ठाकुर जी का लाड़: जब भक्त बना कन्हैया का सहारा!
"श्री बांके बिहारी मंदिर में रोज़ मंगला आरती क्यों नहीं होती? जानिए एक वृद्ध भक्त के निश्चल प्रेम की अद्भुत कथा।"
🌙 निधिवन की रात और कन्हैया का बालहठ
बरसों बीत गए। एक रात, जब पूरी दुनिया सो रही थी और निधिवन की लताएँ झूम रही थीं, बाबा ने देखा कि गर्भगृह से एक दिव्य छवि चुपके से निकलकर सेवाकुंज की ओर बढ़ रही है। बाबा चौंक गए! उन्होंने सोचा— "मेरा लाड़ला इतनी रात को अकेले कहाँ जा रहा है?" वे भी पीछे-पीछे हो लिए।
✨ सेवाकुंज का रास और बाबा की मूर्च्छा
सेवाकुंज के द्वार पर पहुँचकर ठाकुर जी अंदर चले गए। बाबा के मन में जिज्ञासा जागी— "प्रभु रात के इस पहर में यहाँ क्या करते हैं?" उन्होंने एक आले (झरोखे) से अंदर झाँका। दृश्य ऐसा था कि काल थम गया। सामने साक्षात श्री राधा-कृष्ण सखियों संग रास रचा रहे थे। नुपूरों की झंकार, वो अलौकिक मुस्कान और दिव्य प्रकाश! बाबा उस अनुपम छटा को सह न सके। प्रेम के अतिरेक में उनका हृदय भर आया और वे वहीं मूर्छित होकर गिर पड़े।
भोर होने को थी। बांके बिहारी जी ने बाबा को जगाया— "बाबा! उठो, अब मंदिर चलने का समय हो गया।" बाबा ने फिर से उन्हें कंधे पर बैठाया और मंदिर के गर्भगृह तक छोड़ आए।
卐 मंगला आरती का अंत और प्रेम का नया नियम
सुबह जब मुख्य पुजारी (गोस्वामी जी) 'मंगला आरती' (सुबह की पहली आरती) के लिए पट खोलने आए, तो उन्होंने देखा कि बाबा पट को पकड़कर फफक-फफक कर रो रहे हैं।
"स्वामी जी, ठहरिए! पट मत खोलिए। मेरे गोविंद अभी-अभी तो सोए हैं। सारी रात सेवाकुंज में रास रचाकर वे बहुत थक गए हैं। क्या आपको उनके कोमल चरणों के छाले नहीं दिखते? उन्हें सोने दीजिए, आज उनकी नींद में बाधा मत डालिए।"
जब बाबा ने सारा वृत्तांत सुनाया, तो गोस्वामी जी की आँखों से भी प्रेम के आंसू बह निकले। उन्हें समझ आ गया कि मंदिर की मूर्ति पत्थर नहीं, बल्कि साक्षात जाग्रत देव हैं जो भक्त के प्रेम में रात-भर जागते हैं।
।। भक्त और भगवान का शाश्वत प्रेम ।।
आज भी जब भक्त वृंदावन में बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए जाते हैं, तो वहाँ की देरी से होने वाली आरती और पट खुलने की परंपरा हमें उसी बूढ़े ब्राह्मण के निश्चल प्रेम और ठाकुर जी की अद्भुत लीला की याद दिलाती है। बोलो बांके बिहारी लाल की जय!

