भक्तराज सुरथ की अनन्य रामभक्ति
"यमराज का वरदान, अश्वमेध का अश्व और कुंडलपुर में श्रीराम का साक्षात दर्शन"
🕉️ यमराज का आश्चर्य और महात्मा का वेश
जब यमराज ने भूलोक वासियों के पाप-पुण्य का हिसाब लगाया, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कुंडलपुर का एक भी निवासी नरकगामी नहीं था; सभी अपने सत्कर्मों से सीधे स्वर्ग के अधिकारी बन रहे थे।
⚔️ अश्वमेध यज्ञ: प्रभु दर्शन की अद्भुत लीला
राजा की यह अनन्य और निष्काम भक्ति देखकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर राजा से वरदान माँगने को कहा। राजा ने माँगा: "जब तक मुझे साक्षात् श्रीहरि के दर्शन न हो जाएँ, तब तक मेरी मृत्यु न हो।" यमराज ने तथास्तु कहते हुए बताया कि शीघ्र ही पृथ्वी पर भगवान विष्णु का रामावतार होने वाला है।
।। भक्त की विजय और सेवा का वरदान ।।
श्रीराम ने अपने भक्त को हृदय से लगा लिया और अपने दिव्य रूप के दर्शन कराए। प्रभु ने जब वर माँगने को कहा, तो सुरथ ने कहा— "प्रभु! आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया, अब कोई कामना शेष नहीं है। फिर भी यदि कुछ देना ही चाहते हैं, तो मुझे अपनी सेवा में ले लीजिए।"
श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा— "आपने मेरे अनुज और मित्रों को बाँध रखा है, मैं तो स्वयं ही आपके प्रेम पाश में बँध गया हूँ। आपकी इच्छा कैसे पूरी नहीं होगी!"
सुरथ प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने शत्रुघ्न, हनुमान और अंगद को ससम्मान मुक्त किया और अश्व के साथ रामसेना में सम्मिलित होकर प्रभु की सेवा में चल पड़े।

