श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (Ayi Giri Nandini Lyrics in Hindi with Meaning)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥

(अयि गिरिनन्दिनि)
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्य-शिरोऽधि-निवासिनिविष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठ-कुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूतिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
अर्थ: हे हिमालय की पुत्री! पृथ्वी को आनंदित करने वाली, सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करने वाली और नंदीगणों द्वारा नमस्कृत। विन्ध्याचल के सर्वोच्च शिखर पर निवास करने वाली, विष्णु को प्रसन्न करने वाली। हे नीलकंठ की पत्नी, अपार कल्याण करने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुख-मर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि कल्मषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दुर्मदशोषिणि दुर्मुखरोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अर्थ: देवताओं पर वरदानों की वर्षा करने वाली, दुर्धर और दुर्मुख का नाश करने वाली। तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को संतुष्ट करने वाली, पापों (कल्मष) को हरने वाली। दानवों के क्रोध और अहंकार को सोखने वाली और समुद्र की पुत्री! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
अयि जगदम्ब कदम्बवन-प्रियवासिनि तोषिणि हासरते
शिखरि-शिरोमणि-तुङ्ग-हिमालय-शृङ्गनिजालय-मध्यगते ।
मधुमधुरे मधु-कैटभ-गञ्जिनि महिषविदारिणि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अर्थ: हे जगदम्बा! कदम्ब के वन में निवास करने वाली और हास-परिहास में मग्न रहने वाली। हिमालय की चोटियों पर स्थित अपने भवन के मध्य में निवास करने वाली। मधु-कैटभ का नाश करने वाली और महिषासुर को विदीर्ण करने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
अयि निजहुङ्कृति-मात्रनिराकृत-धूम्रविलोचन-धूम्रशते
समरविशोषित-रोषित-शोणित-बीजसमुद्भव-बीजलते ।
शिव-शिव-शुम्भ-निशुम्भ-महाहव-तर्पित-भूत-पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अर्थ: अपनी केवल एक हुँकार से धूम्रविलोचन जैसे सौ धुएं के समान असुरों को भस्म करने वाली। युद्ध में रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न होने वाले नए रक्तबीजों को सोखने वाली। शुम्भ-निशुम्भ के साथ हुए युद्ध में भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
अयि शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड-गजाधिपते
निजभुजदण्ड-निपातितचण्ड-विपाटितमुण्ड-भटाधिपते ।
रिपुगजगण्ड-विदारण-चण्डपराक्रम-शौण्ड-मृगाधिपते
जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
अर्थ: तुमने शत्रुओं के हाथियों की सूंड को काट दिया और उनके धड़ों को खंडित कर दिया। तुमने अपने भुजदण्डों से चण्ड-मुण्ड जैसे योद्धाओं को गिरा दिया। तुम्हारा वाहन सिंह शत्रुओं के हाथियों का मस्तक विदीर्ण करने में चण्ड पराक्रमी है। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
धनुुरनुषङ्ग - रणक्षणसङ्ग - परिस्फुरदङ्ग - नटत्कटके
कनक - पिशङ्ग - पृषत्कनिषङ्ग - रसद्भटशृङ्ग - हताबटुके ।
हतचतुरङ्गबल - क्षितिरङ्ग - घटद् - बहुरङ्ग - रटद् - बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अर्थ: युद्ध में धनुष धारण करने के कारण अंगों के फड़कने से कलाई के कंगन नाचते हुए प्रतीत होते हैं। स्वर्ण के समान चमकते बाणों से तुमने शत्रुओं के सिर काट गिराए हैं। तुमने युद्ध-मैदान में अनेक शब्द करते हुए बटुकों को उत्पन्न किया है। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​अयि रणदुर्मद - शत्रुवधाद्धुर - दुर्धर - निर्भर - शक्तिभृते
चतुर - विचार - धुरीण - महाशय - दूतकृत - प्रमथाधिपते ।
दुरित - दुरीह - दुराशय - दुर्मति - दानवदूत - दुरन्तगते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
