॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥
प्रथमोऽध्यायः (मधु-कैटभ-वध)
॥ ध्यानम् ॥
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्शूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥
अर्थ: भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिए कमलोद्भव ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं, वे समस्त अंगों में आभूषणों से विभूषित हैं तथा उनके शरीर की कांति नीलमणि के समान है।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीप्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।
ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच ॥१॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥२॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥२॥
अर्थ: मार्कण्डेय जी कहते हैं - सूर्य के पुत्र सावर्णि, जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो।
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥३॥
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥३॥
अर्थ: सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वह प्रसंग सुनाता हूँ।
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षितिमण्डले ॥४॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥५॥
सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षितिमण्डले ॥४॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥५॥
अर्थ: पूर्वकाल की बात है, स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्रवंश में उत्पन्न सुरथ नाम के एक राजा थे। उनका समूची पृथ्वी पर शासन था। वे अपनी प्रजा का औरस पुत्रों के समान धर्मपूर्वक पालन करते थे। फिर भी कोलाविध्वंसी नामक क्षत्रिय उनके शत्रु हो गए।
तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥६॥
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥७॥
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥६॥
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥७॥
अर्थ: राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी, उनका उन कोलाविध्वंसियों के साथ युद्ध हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, फिर भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे हार गए। तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आए और केवल अपने देश के ही राजा रह गए। फिर उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोषो बलञ्चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥८॥
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥९॥
कोषो बलञ्चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥८॥
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥९॥
अर्थ: राजा बलहीन हो चले थे, इसलिए उनके दुष्ट, बलवान और दुरात्मा मंत्रियों ने वहाँ राजधानी में भी उनका खजाना और सेना हथिया ली। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिए वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर अकेले ही एक घने जंगल में चले गए।
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः ।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१०॥
तस्थौ कञ्चित् स कालञ्च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चैतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥११॥
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१०॥
तस्थौ कञ्चित् स कालञ्च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चैतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥११॥
अर्थ: वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा। जहाँ हिंसक प्राणी भी शान्त भाव से रहते थे और जो मुनि के शिष्यों से सुशोभित था। मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम में इधर-उधर विचरते हुए कुछ समय तक वहीं रहे।
सोऽचिन्तयत् तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः ॥१२॥
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ।
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ॥१३॥
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ।
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ॥१३॥
अर्थ: वहाँ ममता के आकर्षण से बंधे हुए राजा ने सोचा- "पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था और आज जो मेरे हाथ से निकल गया है, वह मेरी राजधानी मेरे दुराचारी मंत्रियों द्वारा धर्मपूर्वक पाली जा रही है या नहीं?"
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ।
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ॥१४॥
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ।
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ॥१५॥
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ॥१४॥
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ।
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ॥१५॥
अर्थ: "जो मेरा प्रधान शूरवीर और सदा मद बहाने वाला हाथी था, वह अब मेरे शत्रुओं के वश में होकर न जाने किन भोगों को प्राप्त करता होगा? जो लोग सदा मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से मेरे अधीन थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं का अनुसरण करते होंगे।"
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ।
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ॥१६॥
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ।
तत्र विप्राश्रमाभ्यासे वैश्यमेकं ददर्श सः ॥१७॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ॥१६॥
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ।
तत्र विप्राश्रमाभ्यासे वैश्यमेकं ददर्श सः ॥१७॥
अर्थ: "अनुचित व्यय करने वाले उन अपव्ययी लोगों के द्वारा लगातार खर्च किए जाने पर मेरा अत्यंत कष्ट से संचित किया हुआ खजाना नष्ट हो जाएगा।" राजा निरंतर इसी प्रकार की और भी बातें सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने उस ब्राह्मण के आश्रम के पास एक वैश्य को देखा।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भोः हेतुश्चागमनेऽत्र कः ।
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ॥१८॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ।
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ॥१८॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ।
