चर्त्व सन्धि (Chartva Sandhi)

Sooraj Krishna Shastri
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चर्त्व सन्धि (Chartva Sandhi)

व्यंजन सन्धि का अत्यंत महत्त्वपूर्ण नियम: 'खरि च' सूत्र, जश्त्व के साथ इसका सम्बन्ध एवं परीक्षापयोगी उदाहरणों का विस्तृत विवेचन।

परिभाषा: 'चर्त्व' का शाब्दिक अर्थ है — 'चर्' (च्, ट्, त्, क्, प्, श्, ष्, स्) हो जाना। जब सन्धि करते समय किसी वर्ग के दूसरे, तीसरे या चौथे वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का 'प्रथम वर्ण' (1st Letter) आदेश हो जाता है, तो उसे 'चर्त्व सन्धि' कहते हैं। यह जश्त्व सन्धि (तीसरे वर्ण) की ठीक विपरीत प्रक्रिया है।

१. सन्धि विधायक मुख्य सूत्र

सूत्र: खरि च (८.४.५५)

सूत्र विच्छेद: खरि + च। (इसमें पिछले सूत्र से 'झलाम्' और 'चरः' की अनुवृत्ति आती है, अतः पूरा अर्थ होता है — झलां खरि चरः स्युः)।
अर्थ (नियम): यदि 'झल्' प्रत्याहार (वर्गों के १, २, ३, ४ वर्ण और श्, ष्, स्, ह्) के बाद 'खर्' प्रत्याहार (वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण और श्, ष्, स्) आए, तो पहले वाले 'झल्' वर्ण के स्थान पर 'चर्' (उसी वर्ग का प्रथम वर्ण अर्थात् क्, च्, ट्, त्, प्) हो जाता है।
(सरल शब्दों में: यदि किसी वर्ण के बाद कोई कठोर व्यंजन (१, २, श्, ष्, स्) आए, तो पहला वर्ण अपने ही वर्ग का पहला अक्षर बन जाता है।)
परिवर्तन का क्रम (३ / ४ ➔ १):
  • ग्, घ् ➔ क्
  • ज्, झ् ➔ च्
  • ड्, ढ् ➔ ट्
  • द्, ध् ➔ त्
  • ब्, भ् ➔ प्

२. महत्त्वपूर्ण उदाहरण (V.V.Imp)

प्रायः जश्त्व सन्धि के कारण जो शब्द तीसरे वर्ण (द्, ग् आदि) में बदल चुके होते हैं, वे 'खर्' (कठोर वर्ण) के सम्पर्क में आने पर पुनः 'चर्त्व' सन्धि द्वारा प्रथम वर्ण (त्, क् आदि) में बदल जाते हैं।

(क) द् ➔ त् के उदाहरण (सर्वाधिक पूछे जाने वाले):
सद् + कारः = सत्कारः (आदर)। (यहाँ 'द्' (झल्) के बाद 'क्' (खर्) आया, अतः 'द्' अपने वर्ग के प्रथम वर्ण 'त्' में बदल गया)।
उद् + पन्नः = उत्पन्नः (पैदा हुआ)। (द् ➔ त्)।
विपद् + कालः = विपत्कालः (संकट का समय)।
तद् + परः = तत्परः (उसमें लीन)।
उद् + साहः = उत्साहः। (यहाँ 'द्' के बाद 'स्' (खर्) आया है, अतः द् ➔ त्)।
उद् + कोचा = उत्कोचा (रिश्वत)।
(ख) अन्य वर्गों के उदाहरण:
दिग् + पालः = दिक्पालः (दिशाओं का रक्षक)। (ग् ➔ क्)
भेद + तुम् = भेत्तुम् (भेदने के लिए)। (यहाँ 'द्' का 'त्' हो गया)।
युयुध् + सा = युयुत्सा (लड़ने की इच्छा)। (ध् ➔ त्)
लभ् + स्यते = लप्स्यते (प्राप्त करेगा)। (भ् ➔ प्)

३. जश्त्व और चर्त्व में सम्बन्ध (TGT/PGT Special)

संस्कृत व्याकरण में 'जश्त्व' (तीसरा वर्ण) और 'चर्त्व' (पहला वर्ण) एक-दूसरे के पूरक हैं। इसे ऐसे समझें:
  • यदि किसी वर्ण के बाद मृदु व्यंजन (३, ४, ५, य्, र्, ल्, व्) या स्वर आए, तो जश्त्व सन्धि होती है (जैसे: जगत् + ईशः = जगदीशः)। यहाँ 'त्' को 'द्' हो गया।
  • किन्तु यदि किसी वर्ण के बाद कठोर व्यंजन (१, २, श्, ष्, स्) आए, तो चर्त्व सन्धि होती है (जैसे: उद् + पन्नः = उत्पन्नः)। यहाँ 'द्' वापस 'त्' बन गया।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
  • चर्त्व का अर्थ: किसी भी वर्ण का अपने ही वर्ग के प्रथम वर्ण (१) में बदलना। (ग् ➔ क्, द् ➔ त्)।
  • मुख्य सूत्र: खरि च (८.४.५५)।
  • शर्त: बाद में 'खर्' (कठोर वर्ण: १, २, श्, ष्, स्) का होना अनिवार्य है।
  • पहचान: शब्द के बीच में आधे 'त्', 'क्', 'प्' के साथ 'क्, प्, स्' जैसे वर्ण जुड़े रहते हैं (उत्पन्नः, सत्कारः, दिक्पालः)।

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