अर्थ: युद्ध में अहंकार से भरे शत्रुओं का वध करने वाली और देवताओं की शक्तियों को धारण करने वाली। हे देवि! चतुर और विचारशील महाशिव को तुमने अपना दूत बनाया। दुष्ट इच्छा वाले दानवों के दूत को यमराज के पास भेजने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​अयि शरणागत - वैरिवधूजन - वीरवराभय - दायिकरे
त्रिभुवनमस्तक - शूलविरोधि - शिरोधिकृतामल - शूलकरे ।
दुमिदुमितामर - दुन्दुभिनाद - मुहुर्मुखरीकृत - दिङ्निकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
अर्थ: शरण में आए हुए शत्रु की स्त्रियों और वीरों को अभय देने वाली। तीनों लोकों के विरोधियों के सिरों को काटकर त्रिशूल धारण करने वाली। 'दुमि-दुमि' बजने वाले दुन्दुभि (नगाड़ों) से दिशाओं को गुंजायमान करने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​सुरललना - ततथेयित - थेयित - थाभिनयोत्तर - नृत्यरते
कृतकुकुथा - कुकुथोदि - डडाडिक - तालकुतूहल - गानरते ।
धुधुकुट - धूधुट - धिन्धि-मितध्वनि - घोरमृदङ्ग - निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
अर्थ: देवांगनाओं द्वारा किए जाने वाले सुंदर नृत्य और अभिनय में मग्न रहने वाली। विभिन्न तालों के कुतूहलपूर्ण गान में रमने वाली। 'धुधुकुट धुक्कुट' ध्वनि वाले घोर मृदंग के निनाद में प्रसन्न होने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​जय जय जाप्यजये जयशब्द - परस्तुति - तत्पर - विश्वनुते
झणझण - झिञ्झिम - झिंकृत-नूपुर-शिञ्जित - मोहित - भूतपते ।
नटितनटार्ध - नटीनटनायक - नाटन - नाटित - नाट्य़रते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अर्थ: सम्पूर्ण विश्व 'जय जय' शब्द का निरंतर जप करते हुए तुम्हारी स्तुति में तत्पर है। तुम्हारे नूपुरों की झंकार से भूतपति (शिव) भी मोहित हो जाते हैं। नट और नटी के रूप में अर्धनारीश्वर स्वरूप धारण कर नाट्य में लीन रहने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​अयि सुमनः - सुमनः - सुमनः - सुमनः-सुमनोरमकान्तियुते ।
श्रितरजनी - रजनी - रजनी - रजनी - रजनीकर - वक्त्रभृते ।
सुनयन - विभ्रमर - भ्रमर - भ्रमर - भ्रमर - भ्रमराभिदृत्ये
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
अर्थ: हे देवि! तुम सुंदर पुष्पों के समान अत्यंत मनोहर कांति से युक्त हो। तुम्हारा मुखमंडल रात्रि के चंद्रमा के समान सुशोभित है। तुम्हारे सुंदर नेत्रों की चंचलता काले भौरों (भ्रमर) के राजा के समान है। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​सहित - महाहव - मल्लमतल्लिक-वल्लित-रल्लित - भल्लरते
विरचितवल्लि-कपालिक-पल्लिक-झिल्लिक-भिल्लिकवर्गवृते।
श्रुतकृतफुल्ल - समुल्लसितारुण-तल्लज-पल्लव - सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
अर्थ: महान युद्ध में बड़े-बड़े मल्लों (पहलवानों) और योद्धाओं का मर्दन करने वाली। लताओं और झींगुरों-भीलों (वनवासियों) के समूहों से घिरी हुई। खिले हुए लाल रंग के पल्लवों के समान अत्यंत सुंदर कांति वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​अयि - सुदतीजन लालस - मानस - मोहन - मन्थरराजसुते
अविरल - गण्ड - गलन् - मदमेदुर - मत्त - मतङ्गजराजगते ।
त्रिभुवन - भूषण - भूत - कलानिधिरूप - पयोनिधिराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
अर्थ: जिसके मस्तक से निरंतर बहने वाले मद (पसीने) से मदमस्त हुए गजराज पर तुम विराजमान हो। तीनों लोकों को सुशोभित करने वाली, रूप-सौंदर्य के सागर के समान हे राजपुत्री! हे कामदेव को भी मोहित कर देने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
कमलदलामल - कोमलकान्ति - कलाकलितामल - भालतले
सकल - विलास - कलानिलय - क्रमकेलिलत् - कलहंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल - कुन्तलमण्डल - मौलिमिलद् - बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
अर्थ: तुम्हारा निर्मल भाल (मस्तक) कमल के पत्ते के समान निर्मल, कोमल और कांतियुक्त है। तुम संपूर्ण विलासों का निवास स्थान हो। तुम्हारे केशों में भौरों से घिरे हुए नीले कमल और बकुल के फूलों की माला गुंथी हुई है। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​करमुरलीरव - वीजित - कूजित - लज्जित-कोकिल- मञ्जुमते
