॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥
अष्टमोऽध्यायः (रक्तबीज-वध)
॥ ध्यानम् ॥
ॐ अरुणकमलसंस्थां तद्रजःपुञ्जवर्णां
करकमलधृतेष्टाभीतिमुद्रां कुमारीम् ।
भवमकुटविचित्रालङ्कृतां पञ्चवक्त्रां
भैरवतनयनिलयां चिन्तये भवानीम् ॥
करकमलधृतेष्टाभीतिमुद्रां कुमारीम् ।
भवमकुटविचित्रालङ्कृतां पञ्चवक्त्रां
भैरवतनयनिलयां चिन्तये भवानीम् ॥
अर्थ: मैं भवानी देवी का ध्यान करता हूँ, जो लाल कमल के आसन पर विराजमान हैं। उनके शरीर का रंग कमल के पराग (धूलि) के समान लाल है। वे अपने कर-कमलों में इष्ट (वरमुद्रा) और अभयमुद्रा धारण किए हुए हैं। वे कुमारी रूप में हैं, भगवान शिव के मुकुट और विचित्र आभूषणों से सुशोभित हैं, उनके पाँच मुख हैं और वे भगवान भैरव (शिव) के भवन में निवास करती हैं।
ॐ ऋषिरुवाच ॥१॥
चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते ।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥२॥
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् ।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥३॥
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥४॥
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै ।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥५॥
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥२॥
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् ।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥३॥
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥४॥
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै ।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥५॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं - चण्ड और मुण्ड नामक असुरों के मारे जाने तथा बहुत सी सेना के नष्ट हो जाने पर, महाप्रतापी असुरराज शुम्भ क्रोध से पागल हो उठा। उसने दैत्यों की सम्पूर्ण सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा दे दी। उसने कहा— "आज 'उदायुध' नाम वाले छियासी (86) दैत्य-सेनापति अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर चलें। 'कम्बु' नाम वाले चौरासी (84) दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओं से घिरकर प्रस्थान करें। 'कोटिवीर्य' नाम के पचास असुर कुल और 'धौम्र' कुल के सौ असुर सेनापति मेरी आज्ञा से युद्ध के लिए निकलें।"
कालका दौर्हृदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः ।
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥६॥
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः ।
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥७॥
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् ।
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥८॥
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥६॥
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः ।
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥७॥
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् ।
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥८॥
अर्थ: "कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय नाम के सभी असुर मेरी आज्ञा से तुरंत युद्ध के लिए तैयार होकर प्रस्थान करें।" भयानक शासन करने वाला असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा देकर हज़ारों बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए निकल पड़ा। उसकी उस अत्यंत भयंकर सेना को आते देखकर चण्डिका (देवी) ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुंजा दिया।
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप ।
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चोपबृंहयत् ॥९॥
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा ।
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥१०॥
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् ।
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥११॥
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चोपबृंहयत् ॥९॥
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा ।
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥१०॥
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् ।
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥११॥
अर्थ: हे राजन्! इसके बाद देवी के वाहन सिंह ने भी अत्यंत भयंकर गर्जना की, और अम्बिका देवी ने अपने घंटे की भारी आवाज़ से उस गर्जना को और भी बढ़ा दिया। धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घंटे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएं गूंज उठीं। उसी समय अपने मुख को अत्यंत विशाल किए हुए काली ने और भी भयानक गर्जना की, जिसने उन सभी आवाज़ों को दबा दिया। इस भयानक नाद को सुनकर क्रोध में भरी हुई दैत्यों की सेना ने चारों ओर से देवी, सिंह और काली को घेर लिया।
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम् ।
भवानाममरेशानां सम्पदर्थं सुरैः सह ॥१२॥
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः ।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥१३॥
यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् ।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥१४॥
भवानाममरेशानां सम्पदर्थं सुरैः सह ॥१२॥
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः ।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥१३॥
यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् ।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥१४॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं - हे राजन्! इसी बीच, असुरों के विनाश और देवताओं के कल्याण के लिए, ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु और इन्द्र आदि देवताओं के शरीरों से उनकी 'शक्तियां' (तेज) प्रकट हुईं और देवी चण्डिका के पास आ गईं। जिस देवता का जैसा रूप, जैसे आभूषण और जैसा वाहन था, ठीक वैसे ही रूप, आभूषण और वाहन के साथ उनकी शक्ति असुरों से युद्ध करने के लिए वहाँ आ पहुँची।
