दुर्गा सप्तशती अध्याय 2: श्लोक, विनियोग और हिंदी अर्थ (Durga Saptashati Chapter 2)

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
दुर्गा सप्तशती द्वितीय अध्याय - महिषासुर सेना वध
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीमध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।

॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

द्वितीयोऽध्यायः (महिषासुर-सैन्य-वध)
॥ ध्यानम् ॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
अर्थ: मैं कमल के आसन पर बैठी हुई और प्रसन्न मुख वाली महालक्ष्मी देवी की उपासना करता हूँ। वे अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं और महिषासुर का वध करने वाली हैं।
ॐ ह्रीं ऋषिरुवाच ॥१॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा ।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥२॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् ।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥३॥
ततः पराजिता देवा पद्मयोनिं प्रजापतिम् ।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥४॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं - पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर युद्ध हुआ था। उस समय असुरों के स्वामी महिषासुर थे और देवताओं के नायक इन्द्र थे। उस युद्ध में देवताओं की सेना महापराक्रमी असुरों से हार गई। सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इन्द्र बन बैठा। तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके उस स्थान पर गए जहाँ भगवान शंकर और विष्णु विराजमान थे।
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥५॥
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च ।
अन्येषां चाधिकारान्स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥६॥
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥७॥
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥८॥
अर्थ: देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम और अपनी हार का पूरा वृत्तान्त उन दोनों (शिव-विष्णु) से ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। उन्होंने कहा- "दुरात्मा महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य सभी देवताओं के अधिकार स्वयं छीन लिए हैं। उसने सभी देवताओं को स्वर्ग से निकालकर पृथ्वी पर मनुष्यों की तरह विचरने के लिए विवश कर दिया है। उस शत्रु की करतूत हमने आपको बता दी, अब हम आपकी शरण में हैं, उसके वध का कोई उपाय सोचिए।"
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः ।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥९॥
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥१०॥
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः ।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥११॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥१२॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥१३॥
अर्थ: देवताओं की ये बातें सुनकर भगवान विष्णु और शिवजी को बड़ा क्रोध आया, और उनकी भौंहें तन गईं। तब अत्यंत क्रोध में भरे हुए भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिवजी के मुख से बड़ा भारी तेज प्रकट हुआ। इन्द्र आदि अन्य सभी देवताओं के शरीरों से भी बड़ा तेज निकला और वह सब मिलकर एक हो गया। वह तेज का पुंज एक प्रज्वलित पर्वत के समान था। सभी देवताओं के शरीर से प्रकट हुआ वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्रित होकर एक नारी (देवी) के रूप में परिणत हो गया, जिसकी कांति से तीनों लोक प्रकाशित हो उठे।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् ।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥१४॥
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥१५॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा ।
वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥१६॥
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा ।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥१७॥
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥१८॥
अर्थ: शिवजी के तेज से उस देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से सिर के बाल और भगवान विष्णु के तेज से उनकी भुजाएं उत्पन्न हुईं। चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तन, इन्द्र के तेज से मध्य भाग (कमर), वरुण के तेज से जंघा और पिंडलियां तथा पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग प्रकट हुआ। ब्रह्माजी के तेज से दोनों चरण, सूर्य के तेज से चरणों की उंगलियां, वसुओं के तेज से हाथों की उंगलियां और कुबेर के तेज से नासिका बनी। प्रजापति के तेज से उनके दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्याओं के तेज से भौंहें तथा वायु के तेज से दोनों कान प्रकट हुए। इसी प्रकार अन्य देवताओं के तेज से भी शिवा का प्रादुर्भाव हुआ।
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् ।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ॥१९॥
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाट्य स्वचक्रतः ॥२०॥
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।
मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥२१॥
वज्रमिन्द्रः समुत्पाट्य कुलिशादमराधिपः ।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद्गजात् ॥२२॥
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।
प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥२३॥
अर्थ: देवताओं के तेज से प्रकट हुई उन भगवती को देखकर महिषासुर के सताए हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए। भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर उन्हें दिया। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से एक चक्र उत्पन्न करके दिया। वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति और वायु ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश दिए। देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से एक वज्र उत्पन्न करके और ऐरावत हाथी के गले से उतारकर एक घंटा देवी को दिया। यमराज ने कालदण्ड से दण्ड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिक की माला और ब्रह्माजी ने कमण्डलु दिया।