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥
अर्थ: राजा ने उससे पूछा - 'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? तुम शोकग्रस्त और अनमने से क्यों दिखाई दे रहे हो?' राजा के ये प्रेमपूर्वक कहे गए वचन सुनकर उस वैश्य ने विनीत भाव से राजा को उत्तर दिया।
वैश्य उवाच ॥२०॥
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ।
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ॥२१॥
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभैः ॥२२॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ॥२१॥
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभैः ॥२२॥
अर्थ: वैश्य ने कहा - 'राजन्! मेरा नाम समाधि है। मैं धनी वैश्यों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ। मेरे दुष्ट स्त्री और पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से निकाल दिया है। मेरे स्वजनों ने मेरा सारा धन छीन लिया है, इसलिए धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित होकर तथा अपने ही विश्वस्त बंधुओं द्वारा निकाला जाकर मैं दुःखी मन से इस वन में आ गया हूँ।'
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ।
प्रवृत्तिं स्वजनानाञ्च दाराणाञ्चात्र संस्थितः ॥२३॥
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ।
कथं ते किं नु सद्वृत्ताः दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥२४-२५॥
प्रवृत्तिं स्वजनानाञ्च दाराणाञ्चात्र संस्थितः ॥२३॥
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ।
कथं ते किं नु सद्वृत्ताः दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥२४-२५॥
अर्थ: 'यहाँ रहकर मैं अपने पुत्रों, संबंधियों और पत्नी की कुशल-अकुशल का समाचार नहीं जान पा रहा हूँ। इस समय उनके घर में कुशल है या अकुशल? वे कैसे होंगे? मेरे पुत्र सदाचारी हैं या दुराचारी हो गए हैं?'
राजोवाच ॥२६॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥२७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥२८॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥२८॥
अर्थ: (राजा ने पूछा -) जिन लोभी स्त्री और पुत्रों ने धन के कारण आपको घर से निकाल दिया है, उनके प्रति आपके चित्त में इतना स्नेह क्यों बंधा हुआ है?
वैश्य उवाच ॥२९॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ।
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ॥३०॥
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ।
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः ॥३१॥
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ॥३०॥
यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ।
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः ॥३१॥
अर्थ: वैश्य ने कहा - आप मेरे विषय में जो कह रहे हैं, वह सब ठीक है। क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता (कठोरता) धारण नहीं करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता का स्नेह, पति का प्रेम तथा आत्मीय जन का अनुराग त्याग कर मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में स्नेह है।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ।
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ॥३२॥
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥३३॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥३४॥
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ॥३२॥
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥३३॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥३४॥
अर्थ: हे महामते! मैं यह जानते हुए भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि दोषयुक्त (गुणहीन) बंधुओं के प्रति भी मेरा चित्त प्रेम से क्यों भरा है। उनके लिए मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ और मेरा मन अत्यंत दुखी हो रहा है। उन प्रेमहीन लोगों के प्रति मेरा मन कठोर नहीं हो पाता, मैं क्या करूँ?
मार्कण्डेय उवाच ॥३५॥
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥३६॥
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥३८॥
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥३८॥
अर्थ: मार्कण्डेय जी कहते हैं - हे विप्र! तदनन्तर वे राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य दोनों एक साथ मेधा मुनि के पास गए और उनके साथ यथायोग्य न्यायपूर्ण शिष्टाचार का पालन करके बैठ गए। फिर वे वैश्य और राजा मुनि से कुछ वार्तालाप करने लगे।
राजोवाच ॥३९॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥४०॥
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥४१॥
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥४२॥
दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥४१॥
जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥४२॥
अर्थ: राजा ने कहा - भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, वह मुझे बताइये। मेरा मन मेरे अधीन नहीं है, इसलिए राज्य छिन जाने के बाद भी मेरे मन में संपूर्ण राज्यांगों के प्रति ममता बनी हुई है, जो मेरे लिए दुःख का कारण है। हे मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि वह राज्य अब मेरा नहीं है, मैं अज्ञानियों की तरह व्यवहार क्यों कर रहा हूँ? और यह वैश्य भी अपने पुत्रों, पत्नी और सेवकों द्वारा अपमानित करके घर से निकाल दिया गया है।
स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥४३॥
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥४४॥
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥४५॥
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥४३॥
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥४४॥
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥४५॥
अर्थ: स्वजनों द्वारा त्याग दिए जाने पर भी इसके हृदय में उनके प्रति अत्यंत प्रेम है। इस प्रकार यह और मैं, दोनों ही अत्यंत दुखी हैं। जिनके दोष हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं, उन विषयों में भी हमारा मन ममता के आकर्षण से बंधा हुआ है। हे महाभाग! हम दोनों ज्ञानी हैं, फिर भी हमारे भीतर यह जो मोह उत्पन्न हो रहा है, यह क्या है? मुझमें और इसमें, दोनों में यह विवेकशून्य मूढ़ता क्यों छाई हुई है?
