॥ श्री दुर्गा मानस पूजा ॥
सटीक भावार्थ सहित
॥ माहात्म्य ॥
जब हमारे पास माता को अर्पित करने के लिए कोई भौतिक सामग्री न हो, तब केवल सच्चे भाव और मन के द्वारा माता की पूजा की जाती है। यह 'मानस पूजा' माता को अत्यंत प्रिय है। इसमें मन की कल्पना के द्वारा ही माता को स्नान, दिव्य वस्त्र, आभूषण और सुगन्धित छप्पन-भोग अर्पित किये जाते हैं।
उद्यच्चन्दनकुङ्कुमारुणपयोधाराभिराप्लावितां
नानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके ।
आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितो
मातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात् ॥ १ ॥
नानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके ।
आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितो
मातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात् ॥ १ ॥
अर्थ: माता त्रिपुरसुन्दरि! तुम भक्तों की मनोवांछा पूर्ण करने वाली कल्पलता हो। बहुमूल्य मणियों और मूँगों से जड़ित यह पादुका, जिसे लाल जल और चन्दन-कुमकुम की धारा से धोया गया है तथा देवांगनाओं ने अपने कर-कमलों से स्वच्छ किया है, उसे आदरपूर्वक ग्रहण करो।
देवेन्द्रादिभिरर्चितं सुरगणैरादाय सिंहासनं
चञ्चत्काञ्चनसञ्चयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम् ।
एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलं
गन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके ॥ २ ॥
चञ्चत्काञ्चनसञ्चयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम् ।
एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलं
गन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके ॥ २ ॥
अर्थ: माँ! देवराज इन्द्र आदि देवताओं ने तुम्हारे बैठने के लिए यह स्वर्ण जड़ित दिव्य सिंहासन प्रस्तुत किया है, जो अपनी मनोहर प्रभा से प्रकाशमान है। साथ ही चम्पा और केतकी की सुगंध से युक्त यह निर्मल तेल व उबटन जो दिव्य युवतियां लाई हैं, उसे स्वीकार करो।
पश्चाद्देवि गृहाण शम्भुगृहिणि श्रीसुन्दरि प्रायशो
गन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम् ।
तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसि
स्नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे ॥ ३ ॥
गन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम् ।
तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसि
स्नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे ॥ ३ ॥
अर्थ: देवि शिव-प्रिये! इसके पश्चात् यह विशुद्ध और सुगन्धित आँवले का फल (धात्रीफल) ग्रहण करो। इससे बालों में कंघी करके मंदाकिनी (गंगा) के निर्मल जल में स्नान करो। यह दिव्य गंध आपके हर्ष को बढ़ाए।
सुराधिपतिकामिनीकरसरोजनालीधृतां
सचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम् ।
महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकां
गृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे ॥ ४ ॥
सचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम् ।
महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकां
गृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे ॥ ४ ॥
अर्थ: वरदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! देवराज इन्द्र की पत्नी (शची) द्वारा अपने हाथों में प्रस्तुत यह सरस, शुद्ध और अत्यंत सुगन्धित कस्तूरी ग्रहण करो, जिसमें चन्दन, कुमकुम और अगुरु का मधुर मेल है।
गन्धर्वामरकिन्नरप्रियतमासन्तानहस्ताम्बुज-
प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम् ।
मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलं
चैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम् ॥ ५ ॥
प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम् ।
मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलं
चैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम् ॥ ५ ॥
अर्थ: हे सुन्दरी माता! गंधर्व और देवताओं की सुन्दरी पत्नियों द्वारा अपने कर-कमलों पर प्रस्तुत यह केसर से रंगा हुआ पीताम्बर (वस्त्र) सेवा में समर्पित है। यह सूर्यमंडल की भांति चमकदार और निर्मल वस्त्र आपके आनंद को बढ़ाए।
स्वर्णाकल्पितकुण्डले श्रुतियुगे हस्ताम्बुजे मुद्रिका
मध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये ।
हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वके
विन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम् ॥ ६ ॥
मध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये ।
हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वके
विन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम् ॥ ६ ॥
अर्थ: तुम्हारे कानों में स्वर्ण कुण्डल, हाथों में अंगूठी, कमर पर करधनी और चरणों में मंजीर (पायल) शोभित हों। वक्षःस्थल पर हार, कलाइयों में खनखनाते हुए कंकण और मस्तक पर रखा हुआ दिव्य मुकुट प्रतिदिन आनंद प्रदान करें।
ग्रीवायां धृतकान्तिकान्तपटलं ग्रैवेयकं सुन्दरं
सिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम् ।
राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचने
तद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे ॥ ७ ॥
सिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम् ।
राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचने
तद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे ॥ ७ ॥
अर्थ: हे शाम्भवि! गले में सुंदर चमचमाती हँसली (ग्रैवेयक), ललाट पर सौन्दर्य की मुद्रा बिखेरने वाली सिन्दूर की बिंदी तथा कमल-दलों की शोभा को भी लजाने वाले नेत्रों में दिव्य औषधियों से निर्मित यह काजल सुशोभित हो।
अमन्दतरमन्दरोन्मथितदुग्धसिन्धूद्भवं
निशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे ।
गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै-
र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम् ॥ ८ ॥
निशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे ।
गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै-
र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम् ॥ ८ ॥
अर्थ: क्षीरसागर के मंथन से प्रकट हुए, चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल और मूंगे से जड़े हुए इस दर्पण (शीशे) को अपना मुख निहारने के लिए ग्रहण करो, जिसे कामदेव की पत्नी (रति) अपने हाथों में लिए खड़ी हैं।
कस्तूरीद्रवचन्दनागुरुसुधाधाराभिराप्लावितं
चञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम् ।
देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्नादिकुम्भव्रजै-
रम्भःशाम्भवि सम्भ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके ॥ ९ ॥
चञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम् ।
देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्नादिकुम्भव्रजै-
रम्भःशाम्भवि सम्भ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके ॥ ९ ॥
अर्थ: कस्तूरी, चन्दन, अगुरु और चम्पा आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित यह निर्मल जल, जिसे देव-स्त्रियां अपने मस्तक पर रत्नकुम्भों (घड़ों) में लेकर खड़ी हैं, हे अम्बिके! स्नान के लिए इसे ग्रहण करो।
कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती-
मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वमारादिभिः ।
पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसा
ताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये ॥ १० ॥
मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वमारादिभिः ।
पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसा
ताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये ॥ १० ॥
अर्थ: सफेद कमल, नागकेसर, मालती, जूही, केतकी और कनेर आदि सुगंधित और रसयुक्त फूलों की इन सुंदर मालाओं से मैं ताम्रकमल पर निवास करने वाली भगवती श्री चंडिका का पूजन करता हूँ।
मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै-
र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः ।
सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतये
धूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ ११ ॥
र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः ।
सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतये
धूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ ११ ॥
अर्थ: जटामांसी, गुग्गुल, चन्दन, अगुरु, कपूर, कुमकुम और घी के मिश्रण से निर्मित यह अत्यंत सुगन्धित धूप, जो रत्नमय पात्र में देव-सुन्दरियों द्वारा प्रस्तुत है, हे चण्डिके! यह आपकी प्रसन्नता को बढ़ाए।
घृतद्रवपरिस्फुरद्रुचिररत्नयष्ट्यान्वितो
महातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः ।
सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित-
स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे ॥ १२ ॥
महातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः ।
सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित-
स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे ॥ १२ ॥
अर्थ: सुवर्ण के पात्र में घी और कपूर की बत्ती से प्रज्वलित, रत्नों की डंडी वाला यह जगमगाता हुआ दिव्य दीपक जो महा अन्धकार का नाश करने वाला है, हे त्रिपुरसुन्दरि! यह आपको हर्ष प्रदान करे।
जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलं
युक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिर्द्रव्यान्वितैर्व्यञ्जनैः ।
पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितं
नैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ १३ ॥
युक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिर्द्रव्यान्वितैर्व्यञ्जनैः ।
पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितं
नैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ १३ ॥
अर्थ: चमेली की सुगंध वाला निर्मल चावल, हींग-जीरे से युक्त स्वादिष्ट व्यंजन, पके हुए अन्न, खीर (पायस), मधु, दही और घी से मिश्रित यह छप्पन भोग रूपी नैवेद्य मैं आपको अर्पित करता हूँ।
लवङ्गकलिकोज्ज्वलं बहुलनागवल्लीदलं
सजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम् ।
सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्नपात्रस्थितं
गृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम् ॥ १४ ॥
सजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम् ।
सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्नपात्रस्थितं
गृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम् ॥ १४ ॥
अर्थ: लौंग, इलायची, सुपारी, पान के पत्ते और जावित्री से युक्त यह सुधारस से परिपूर्ण, मधुर और सुगन्धित ताम्बूल (पान), जो रत्नमय पात्र में रखा है, हे अम्ब! इसे अपने मुख-कमल में ग्रहण करो।
शरत्प्रभवचन्द्रमः स्फुरितचन्द्रिकासुन्दरं
गलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम् ।
गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलं
महात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत् ॥ १५ ॥
गलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम् ।
गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलं
महात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत् ॥ १५ ॥
अर्थ: शरद् ऋतु के चन्द्रमा की चांदनी के समान सुंदर, और गंगा की लहरों के समान मोतियों की झालर वाला यह स्वर्ण-दण्ड (सोने की डंडी) से युक्त महान छत्र (छतरी) ग्रहण करो।
मातस्त्वन्मुदमातनोतु सुभगस्त्रीभिः सदाऽऽन्दोलितं
शुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम् ।
सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिः
स्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः ॥ १६ ॥
शुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम् ।
सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिः
स्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः ॥ १६ ॥
अर्थ: देव-स्त्रियों द्वारा डुलाया जाने वाला चन्द्रमा और कुंद पुष्प के समान श्वेत चंवर आपके पसीने और श्रम को दूर करे। तथा अगस्त्य, वशिष्ठ, नारद, शुकदेव, व्यास और वाल्मीकि आदि ऋषियों द्वारा मन ही मन किया जा रहा वेद-ध्वनि रूपी गान आपको शांति प्रदान करे।
स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्खभेरीनिनादैरूपगीयमाना ।
कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय ॥ १७ ॥
कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय ॥ १७ ॥
अर्थ: स्वर्ग के प्रांगण में बांसुरी, मृदंग, शंख और भेरी के निनाद (कोलाहल) के साथ विद्याधरियों द्वारा प्रस्तुत यह उत्तम नृत्य-कला और गान आपको परम सुख प्रदान करे।
देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते ।
तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकञ्जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम् ॥ १८ ॥
तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकञ्जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम् ॥ १८ ॥
अर्थ: हे देवि! भक्ति रस से पूर्ण यह मानस पूजा का स्तोत्र यदि कहीं से भी प्राप्त हो जाए, तो उसके प्रति जो लालसा (भाव) उत्पन्न होती है, वही करोड़ों जन्मों का एकमात्र सत्फल है, जो तुम्हारी कृपा के बिना सुलभ नहीं है।

