देवी कवच | दुर्गा सप्तशती | श्लोक और हिन्दी अनुवाद के साथ | Devi kavach

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

श्री देव्याः कवचम् (सम्पूर्ण)
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
अर्थ: ॐ. इस श्री चण्डी कवच के ब्रह्मा ऋषि हैं, अनुष्टुप् छंद है, चामुण्डा देवता हैं, अंगन्यास में बताई गई माताएं बीज हैं, दिग्बन्ध (दिशाओं को बांधने वाली) देवता तत्त्व हैं और श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसके जप का विनियोग (प्रयोग) किया जाता है।
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
मार्कण्डेय उवाच ॥
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥१॥
अर्थ: मार्कण्डेय जी ने कहा - "हे पितामह (ब्रह्माजी)! संसार में जो परम गोपनीय है, जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो आपने अब तक किसी को नहीं बताया है, वह रहस्य मुझे बताइये।"
ब्रह्मोवाच ॥
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥२॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥४॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥५॥
अर्थ: ब्रह्माजी बोले - "हे विप्र! हे महामुने! सभी प्राणियों का उपकार करने वाला और अत्यंत गोपनीय देवी का वह पवित्र कवच मैं बताता हूँ, उसे सुनो। प्रथम 'शैलपुत्री', दूसरी 'ब्रह्मचारिणी', तीसरी 'चन्द्रघण्टा', चौथी 'कूष्माण्डा', पाँचवीं 'स्कन्दमाता', छठी 'कात्यायनी', सातवीं 'कालरात्रि', आठवीं 'महागौरी' और नवीं 'सिद्धिदात्री' हैं। ये नवदुर्गा कहलाती हैं। ये नाम स्वयं महात्मा वेद-भगवान् (ब्रह्मा) द्वारा बताए गए हैं।"
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥६॥

