे। उनका विवाह 'सुशीला' नामक एक अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री से हुआ था।
सुदामा जी के भाग्य में अपार दरिद्रता थी। उनके पास न तो रहने के लिए कोई पक्की कुटिया थी, न ही पहनने के लिए वस्त्र। वे भिक्षा मांगकर जो कुछ लाते, उसी से परिवार का पेट भरते थे। कई बार तो भिक्षा भी नहीं मिलती थी और पूरे परिवार को जल पीकर ही सोना पड़ता था। सुदामा जी की पत्नी भूख से अत्यंत दुर्बल हो गई थीं, उनके शरीर की हड्डियां दिखाई देने लगी थीं।
सुदामा जी ने विचार किया, "मुझे धन की कोई कामना नहीं है, परंतु इसी बहाने मुझे मेरे परम सखा, मेरे आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन हो जाएंगे।" उन्होंने पत्नी से कहा, "देवि! मैं जाऊँगा, परंतु मित्र के घर खाली हाथ कैसे जाऊँ? घर में कुछ भेंट देने के लिए है क्या?"
घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं था। सुशीला जी तुरंत पड़ोस के चार घरों में गईं और भिक्षा में माँगकर चार मुट्ठी चिवड़ा (पोहा/Flattened Rice) ले आईं। उसे बाँधने के लिए घर में कोई स्वच्छ कपड़ा भी नहीं था, तो उन्होंने सुदामा जी के एक पुराने, फटे हुए चीथड़े (अंगोछे) में वह चिवड़ा बाँधकर उन्हें दे दिया।
हाथ में एक सूखी लकड़ी (लाठी) और कांख में वह फटी हुई पोटली दबाए, फटे हुए वस्त्रों में सुदामा जी द्वारका की ओर चल पड़े। मार्ग में उनके मन में अनेक विचार आ रहे थे— "कहाँ वे द्वारकाधीश और कहाँ मैं दरिद्र ब्राह्मण! क्या वे मुझे पहचानेंगे? क्या द्वारपाल मुझे महलों में जाने देंगे?"
सुदामा जी द्वारका पहुँचे। द्वारका के स्वर्ण महल और अप्सराओं जैसी स्त्रियों को देखकर वे विस्मित रह गए। वे संकोच करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के महल के द्वार पर गए। द्वारपालों ने एक अत्यंत दुर्बल, मैले और फटे वस्त्रों वाले ब्राह्मण को देखा। सुदामा जी ने कहा— "भैया, भीतर जाकर कह दो कि तुम्हारे बचपन का मित्र सुदामा आया है।"
द्वारपाल ने भीतर जाकर श्रीकृष्ण को सूचना दी। 'सुदामा' नाम सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण अपने सिंहासन से ऐसे उछल पड़े मानो उन्हें कोई अमूल्य निधि मिल गई हो। उन्होंने न अपने पैरों में खड़ाऊं पहने, न अपना मुकुट सँभाला, वे नंगे पैर ही राजद्वार की ओर दौड़ पड़े। साक्षात रुक्मिणी जी और अन्य रानियां आश्चर्य से देखने लगीं कि त्रिभुवनपति किसके लिए इस प्रकार दौड़ रहे हैं!
द्वार पर पहुँचकर भगवान ने सुदामा को कसकर अपने हृदय से लगा लिया। दोनों मित्रों के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी। भगवान सुदामा का हाथ पकड़कर उन्हें अपने महल के भीतर ले आए। उन्होंने सुदामा को अपनी अर्धांगिनी महारानी रुक्मिणी जी के पलंग पर बिठाया। रुक्मिणी जी स्वयं चंवर डुलाने लगीं।
भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा जी के चरण धोने के लिए परात में जल मंगाया। परंतु सुदामा जी के पैरों की दशा देखकर, जिनमें अनगिनत कांटे चुभे हुए थे और बिवाइयां फटी हुई थीं, भगवान का हृदय इतना द्रवित हो गया कि परात के जल की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। भगवान ने अपने आंसुओं से ही मित्र के चरण धो दिए।
स्नान और भोजन के पश्चात दोनों मित्र पुराने दिनों की यादें ताज़ा करने लगे। गुरु सांदीपनि के आश्रम में लकड़ियां काटने और वर्षा में भीगने की बातें करते-करते भगवान ने अचानक पूछा— "सखा! भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है? मुझे जो भी प्रेम से एक पत्ता, एक फूल या जल भी अर्पित करता है, मैं उसे अत्यंत प्रेम से ग्रहण करता हूँ।"