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः ।
आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥१५॥
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी ।
महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥१६॥
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना ।
योद्धुमभ्याययौ दैत्यानमबिका गुहरूपिणी ॥१७॥
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता ।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥१८॥
यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः ।
शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥१९॥
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः ।
प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥२०॥
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता ।
प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥२१॥
आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥१५॥
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी ।
महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥१६॥
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना ।
योद्धुमभ्याययौ दैत्यानमबिका गुहरूपिणी ॥१७॥
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता ।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥१८॥
यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः ।
शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥१९॥
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः ।
प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥२०॥
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता ।
प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥२१॥
अर्थ: सबसे पहले हंसयुक्त विमान पर बैठी हुई, रुद्राक्ष की माला और कमण्डलु धारण किए हुए ब्रह्माजी की शक्ति प्रकट हुई, जिसे 'ब्रह्माणी' कहा जाता है। भगवान शिव की शक्ति 'माहेश्वरी' बैल पर सवार होकर आईं, उन्होंने त्रिशूल धारण किया हुआ था, उनके हाथों में बड़े-बड़े सांपों के कंगन थे और मस्तक पर चंद्रमा की रेखा सुशोभित थी। कार्तिकेय की शक्ति 'कौमारी' हाथ में शक्ति (भाला) लिए और मोर पर सवार होकर असुरों से युद्ध करने आईं। भगवान विष्णु की शक्ति 'वैष्णवी' गरुड़ पर बैठकर हाथों में शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग लिए हुए वहाँ पहुँचीं। भगवान विष्णु के यज्ञवराह रूप की शक्ति 'वाराही' भी वराह (सूअर) का शरीर धारण करके वहाँ आ गई। भगवान नृसिंह के समान रूप धारण करके 'नारसिंही' शक्ति प्रकट हुई, जो अपनी गर्दन के बालों को झटककर आकाश के तारों को भी बिखेर रही थी। इसी प्रकार इन्द्र की शक्ति 'ऐन्द्री' (इन्द्राणी) ऐरावत हाथी पर सवार होकर हाथ में वज्र लिए वहाँ पहुँची; उनके भी इन्द्र के समान हज़ार नेत्र थे।
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः ।
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याह चण्डिकाम् ॥२२॥
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा ।
चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥२३॥
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता ।
दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥२४॥
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ ।
ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥२५॥
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः ।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥२६॥
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याह चण्डिकाम् ॥२२॥
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा ।
चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥२३॥
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता ।
दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥२४॥
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ ।
ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥२५॥
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः ।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥२६॥
अर्थ: तदनन्तर, उन देव-शक्तियों से घिरे हुए भगवान शिव ने चण्डिका से कहा— "मेरी प्रसन्नता के लिए तुम इन असुरों का शीघ्र वध करो।" तभी देवी चण्डिका के शरीर से एक अत्यंत भयानक और उग्र शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों गीदड़ियों (शिवा) के समान भयंकर आवाज़ कर रही थी। उस अपराजिता शक्ति ने धुएं के समान जटाओं वाले भगवान शिव से कहा— "हे भगवन! आप मेरी ओर से दूत बनकर शुम्भ और निशुम्भ के पास जाइये। उन अत्यंत अभिमानी दानवों और वहाँ युद्ध के लिए उपस्थित अन्य सभी असुरों से कहिये कि— 'इन्द्र को तीनों लोकों का राज्य वापस मिल जाए, देवता अपने यज्ञ-भाग का उपभोग करें और यदि तुम लोग जीवित रहना चाहते हो तो पाताल लोक चले जाओ।'"
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः ।
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥२७॥
यतो नियुक्तो दूत्येन तया देव्या शिवः स्वयम् ।
शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥२८॥
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः ।
अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ॥२९॥
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥२७॥
यतो नियुक्तो दूत्येन तया देव्या शिवः स्वयम् ।
शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥२८॥
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः ।
अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ॥२९॥
अर्थ: "'और यदि अपने बल के घमंड में तुम युद्ध ही करना चाहते हो, तो आओ! मेरी ये गीदड़ियाँ (शिवाएं) तुम्हारे कच्चे मांस से अपनी भूख मिटाएँगी।'" क्योंकि उस देवी ने स्वयं भगवान शिव को दूत बनाकर भेजा था, इसलिए इस लोक में वह 'शिवदूती' के नाम से विख्यात हुईं। भगवान शिव के मुख से देवी का यह संदेश सुनकर वे महादैत्य अत्यंत क्रोधित हो उठे और जहाँ कात्यायनी देवी खड़ी थीं, वहाँ टूट पड़े।
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः ।
ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥३०॥
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् ।
चिच्छेद लीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥३१॥
तस्याग्रतस्तथा काली शूलविदारणदारुणा ।
खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरद्रणे ॥३२॥
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः ।
ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥३३॥
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी ।
दैत्यान् जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥३४॥
ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥३०॥
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् ।
चिच्छेद लीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥३१॥
तस्याग्रतस्तथा काली शूलविदारणदारुणा ।
खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरद्रणे ॥३२॥
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः ।
ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥३३॥
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी ।
दैत्यान् जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥३४॥
अर्थ: उन दैत्यों ने आते ही सबसे पहले देवी पर बाणों, शक्तियों और भालों की भारी वर्षा शुरू कर दी। लेकिन देवी ने अपने धनुष से बड़े-बड़े बाण छोड़कर असुरों के उन सभी अस्त्र-शस्त्रों को खेल-ही-खेल में काट डाला। उनके आगे काली अपने त्रिशूल से शत्रुओं को फाड़ती और खट्वांग से कुचलती हुई रणभूमि में विचर रही थीं। ब्रह्माणी जिस-जिस ओर दौड़तीं, अपने कमण्डलु का जल छिड़ककर शत्रुओं का बल और तेज नष्ट कर देती थीं। अत्यंत क्रोधित होकर माहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से और कौमारी ने अपनी शक्ति से दैत्यों का संहार करना शुरू कर दिया।
ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः ।
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥३५॥
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः ।
वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥३६॥
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् ।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगन्तरा ॥३७॥
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः ।
पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥३८॥
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥३५॥
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः ।
वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥३६॥
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् ।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगन्तरा ॥३७॥
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः ।
पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥३८॥
अर्थ: ऐन्द्री (इन्द्राणी) के वज्र प्रहार से सैकड़ों दैत्य-दानव विदीर्ण होकर खून की नदियां बहाते हुए पृथ्वी पर गिरने लगे। वाराही देवी के थूथन (तुण्ड) की मार से नष्ट होकर, उनकी दाढ़ों से छाती फटने के कारण और उनके चक्र से कटकर बहुत से राक्षस गिर पड़े। नारसिंही देवी अपने नाखूनों से असुरों को फाड़ती और भक्षण करती हुई तथा अपनी भयानक गर्जना से दिशाओं को गुंजाती हुई युद्धभूमि में घूमने लगीं। शिवदूती के प्रचंड अट्टहास से भयभीत होकर बहुत से असुर पृथ्वी पर गिर पड़े और गिरते ही शिवदूती ने उन्हें खा लिया।
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान् ।
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥३९॥
पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान् ।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥४०॥
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः ।
समुत्पतति मेदिन्यास्तत्प्रमाणो महासुरः ॥४१॥
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥३९॥
पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान् ।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥४०॥
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः ।
समुत्पतति मेदिन्यास्तत्प्रमाणो महासुरः ॥४१॥
अर्थ: इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों (देव-शक्तियों) को महादैत्यों को विविध प्रकार से कुचलते देखकर, असुरों की सेना भाग खड़ी हुई। मातृगणों से पीड़ित होकर दैत्यों को भागते देख, 'रक्तबीज' नामक महादैत्य क्रोधित होकर युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उस महासुर की यह विशेषता (वरदान) थी कि जब भी उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद पृथ्वी पर गिरती थी, तो उसी के आकार और बल वाला एक और नया महासुर उस रक्त से पैदा हो जाता था।
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः ।
ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥४२॥
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम् ।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥४३॥
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥४४॥
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः ।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥४५॥
ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥४२॥
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम् ।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥४३॥
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥४४॥
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः ।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥४५॥
अर्थ: वह महादैत्य रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्र की शक्ति (ऐन्द्री) से युद्ध करने लगा। ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज पर प्रहार किया। वज्र की चोट लगते ही उसके शरीर से बहुत सा रक्त बहने लगा, और उस रक्त से उसी के समान रूप और पराक्रम वाले अनेक नए योद्धा उत्पन्न हो गए। उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, उतने ही उसी के समान बलवान और पराक्रमी नए राक्षस पैदा हो गए। रक्त से उत्पन्न हुए वे सभी नए पुरुष भी मातृकाओं (देव-शक्तियों) के साथ अत्यंत भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से घोर युद्ध करने लगे।