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।
कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥२४॥
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥२५॥
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥२६॥
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च ।
विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥२७॥
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् ।
अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥२८॥
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।
हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥२९॥
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ।
शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥३०॥
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् ।
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥३१॥
अर्थ: सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में अपनी किरणें भर दीं। काल ने खड्ग (तलवार) और चमकती हुई ढाल दी। क्षीरसागर ने उज्ज्वल हार, कभी न फटने वाले दो दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, कुण्डल, कड़े, अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिए बाजूबंद, निर्मल नूपुर, गले की सुन्दर हंसली और सब उंगलियों के लिए रत्नों की अंगूठियां दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यंत निर्मल फरसा, अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिया। इसके अलावा सिर और हृदय पर धारण करने के लिए कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएं दीं। समुद्र ने बहुत सुन्दर कमल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिए सिंह और भांति-भांति के रत्न दिए। कुबेर ने मदिरा से भरा पानपात्र दिया। सम्पूर्ण नागों के राजा शेषनाग ने उन्हें महामणियों से विभूषित नागहार दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषणों और अस्त्र-शस्त्रों से देवी का सम्मान किया।
सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥३२॥
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥३३॥
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।
जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥३४॥
अर्थ: इसके बाद देवी ने बारंबार अट्टहास करते हुए उच्च स्वर से गर्जना की। उनके उस भयंकर नाद से संपूर्ण आकाश गूंज उठा। उससे बड़ी भारी प्रतिध्वनि हुई, जिससे सारे लोक क्षुब्ध हो उठे और समुद्र कांपने लगे। पृथ्वी डोलने लगी और सभी पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने प्रसन्न होकर सिंहवाहिनी देवी से कहा— 'देवि! तुम्हारी जय हो।'
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ।
दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ॥३५॥
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ।
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥३६॥
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥३७॥
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥३८॥
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद्व्याप्य संस्थिताम् ।
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥३९॥
अर्थ: महर्षियों ने भक्तिभाव से विनम्र होकर उनकी स्तुति की। सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षुब्ध देखकर दैत्यगण अपनी सारी सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर हाथों में हथियार लिए उठ खड़े हुए। महिषासुर ने क्रोध में भरकर कहा- "आह! यह क्या है?" और फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस शब्द की ओर दौड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि देवी अपनी कांति से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही हैं। उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी, मुकुट से आकाश छुआ जा रहा था और उनके धनुष की टंकार से पाताल लोक तक क्षुब्ध हो रहे थे। वे अपनी हज़ारों भुजाओं से सभी दिशाओं को ढके हुए खड़ी थीं। तब उन देवी के साथ असुरों का युद्ध छिड़ गया।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ।
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥४०॥
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥४१॥
अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः ।
पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः ॥४२॥
अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे ।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः ॥४३॥
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥४४॥
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥४५॥
अर्थ: नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से सब दिशाएं उद्भासित होने लगीं। महिषासुर का सेनापति 'चिक्षुर' नामक महान असुर देवी से युद्ध करने लगा। 'चामर' भी अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ लड़ने लगा। साठ हज़ार रथों के साथ 'उदग्र', एक करोड़ रथों के साथ 'महाहनु', पाँच करोड़ सैनिकों के साथ 'असिलोमा' और साठ लाख रथों के साथ 'बाष्कल' नामक असुर युद्ध करने लगा। 'बिडाल' नामक असुर पाँच अरब रथों से घिरकर लड़ने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हज़ारों महादैत्य हाथी, घोड़ों और रथों के साथ देवी से युद्ध करने लगे।
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ।
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥४६॥
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ।
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥४७॥
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः ।