ऋषिरुवाच ॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥४७॥
विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् ।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥४८॥
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥४९॥
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥५०॥
विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् ।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥४८॥
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥४९॥
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥५०॥
अर्थ: महर्षि मेधा ने कहा - हे महाभाग! प्रत्येक जीव को दृश्यमान विषयों का ज्ञान होता है, और यह विषय-ज्ञान भी अलग-अलग प्रकार का होता है। कुछ प्राणी दिन में नहीं देख सकते, और कुछ प्राणी रात में नहीं देख सकते। कुछ प्राणी ऐसे भी हैं जो दिन और रात, दोनों समय समान रूप से देख सकते हैं। यह सत्य है कि मनुष्य ज्ञानी होते हैं, परंतु केवल वे ही ज्ञानी नहीं हैं। क्योंकि पशु, पक्षी, मृग आदि सभी प्राणी ज्ञानी ही हैं। जो ज्ञान मनुष्यों में है, वही ज्ञान उन पशु-पक्षियों में भी है।
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥५१॥
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥५२॥
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥५३॥
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥५१॥
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥५२॥
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥५३॥
अर्थ: मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में अन्न के दाने डाल रहे हैं। हे नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किए हुए उपकार का बदला पाने के लिए पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उनमें समझ है, तो भी वे ममता के भँवर में और मोहरूपी गड्ढे में गिराए गए हैं।
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥५४॥
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥५५॥
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥५६॥
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥५४॥
महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥५५॥
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥५६॥
अर्थ: यह भगवान विष्णु की योगनिद्रा रूपी महामाया का प्रभाव है, जो संसार की स्थिति (बनाए रखने) का कारण है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वे भगवती महामाया ही भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं, उन्हीं से यह सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं।
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥५८॥
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥५८॥
अर्थ: वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती हैं। वे ही संसार-बंधन से मुक्त करने वाली परम विद्या और सनातनी (नित्य) हैं। वे ही संसार-बंधन का कारण और सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।
राजोवाच ॥५९॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥६०॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥६२॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥६२॥
अर्थ: राजा सुरथ ने कहा— भगवन्! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? हे द्विज! वे कैसे उत्पन्न हुईं और उनका कर्म क्या है? हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! उन देवी का जैसा प्रभाव है, जैसा स्वरूप है और जिस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ है, वह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।
ऋषिरुवाच ॥६३॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥६४॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥६५॥
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥६७॥
विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥६८॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥६५॥
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥६७॥
विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥६८॥
अर्थ: महर्षि मेधा ने कहा— राजन्! वे देवी तो नित्य स्वरूपा ही हैं, उन्हीं के रूप में यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। तथापि उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से होती है, वह मुझसे सुनो। जब वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती हैं, तब उस समय लोक में वे उत्पन्न हुई कहलाती हैं, यद्यपि वे नित्य ही हैं। कल्प के अंत में जब सम्पूर्ण जगत् एकाणर्व (जलमग्न) हो रहा था और प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर असुर भगवान विष्णु के कानों के मैल से प्रकट हुए और ब्रह्माजी को मारने के लिए दौड़े।
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥६९॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥७०॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥७१॥
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥६९॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥७०॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥७१॥
अर्थ: भगवान विष्णु की नाभि-कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयंकर असुरों को अपनी ओर आते देखा और यह भी देखा कि भगवान विष्णु सो रहे हैं, तब उन्होंने एकाग्रचित्त होकर भगवान विष्णु को जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति की। वे भगवान विष्णु की अतुल तेजस्विनी भगवती निद्रा हैं, जो विश्व की ईश्वरी, जगत् को धारण करने वाली, संसार की स्थिति और संहार करने वाली हैं।
ब्रह्मोवाच (ब्रह्माकृत देवी स्तुति) ॥७२॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥७३॥
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः ॥७४॥
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ॥७५॥
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः ॥७४॥
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ॥७५॥