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा ।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह ।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः ।
सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च खसिना ।
माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥४९॥
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह ।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः ।
सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च खसिना ।
माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥४९॥
अर्थ: जब ऐन्द्री ने पुनः वज्र का प्रहार किया, तो उसका सिर कट गया और उससे बहुत सा रक्त बहने लगा, जिससे हज़ारों नए पुरुष पैदा हो गए। वैष्णवी ने उस पर युद्ध में चक्र से प्रहार किया और ऐन्द्री ने भी उसे गदा मारी। वैष्णवी के चक्र से कटने पर रक्तबीज के शरीर से जो रक्त बहा, उससे उसी के आकार के हज़ारों महादैत्य उत्पन्न हो गए, जिनसे सारा संसार भर गया। कौमारी ने अपनी शक्ति (भाले) से, वाराही ने खड्ग से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से उस महादैत्य रक्तबीज पर प्रहार किया।
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक् ।
मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि ।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥
ततस्तेनासुरासृग्भिः सम्भूतैरसुरैर्जगत् ।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयं जग्मुरनुत्तमम् ॥५२॥
मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि ।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥
ततस्तेनासुरासृग्भिः सम्भूतैरसुरैर्जगत् ।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयं जग्मुरनुत्तमम् ॥५२॥
अर्थ: क्रोध में भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीज ने भी गदा से सभी मातृकाओं पर अलग-अलग प्रहार किया। शक्ति और त्रिशूल आदि के अनेक प्रहारों से घायल हुए रक्तबीज के शरीर से जो रक्त की धारा पृथ्वी पर गिरी, उससे सैकड़ों असुर उत्पन्न हो गए। इस प्रकार उस रक्तबीज के रक्त से पैदा हुए असुरों से सारा संसार भर गया। यह देखकर देवताओं को अत्यंत भय हुआ।
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा ।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥५३॥
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् ।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिता ॥५४॥
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान् महासुरान् ।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे ।
इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ॥५६॥
मुखेन काली जग्राह रक्तबीजस्य शोणितम् ।
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥५३॥
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् ।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिता ॥५४॥
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान् महासुरान् ।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे ।
इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ॥५६॥
मुखेन काली जग्राह रक्तबीजस्य शोणितम् ।
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥
अर्थ: देवताओं को उदास और भयभीत देखकर चण्डिका ने तुरंत काली से कहा— "हे चामुण्डे! तुम अपना मुख खूब बड़ा कर लो। मेरे शस्त्रों के प्रहार से इस महासुर के शरीर से जो भी रक्त की बूंदें गिरेंगी और उनसे जो महादैत्य उत्पन्न होंगे, उन्हें तुम तेज़ी से अपने इस विशाल मुख में लेती जाना। तुम रक्त से पैदा होने वाले महादैत्यों का भक्षण करती हुई युद्धभूमि में विचरण करो। इस प्रकार रक्त समाप्त हो जाने पर यह दैत्य स्वतः नष्ट हो जाएगा। तुम्हारे द्वारा भक्षण कर लिए जाने पर ये भयानक असुर दोबारा पैदा नहीं हो सकेंगे।" ऐसा कहकर देवी चण्डिका ने रक्तबीज पर त्रिशूल से प्रहार किया, और काली ने तुरंत अपने मुख से उसका सारा रक्त पी लिया। तब उस रक्तबीज ने गदा से चण्डिका पर प्रहार किया।
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि ।
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति ।
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ॥५९॥
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ।
देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः ॥६०॥
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ।
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ॥६१॥
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ।
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥६३॥
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति ।
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ॥५९॥
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ।
देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः ॥६०॥
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ।
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ॥६१॥
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ।
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥६३॥
अर्थ: लेकिन रक्तबीज के उस गदा-प्रहार से देवी चण्डिका को ज़रा भी कष्ट नहीं हुआ। त्रिशूल की चोट से उसके शरीर से बहुत सा रक्त बहा, लेकिन वह जहाँ-जहाँ से गिरा, चामुण्डा ने उसे अपने मुख में ले लिया। रक्त गिरने से चामुण्डा के मुख के अंदर ही जो महादैत्य पैदा हुए, उन्हें भी वे खा गईं और उसका सारा रक्त पी गईं। इस प्रकार चामुण्डा द्वारा रक्त पी लिए जाने पर, देवी चण्डिका ने उस रक्तबीज को त्रिशूल, वज्र, बाणों, तलवारों और भालों से मार डाला। हे राजन्! देवी के अस्त्र-शस्त्रों से छलनी और रक्तहीन (बिना खून का) होकर वह महादैत्य रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। हे राजन्! तब सभी देवताओं को अत्यंत हर्ष प्राप्त हुआ और देव-शक्तियों का वह मातृगण असुरों का रक्त पीने के मद (नशे) में उद्दंड होकर नाचने लगा।
