संसार में एक गृहस्थ के लिए एक पत्नी और कुछ संतानों का भरण-पोषण करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। एक सामान्य मनुष्य अपने सीमित परिवार में ही उलझा रहता है। ऐसे में, जब हम सुनते हैं कि द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की आठ पटरानियां (रुक्मिणी, सत्यभामा आदि) और भौमासुर के बंदीगृह से मुक्त कराई गई 16,100 रानियां थीं, तो मन में एक सहज कौतूहल उत्पन्न होता है। कुल मिलाकर 16,108 रानियां! यह कोई साधारण बात नहीं थी। यह प्रश्न देवताओं और ऋषियों के मन में भी उठता था कि आखिर भगवान इतनी विशाल गृहस्थी को कैसे संभालते होंगे? क्या वे बारी-बारी से सबके महल में जाते होंगे? क्या वे सबके साथ न्याय कर पाते होंगे?
इसी परम कौतूहल को शांत करने और भगवान की गृहस्थ लीला का सत्य जानने के लिए, त्रिलोक संचारी देवर्षि नारद जी ने एक दिन द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान किया। वे यह देखने के लिए उत्सुक थे कि योगेश्वर श्रीकृष्ण इस असंभव से दिखने वाले कार्य को कैसे संभव बनाते हैं।
देवर्षि नारद अपनी वीणा पर 'नारायण-नारायण' का मधुर गान करते हुए आकाशमार्ग से द्वारकापुरी पहुँचे। द्वारका का सौंदर्य देखकर नारद जी जैसा विरक्त संत भी ठिठक गया। वह नगरी विश्वकर्मा के शिल्प-कौशल का सर्वोत्कृष्ट नमूना थी।
वहाँ 16,000 से अधिक भव्य महल थे, जो सूर्य के समान चमकते थे। महलों की दीवारें स्फटिक मणियों और सोने की बनी थीं। उद्यानों में कल्पवृक्ष और पारिजात के फूल अपनी दिव्य सुगंध बिखेर रहे थे। सरोवरों में खिले हुए कमलों पर भौंरे गुंजार कर रहे थे। नगर के चौराहों, गलियों और बाजारों की शोभा अवर्णनीय थी। नारद जी ने देखा कि यह नगरी साक्षात स्वर्ग से भी अधिक सुंदर और वैभवशाली है।
नगर के मध्य में भगवान श्रीकृष्ण का अंतःपुर (राजमहल परिसर) था, जहाँ उनकी 16,108 रानियों के अलग-अलग विशाल महल थे। नारद जी के मन में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा था:
गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.69.2)
इस रहस्य को जानने के लिए नारद जी सबसे पहले भगवान की प्रधान पटरानी, विदर्भनंदिनी महारानी रुक्मिणी जी के महल में प्रविष्ट हुए। महल के भीतर का दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि त्रिभुवन के स्वामी, साक्षात परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण, महारानी रुक्मिणी के साथ एक सोने के पलंग पर बैठे हैं और रुक्मिणी जी उन्हें पंखा झल रही हैं।
जैसे ही भगवान की दृष्टि देवर्षि नारद पर पड़ी, वे तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए। उन्होंने दौड़कर नारद जी के चरण स्पर्श किए और उन्हें अपने आसन पर बिठाया। इतना ही नहीं, जो स्वयं लक्ष्मीपति हैं, जिनके चरणों की धूल पाने के लिए ब्रह्मा और शिव भी तरसते हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने हाथों से नारद जी के चरण धोए और उस चरणोदक (चरणों के जल) को अपने सिर पर धारण किया।
स्वहस्तेनावनिज्याङ्घ्रीन् तदम्भः शिरसाधत्त ॥
(श्रीमद्भागवत 10.69.15)
भगवान ने हाथ जोड़कर नारद जी से कहा— "हे देवर्षि! आपके आगमन से आज हमारे महल पवित्र हो गए। आज्ञा दीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?" नारद जी भगवान की इस विनम्रता को देखकर भाव-विभोर हो गए। वे सोचने लगे कि जो अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी हैं, वे एक साधारण गृहस्थ की भांति एक अतिथि का इतना सत्कार कर रहे हैं। नारद जी ने भगवान की स्तुति की और मन ही मन सोचा कि "कृष्ण तो यहाँ रुक्मिणी जी के पास हैं, तो बाकी 16,000 रानियां क्या कर रही होंगी? मुझे चलकर देखना चाहिए।"
यहीं से भगवान की 'योगमाया' का अद्भुत खेल शुरू हुआ, जिसने ज्ञानी नारद को भी मोह (भ्रम) में डाल दिया। नारद जी रुक्मिणी जी के महल से निकलकर चुपचाप दूसरे महल की ओर बढ़े। यह महल महारानी सत्यभामा का था।