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे ॥४८॥
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते हन्तुं प्रचक्रमुः ।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥४९॥
लीलयैव चिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥५०॥
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी ।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥५१॥
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः ।
निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥५२॥
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः ।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥५३॥
अर्थ: स्वयं महिषासुर करोड़ों रथों, हाथियों और घोड़ों की सेना से घिरकर उस युद्ध में खड़ा था। असुरों ने तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से देवी पर प्रहार करना शुरू किया। कुछ ने शक्ति फेंकी तो कुछ ने पाश। वे तलवार के प्रहार से देवी को मार डालना चाहते थे। परंतु देवी चण्डिका ने अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से उनके सभी अस्त्र-शस्त्रों को खेल-ही-खेल में काट डाला। उनके मुख पर तनिक भी थकान या घबराहट नहीं थी। देवता और ऋषि उनकी स्तुति कर रहे थे, और वे असुरों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर रही थीं। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर अपनी अयाल हिलाता हुआ असुरों की सेना में ऐसे विचरने लगा मानो जंगल में आग लगी हो। युद्ध करती हुई अम्बिका देवी ने जितने श्वास छोड़े, वे तुरंत ही हज़ारों गणों के रूप में प्रकट हो गए और वे भी फरसे, भिन्दिपाल, तलवार और पट्टिश आदि से युद्ध करने लगे।
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः ।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥५४॥
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ।
ततो देव्या त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः ॥५५॥
खड्गादिभिश्च शतशो निहता महासुराः ।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् ।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥५७॥
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ।
वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशाहताः ॥५८॥
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि ।
शराघौघैः कृताः केचिद्रणमाजौ दिशां गताः ॥५९॥
अर्थ: देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण असुरों का नाश करते हुए नगाड़े, शंख और मृदंग बजाने लगे। उस युद्ध-महोत्सव में देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति की वर्षा और तलवार आदि से सैकड़ों महादैत्यों को मार गिराया। कितनों को घंटे की भयंकर आवाज़ से मोहित करके मूर्च्छित कर दिया। बहुतेरे असुरों को पाश से बांधकर धरती पर घसीटा। कुछ को तलवार की तेज धार से दो टुकड़ों में काट दिया। कुछ गदा की चोट से घायल होकर धरती पर सो गए। बहुत से असुर मूसल की मार से खून उगलने लगे। कुछ त्रिशूल से छाती फटने के कारण भूमि पर गिर पड़े। कुछ बाणों की वर्षा से मारे गए और कुछ रणभूमि से भाग खड़े हुए।
सेनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः ।
केषांचिद्बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥६०॥
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः ।
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥६१॥
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः ।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥६२॥
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ।
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥६३॥
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः ।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥६४॥
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा ।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥६५॥
अर्थ: देवताओं को पीड़ा देने वाले वे असुर अपनी सेना के पीछे भागते हुए प्राण त्यागने लगे। किसी की भुजाएं कट गईं, तो किसी की गर्दन। कितनों के सिर कटकर गिर पड़े, तो कुछ बीच से ही फाड़ डाले गए। कुछ राक्षसों की जंघाएं कट गईं और वे धरती पर गिर पड़े। कुछ को देवी ने एक हाथ, एक आँख और एक पैर वाला कर दिया तथा कितनों को दो हिस्सों में चीर दिया। कितने ही असुर ऐसे थे जिनका सिर कट जाने पर भी वे गिरकर पुनः उठ खड़े होते और हथियार लेकर देवी से लड़ते थे। दूसरे कितने ही बिना सिर वाले धड़ (कबन्ध) हाथों में तलवार और शक्ति लिए युद्ध के बाजों की लय पर नाच रहे थे। कितने ही बिना सिर के धड़ हाथों में खड्ग और शक्ति लिए देवी से 'ठहरो-ठहरो' कहते हुए उन्हें ललकार रहे थे। जहाँ यह भयंकर युद्ध हो रहा था, वहाँ धरती गिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों की लाशों से पटी पड़ी थी।
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥६६॥
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका ।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥६७॥
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः ।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥६८॥
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः ।
यथैषां तुष्टुवुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥६९॥
अर्थ: वहाँ चलना भी मुश्किल हो गया था। असुरों की सेना, हाथियों और घोड़ों के बीच रक्त की बड़ी-बड़ी नदियां बहने लगीं। जिस प्रकार आग घास और लकड़ी के बड़े भारी ढेर को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार देवी अम्बिका ने क्षण भर में असुरों की उस विशाल सेना को नष्ट कर दिया। देवी का सिंह भी अपनी अयाल हिलाकर ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ता हुआ असुरों के शरीरों से मानो उनके प्राणों को ढूँढ-ढूँढकर निकाल रहा था। देवी के गणों ने उन महादैत्यों के साथ ऐसा पराक्रमपूर्ण युद्ध किया कि स्वर्ग में बैठे देवता भी प्रसन्न होकर उन पर फूलों की वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!