मिलित - मिलिन्द - मनोहरगुञ्जित - रञ्जित - शैलनिकुञ्जगते ।
निजगण - भूतमहाशबरीगण - रङ्गणसम्भृत - केलिरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
अर्थ: तुम्हारी मुरली (बांसुरी) से निकलने वाली मधुर ध्वनि को सुनकर कोयल का स्वर भी लज्जित हो जाता है। मनोहर गीतों से गुंजायमान पर्वतों के कुंजों (गुफाओं) में निवास करने वाली। महाशबरी स्त्रियों के साथ रमण करने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​कटितटपीत - दुकूलविचित्र - मयूख - तिरस्कृत - चण्डरुचे
जितकनकाचल - मौलिमदोर्जित - गर्जितकुञ्जर - कुम्भकुचे ।
प्रणत - सुरासुर - मौलिमणि - स्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
अर्थ: तुम्हारी कमर पर बंधे पीले रेशमी वस्त्रों की चमक चंद्रमा की चांदनी को भी फीका कर देती है। तुम्हारे चरणों में प्रणाम करने वाले देवों और असुरों के मुकुट की मणियों से तुम्हारे नख चंद्रमा के समान दमकते हैं। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​विजित - सहस्रकरैक - सहस्रकरैक - सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक - सङ्गरतारक - सङ्गरतारक - सूनुसुते ।
सुरथसमाधि - समानसमाधि - समानसमाधि - सुजाप्यरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
अर्थ: जिसने हजारों सूर्य की किरणों को जीत लिया है और जिसे सहस्रबाहु द्वारा वंदित किया जाता है। जिसने देवताओं की रक्षा के लिए तारकासुर से युद्ध करने वाले कार्तिकेय को उत्पन्न किया है। राजा सुरथ और वैश्य समाधि को वरदान देने वाली! हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परं पदमस्त्विति शीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
अर्थ: हे करुणा के निवास स्थान शिवे! जो व्यक्ति प्रतिदिन तुम्हारे चरण-कमलों की पूजा करता है, वह स्वयं कमल (धन-संपत्ति) का निवास स्थान कैसे नहीं बनेगा? तुम्हारे चरणों को ही परम पद मानकर मैं निरंतर उनका ध्यान करता हूँ। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​कनकलसत् - कलशीकजलैरनुषिञ्चति तेऽङ्गणरङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भ - नटीपरिरम्भ-सुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
अर्थ: जो व्यक्ति स्वर्ण-कलश में भरे हुए जल से तुम्हारे विग्रह का अभिषेक कराता है, वह इन्द्र-पद के सुख को क्यों नहीं प्राप्त करेगा? हे देवताओं की वाणी में निवास करने वाली शिवे! मैं तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूत - पुरीन्दुमुखी - सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमु न क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
अर्थ: तुम्हारा चंद्रमा के समान निर्मल मुखमंडल देखने मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप दूर हो जाते हैं। क्या ऐसा व्यक्ति स्वर्ग की स्त्रियों द्वारा कभी विमुख किया जा सकता है? मेरा तो यही मत है कि तुम्हारी कृपा से क्या कुछ संभव नहीं है। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
​अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननीति यथाऽसि मयाऽसि तथाऽनुमतासि रमे ।
यदुचितमत्र भवत्पुरगं कुरु शाम्भवि देवि दयाम् कुरु मे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
अर्थ: हे उमे! मुझ दीन (असहाय) पर तुम्हें अपनी दयालुता के कारण ही कृपा करनी चाहिए। हे जगन्माता! तुम जैसी कृपालु हो, मुझे तुम पर पूर्ण विश्वास है। जो भी तुम्हें उचित लगे, तुम वैसा ही करो, हे शाम्भवि! मुझ पर दया करो। हे महिषासुरमर्दिनी! तुम्हारी जय हो।
स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना, नियमतो यमतोऽनुदितं पठेत् ।
परमया रमया स निषेव्यते, परिजोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥ २२ ॥
अर्थ: जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर, नियम और संयम के साथ इस स्तुति का नित्य पाठ करता है, वह परम रमा (महालक्ष्मी) द्वारा सेवित होता है और उसके शत्रु भी उसके वशीभूत होकर उसकी वंदना करते हैं।

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