Ramayana Untold Story: जब एक रामभक्त ने श्रीराम के दर्शन के लिए हनुमान जी और शत्रुघ्न को बना लिया बंदी!

Sooraj Krishna Shastri
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भक्तराज सुरथ की अनन्य रामभक्ति

"यमराज का वरदान, अश्वमेध का अश्व और कुंडलपुर में श्रीराम का साक्षात दर्शन"

त्रेतायुग का वह स्वर्णिम काल! कुंडलपुर के राजा सुरथ अत्यंत परोपकारी, न्यायप्रिय और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। कहावत है- 'यथा राजा तथा प्रजा'। उनके शासन में प्रजा भी पूर्णतः सत्कर्मी, भगवद्भक्त और परोपकारी थी। उनके राज्य में धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा था, जिसके परिणामस्वरूप कुंडलपुर का हर नागरिक देवतुल्य हो गया था।

🕉️ यमराज का आश्चर्य और महात्मा का वेश

जब यमराज ने भूलोक वासियों के पाप-पुण्य का हिसाब लगाया, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कुंडलपुर का एक भी निवासी नरकगामी नहीं था; सभी अपने सत्कर्मों से सीधे स्वर्ग के अधिकारी बन रहे थे।

धर्मराज की परीक्षा: इस अद्भुत सत्य का पता लगाने के लिए यमराज स्वयं एक तेजस्वी महात्मा का वेश धारण कर कुंडलपुर नरेश सुरथ के दरबार में पहुँचे। राजा सुरथ ने उनका भव्य स्वागत किया और उनसे हरिकथा सुनाने का विनम्र अनुरोध किया।
महात्मा (यमराज) का तर्क: महात्मा ने राजा की परीक्षा लेते हुए कहा, "राजन्! कथा सुनने से क्या होगा? सबको अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। हरिकथा के भ्रम में न पड़ें, केवल सत्कर्म करें, वही मृत्यु के बाद साथ जाएगा।"
भक्त सुरथ का अकाट्य उत्तर: राजा सुरथ ने दृढ़ता से कहा, "महात्मन्! प्रभु का नाम लेते रहने से सत्कर्म स्वतः होते रहते हैं। केवल कर्मफल पर आश्रित रहने से तो देवराज इंद्र का भी पुण्य क्षीण होने पर पतन हो जाता है, परंतु हरिभक्त ध्रुव अपने स्थान पर सदैव अटल रहते हैं।"

⚔️ अश्वमेध यज्ञ: प्रभु दर्शन की अद्भुत लीला

राजा की यह अनन्य और निष्काम भक्ति देखकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर राजा से वरदान माँगने को कहा। राजा ने माँगा: "जब तक मुझे साक्षात् श्रीहरि के दर्शन न हो जाएँ, तब तक मेरी मृत्यु न हो।" यमराज ने तथास्तु कहते हुए बताया कि शीघ्र ही पृथ्वी पर भगवान विष्णु का रामावतार होने वाला है।

१. प्रतीक्षा और मनोरथ राजा सुरथ को जब सूचना मिली कि अयोध्या में श्रीराम का अवतार हो गया है, तो वे उनके दर्शन की आस में दिन बिताने लगे। जब प्रभु श्रीराम ने राजसिंहासन सँभालने के पश्चात् अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा, तो सुरथ को अपना मनोरथ पूरा करने का मार्ग मिल गया।
२. अश्व को रोकना और युद्ध दर्शन की तीव्र लालसा में राजा ने यज्ञ के घोड़े को रोक लिया। अश्व के रक्षक शत्रुघ्न से सुरथ का घोर संग्राम हुआ, और सुरथ ने अपनी वीरता से शत्रुघ्न को सेना समेत बंदी बना लिया।
३. रामास्त्र का प्रयोग शत्रुघ्न को छुड़ाने के लिए वीर अंगद और स्वयं हनुमान जी भी आए। किंतु राजा सुरथ ने सभी को 'रामास्त्र' के बल पर बाँध लिया और कहा, "यदि आप मुक्ति चाहते हैं, तो अपने स्वामी को युद्ध के लिए यहाँ भेजें।"
४. भक्त के अधीन भगवान के सेवक हनुमान जी से राजा सुरथ का मर्म और उनकी रामभक्ति छिपी नहीं थी। यद्यपि हनुमान जी पर किसी अस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ सकता था, किंतु एक रामभक्त का मनोरथ पूरा करने हेतु वे स्वेच्छा से बँधे रहे।
५. प्रभु का कुंडलपुर आगमन यह समाचार सुनकर लक्ष्मण जी कुंडलपुर जाकर सुरथ को दंड देने के लिए तैयार हो गए। परंतु श्रीराम ने उन्हें रोकते हुए कहा— "बिना मेरे गए यह विघ्न नहीं टलने वाला।" प्रभु स्वयं अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर कुंडलपुर पहुँच गए।
६. शस्त्र त्याग और साक्षात् दर्शन रणभूमि में अपने आराध्य श्रीराम को देखते ही राजा सुरथ ने तत्काल अपने अस्त्र-शस्त्र फेंक दिए और प्रभु के चरणों में गिर पड़े। सुरथ ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा— "हे नाथ! केवल आपके साक्षात् दर्शन पाने के लिए ही मैंने काल को रोक रखा था।"

।। भक्त की विजय और सेवा का वरदान ।।

श्रीराम ने अपने भक्त को हृदय से लगा लिया और अपने दिव्य रूप के दर्शन कराए। प्रभु ने जब वर माँगने को कहा, तो सुरथ ने कहा— "प्रभु! आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया, अब कोई कामना शेष नहीं है। फिर भी यदि कुछ देना ही चाहते हैं, तो मुझे अपनी सेवा में ले लीजिए।"

श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा— "आपने मेरे अनुज और मित्रों को बाँध रखा है, मैं तो स्वयं ही आपके प्रेम पाश में बँध गया हूँ। आपकी इच्छा कैसे पूरी नहीं होगी!"

सुरथ प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने शत्रुघ्न, हनुमान और अंगद को ससम्मान मुक्त किया और अश्व के साथ रामसेना में सम्मिलित होकर प्रभु की सेवा में चल पड़े।

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