अर्थ: ब्रह्माजी ने कहा— देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवदायिनी सुधा (अमृत) हो। नित्य अक्षर (ॐ) में अकार, उकार और मकार—इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीनों मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, तुम्हीं सावित्री और तुम्हीं देवताओं की परम जननी हो। तुम्हीं इस विश्व को धारण करती हो, तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है।
त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥
अर्थ: हे देवि! तुम्हीं इस जगत् का पालन करती हो और कल्प के अन्त में संहार करती हो। हे जगन्मयी! जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो और अन्त में संहाररूप धारण करने वाली तुम्हीं हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी और महाअसुरी हो। तुम्हीं सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी मूल प्रकृति हो।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥
अर्थ: भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री (लक्ष्मी), तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री (लज्जा) और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ नामक अस्त्र-शस्त्रों को धारण करने वाली हो। तुम सौम्य और सौम्यतर हो, इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य और सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया ।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥८३॥
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वामस्तोतुमीश्वरः ।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया ।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥८३॥
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वामस्तोतुमीश्वरः ।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥
अर्थ: पर और अपर सभी वस्तुओं से परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। जहाँ-कहीं और जो-कुछ भी सत्-असत् वस्तु है, उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान विष्णु को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तो तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान विष्णु को तथा भगवान शंकर को भी शरीर धारण कराने वाली तुम्हीं हो। तुम इन दोनों दुर्धर्ष असुरों—मधु और कैटभ को मोह में डाल दो और जगत् के स्वामी भगवान अच्युत को शीघ्र जगा दो।
ऋषिरुवाच ॥८८॥
एवमुक्ता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ।
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ॥८९॥
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ।
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥९०॥
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ।
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ॥९१॥
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ।
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ॥९२॥
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ॥९३॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ॥८९॥
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ।
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥९०॥
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ।
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ॥९१॥
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ।
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ॥९२॥
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ।
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ॥९३॥
अर्थ: ब्रह्माजी द्वारा स्तुति किए जाने पर वे तामसी देवी भगवान विष्णु को जगाने के लिए उनके नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकलकर सामने खड़ी हो गईं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर भगवान जाग उठे। फिर उन्होंने मधु और कैटभ को देखा, जो ब्रह्माजी को खा जाने के लिए तैयार थे। तब सर्वव्यापी भगवान श्रीहरि ने उन दोनों के साथ पूरे पाँच हज़ार वर्षों तक केवल अपनी भुजाओं से घोर मल्ल-युद्ध किया।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥९४॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥९५॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥९५॥
अर्थ: वे दोनों भी अपने अत्यधिक बल के घमंड में चूर थे और महामाया ने उन्हें मोह में डाल रखा था। इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु से कहा—'हम तुम्हारे युद्ध से प्रसन्न हैं, हमसे कोई वर मांगो।'
श्रीभगवानुवाच ॥९६॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥९७॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतो मम ॥९८॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतो मम ॥९८॥
अर्थ: श्रीभगवान बोले— 'यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो, तो आज मेरे हाथों मारे जाओ। बस, इतना ही मेरा वर है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है?'
ऋषिरुवाच ॥९९॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ।
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ॥१००॥
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥१०१॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ॥१००॥
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥१०१॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं— इस प्रकार धोखे में आ जाने पर और जब उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण जगत् जलमग्न है, तब उन दोनों ने भगवान से कहा— 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, वहीं हम दोनों का वध करो।'
ऋषिरुवाच ॥१०२॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।
कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥१०३॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयं ।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥१०४॥
कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥१०३॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयं ।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥१०४॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं— 'तथास्तु' कहकर भगवान विष्णु ने उन दोनों को अपनी जाँघों पर सुलाकर सुदर्शन चक्र से उनके मस्तक काट डाले। इस प्रकार ब्रह्माजी द्वारा स्तुति किए जाने पर वे भगवती महामाया स्वयं प्रकट हुई थीं। अब फिर उन देवी का प्रभाव सुनो, वह मैं तुमसे कहता हूँ।