नारद जी ने सोचा कि वे चुपके से जाकर देखेंगे कि वहाँ क्या हो रहा है। जैसे ही उन्होंने सत्यभामा जी के महल में प्रवेश किया, वे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाए। उन्होंने देखा कि वही भगवान श्रीकृष्ण, उसी रूप में, महारानी सत्यभामा के साथ चौपड़ (पांसे) का खेल खेल रहे हैं।
भगवान ने नारद जी को देखते ही खेल रोक दिया और आश्चर्यचकित होकर बोले— "अरे! देवर्षि नारद! आप कब पधारे? आज बहुत दिनों बाद आपने हमें दर्शन दिए। आइये, आसन ग्रहण कीजिये।"
नारद जी का सिर चकरा गया। वे सोचने लगे— "अभी तो प्रभु रुक्मिणी जी के महल में थे और मेरे चरण धो रहे थे। वे इतनी जल्दी यहाँ कैसे आ गए? और वे ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं जैसे आज पहली बार मिल रहे हों?" नारद जी कुछ समझ नहीं पाए और हड़बड़ाकर वहाँ से भी निकल गए।
नारद जी ने जो दृश्य देखे, वे अत्यंत विस्मयकारी थे। उन्होंने देखा कि एक महल में भगवान अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर खिला रहे हैं, उनका लाड़-प्यार कर रहे हैं। दूसरे महल में वे अपनी किसी रानी के साथ उद्यान में जल-क्रीड़ा कर रहे हैं। किसी महल में वे ब्राह्मणों को बुलाकर बड़े विधि-विधान से यज्ञ और अग्निहोत्र कर रहे हैं।
आगे के महलों में दृश्य और भी बदल गए। कहीं भगवान अपने मंत्रियों (उद्धव आदि) के साथ राज्य की गंभीर समस्याओं पर विचार-विमर्श कर रहे थे। कहीं वे अपनी पुत्री के विवाह के लिए वर चुनने की चर्चा कर रहे थे, तो कहीं अपने पुत्र का विवाह समारोह धूमधाम से मना रहे थे। किसी महल में वे तलवार बाजी का अभ्यास कर रहे थे, तो कहीं शांति से बैठकर संध्या-वंदन और गायत्री जप कर रहे थे।
श्रीमद्भागवत में वर्णन आता है कि नारद जी ने भगवान को एक आदर्श गृहस्थ के सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए देखा— कहीं वे अतिथियों का सत्कार कर रहे थे, कहीं गुरुजनों की सेवा कर रहे थे, कहीं गायों का दान कर रहे थे, और कहीं धर्म, अर्थ और काम का सेवन कर रहे थे।
सोलह हजार महलों में सोलह हजार कृष्ण! और हर कृष्ण एक अलग कार्य में व्यस्त, मानो दूसरे कृष्ण से उनका कोई संबंध ही न हो। यह दृश्य देखकर देवर्षि नारद का सारा ज्ञान, सारा अहंकार तिरोहित हो गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण राजा नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं, जो अपनी 'योगमाया' से यह अद्भुत लीला कर रहे हैं।
उनका मोह भंग हो गया। वे समझ गए कि भगवान एक ही हैं, फिर भी अनेक हैं। वे सबके साथ हैं, फिर भी सबसे अलग (निर्लिप्त) हैं। नारद जी ने हाथ जोड़कर भगवान के उस विराट 'गृहस्थ-योग' स्वरूप की स्तुति की:
विदामाव न शक्तास्ते मायया मोहितं जगत् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.69.38)
भगवान श्रीकृष्ण ने नारद जी की स्तुति सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए कहा— "हे देवर्षि! मैं धर्म का उपदेशक हूँ, धर्म का पालन करने वाला हूँ और धर्म की स्थापना करने के लिए ही अवतरित हुआ हूँ। मैं यह सब आचरण इसलिए करता हूँ ताकि संसार के लोग मुझसे शिक्षा लें कि एक गृहस्थ को जीवन में किस प्रकार अनासक्त भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। आप मेरी इस माया को देखकर मोहित न हों।"
यह लीला हमें सिखाती है कि 'संन्यास' केवल जंगल में जाने का नाम नहीं है। असली संन्यास और असली योग यह है कि हम संसार में रहें, अपने परिवार और समाज के प्रति सभी कर्तव्यों का पालन करें (जैसे श्रीकृष्ण 16,108 परिवारों का पालन कर रहे थे), लेकिन कमल के पत्ते पर पानी की बूंद की तरह इन सबसे 'निर्लिप्त' रहें। हमारा मन सदैव ईश्वर में लगा रहे, यही 'गृहस्थ योग' है, जिसका साक्षात दर्शन भगवान ने नारद जी को कराया।