सुदामा जी अत्यंत लज्जित हो गए। इतने विशाल सोने के महल में, जहाँ छप्पन भोग लगे हों, वहाँ वह फटे चीथड़े में बंधा हुआ सूखा चिवड़ा भगवान को कैसे दें? वे अपनी पोटली को कांख में और छिपाने लगे।
भगवान तो 'अंतर्यामी' हैं। उन्होंने जबरदस्ती सुदामा जी की कांख से वह पोटली छीन ली। भगवान ने प्रसन्नता से उसे खोला और कहा— "अरे वाह! यह चिवड़ा तो मुझे अत्यंत प्रिय है। इससे तो मैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड तृप्त हो जाएगा।"
भगवान ने जैसे ही पहली मुट्ठी चिवड़ा खाया, उन्होंने सुदामा जी को एक लोक की संपत्ति दे दी। जैसे ही दूसरी मुट्ठी चिवड़ा खाया, दूसरे लोक की संपत्ति दे दी। जब भगवान तीसरी मुट्ठी खाने लगे, तो साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा रुक्मिणी जी ने भगवान का हाथ पकड़ लिया।
रात भर सुदामा जी उसी दिव्य पलंग पर सोए। प्रातः काल जब वे विदा होने लगे, तो भगवान उनके साथ बहुत दूर तक उन्हें छोड़ने गए। परंतु भगवान ने सुदामा जी के हाथ में एक भी सिक्का (धन) नहीं दिया।
रास्ते में सुदामा जी विचार करते हुए जा रहे थे:
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.81.16)
सुदामा जी जब अपने नगर पहुँचे, तो वे अपनी टूटी झोपड़ी ढूँढने लगे। परंतु वहाँ झोपड़ी के स्थान पर सूर्य के समान चमकता हुआ सोने और रत्नों का एक विशाल महल खड़ा था। वहाँ अनेक दास-दासियां थीं। तभी उनकी पत्नी सुशीला, जो अब अप्सराओं के समान दिव्य आभूषण और वस्त्र धारण किए हुए थीं, आरती की थाली लेकर सुदामा जी के स्वागत के लिए आईं।
सुदामा जी समझ गए कि यह सब उनके सखा द्वारकाधीश की बिना मांगे ही दी गई कृपा है। इतनी संपत्ति पाकर भी सुदामा जी के मन में रत्ती भर भी अभिमान नहीं आया और वे उसी निर्लिप्त भाव से भगवान का भजन करते हुए जीवन व्यतीत करने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण की एक अन्य अद्भुत लीला 'पारिजात हरण' की है, जो देवर्षि नारद के एक कृत्य से आरंभ हुई। एक बार नारद जी स्वर्ग से देवराज इंद्र के नंदनकानन (बगीचे) से 'पारिजात' का एक अत्यंत दिव्य और सुगंधित फूल लेकर द्वारका आए। उन्होंने वह फूल भगवान श्रीकृष्ण को दिया।
भगवान उस समय अपनी प्रधान पटरानी रुक्मिणी जी के महल में थे। उन्होंने वह दिव्य पुष्प रुक्मिणी जी के बालों में लगा दिया। जब यह बात सत्यभामा जी (जो अत्यंत मानिनी और भगवान की अत्यंत लाडली पटरानी थीं) को पता चली, तो उन्हें बहुत क्रोध आया। इसे 'प्रणय-कलह' (प्रेम का झगड़ा) कहा जाता है। उन्होंने कोपभवन में जाकर रूठने का नाटक किया।
भगवान सत्यभामा जी को मनाने उनके महल में गए। सत्यभामा जी ने हठ पकड़ लिया कि "मुझे वह एक फूल नहीं चाहिए, मुझे तो वह पूरा पारिजात का वृक्ष ही अपने आंगन में चाहिए!"
इंद्र ने अपने ऐरावत हाथी पर बैठकर वज्र उठाया, परंतु भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के सामने देवताओं की एक न चली। भगवान ने उस पूरे कल्पवृक्ष (पारिजात) को उखाड़ लिया और गरुड़ पर रखकर द्वारका ले आए। उन्होंने वह वृक्ष सत्यभामा जी के महल के आंगन में लगा दिया। पारिजात के फूल सत्यभामा जी के आंगन में खिलते थे, लेकिन उनकी सुगंध पूरे द्वारका नगर को सुवासित करती थी।
सुदामा चरित्र और पारिजात हरण, दोनों ही लीलाएं हमें सिखाती हैं कि ईश्वर केवल 'भाव' और 'प्रेम' के भूखे हैं। सुदामा जी ने निःस्वार्थ भाव से अपनी दरिद्रता में भी भगवान को याद किया, तो भगवान ने उन्हें त्रिलोकी की संपत्ति दे दी। और सत्यभामा जी ने पूर्ण अधिकार से प्रभु से हठ किया, तो प्रभु ने उनके लिए देवताओं से भी युद्ध कर लिया। जो भगवान की पूर्ण रूप से शरण में चला जाता है, भगवान उसके सभी योगक्षेम (आवश्यकताओं) का स्वयं वहन करते हैं।