न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥७॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥८॥
अर्थ: "जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, युद्ध भूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम और दुर्गम संकट में फंस गया हो और भयभीत होकर देवी की शरण में आ गया हो, रण-संकट में उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता। मैं उसे किसी विपत्ति, शोक, दुःख या भय में फंसा हुआ नहीं देखता। जो लोग भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही वृद्धि होती है। हे देवेश्वरि! जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, तुम उनकी रक्षा करती हो, इसमें कोई संदेह नहीं है।"
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥९॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥१०॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥
अर्थ: "चामुण्डा देवी प्रेत पर विराजमान हैं, वाराही भैंसे पर बैठी हैं। ऐन्द्री (इन्द्राणी) हाथी पर सवार हैं, वैष्णवी गरुड़ पर आसीन हैं। माहेश्वरी बैल पर सवार हैं, कौमारी का वाहन मोर है। भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और उनके हाथों में कमल है। श्वेतरूप धारण करने वाली ईश्वरी (पार्वती) देवी बैल पर सवार हैं। ब्राह्मी हंस पर सवार हैं और सभी आभूषणों से सुशोभित हैं। ये सभी माताएं सभी प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं, अनेक प्रकार के आभूषणों से सजी हुई हैं और नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।"
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥१३॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥१४॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥१५॥
अर्थ: "ये सभी देवियां क्रोध में भरकर रथों पर सवार दिखाई देती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करने के लिए, भक्तों को अभय देने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए ये अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मूसल, ढाल, तोमर, फरसा, पाश, कुंत, त्रिशूल और श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष आदि अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।"
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥१७॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ॥१८॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ॥१९॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥२०॥
अर्थ: "महान भयंकर रूप वाली, अत्यंत घोर पराक्रम वाली, महान बल और उत्साह वाली तथा बड़े-बड़े भयों का नाश करने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। हे शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली और जिनकी ओर देखना भी कठिन है, ऐसी देवि! आप मेरी रक्षा करें। पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्राणी) मेरी रक्षा करें, आग्नेय कोण में अग्निदेवता, दक्षिण दिशा में वाराही और नैऋत्य कोण में खड्गधारिणी रक्षा करें। पश्चिम में वारुणी और वायव्य कोण में मृगवाहिनी मेरी रक्षा करें। उत्तर में कौमारी और ईशान कोण में त्रिशूलधारिणी रक्षा करें। ऊपर की ओर ब्रह्माणी और नीचे की ओर वैष्णवी मेरी रक्षा करें। इसी प्रकार शव को वाहन बनाने वाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।"
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥२१॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥२२॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥२३॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥२४॥
अर्थ: "बाईं ओर अजिता और दाईं ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा (चोटी) की रक्षा करें और उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करें। ललाट (माथे) की रक्षा मालाधरी और दोनों भौहों की रक्षा यशस्विनी करें। भौहों के बीच में त्रिनेत्रा और नासिका (नाक) में यमघण्टा रक्षा करें। दोनों नेत्रों के बीच शंखिनी और दोनों कानों में द्वारवासिनी रक्षा करें। कालिका दोनों गालों की और शांकरी कानों के मूल भाग की रक्षा करें। नासिका के छिद्रों की सुगन्धा, ऊपर के होंठ की चर्चिका, नीचे के होंठ की अमृतकला और जीभ की रक्षा सरस्वती देवी करें।"
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥२६॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू रक्षेद् वज्रधारिणी ॥२७॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८॥
अर्थ: "कौमारी दांतों की और चण्डिका कंठ (गले) की रक्षा करें। चित्रघण्टा गले की घंटी (काकल) की और महामाया तालू की रक्षा करें। कामाक्षी ठोड़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें। भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी रीढ़ की हड्डी की रक्षा करें। कंठ के बाहरी भाग की नीलग्रीवा और गले की नली की नलकूबरी रक्षा करें। खड्गिनी दोनों कंधों की और वज्रधारिणी मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें। दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिका उंगलियों की रक्षा करें। शूलेश्वरी नाखूनों की और कुलेश्वरी मेरे पेट की रक्षा करें।"
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥२९॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥३३॥
अर्थ: "महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी मन की रक्षा करें। ललिता देवी हृदय की और शूलधारिणी उदर (पेट) की रक्षा करें। कामिनी नाभि की और गुह्येश्वरी गुह्य भाग की रक्षा करें। पूतना और कामिका लिंग की तथा महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें। भगवती कमर की और विंध्यवासिनी दोनों घुटनों की रक्षा करें। सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण करने वाली महाबला देवी दोनों पिंडलियों की रक्षा करें। नारसिंही दोनों टखनों की और तैजसी पैरों के पिछले भाग की रक्षा करें। श्री देवी पैरों की उंगलियों की और तलवासिनी पैरों के तलवों की रक्षा करें। दंष्ट्राकराली नाखूनों की, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की, कौबेरी रोमछिद्रों की और वागीश्वरी त्वचा (खाल) की रक्षा करें।"
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिर्श्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥३४॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥३५॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मचारिणी ॥३६॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥३७॥
अर्थ: "पार्वती देवी मेरे रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें। कालरात्रि आंतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें। पद्मावती मूलाधार कमल (पद्मकोश) की और चूड़ामणि कफ की रक्षा करें। ज्वालामुखी नखों के तेज की और अभेद्या देवी शरीर की सभी संधियों (जोड़ों) की रक्षा करें। ब्रह्माणी वीर्य की और छत्रेश्वरी छाया की रक्षा करें। धर्मचारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें। हाथ में वज्र धारण करने वाली कल्याणशोभना देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान (पांचों प्राण वायु) की रक्षा करें।"
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥३८॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥३९॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥४०॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥४१॥
अर्थ: "योगिनी देवी रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श (इन पांच विषयों) की रक्षा करें और नारायणी देवी सदा मेरे सत्त्व, रज और तम गुणों की रक्षा करें। वाराही आयु की, वैष्णवी धर्म की और चक्रिणी (चक्रधारिणी) यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें। इन्द्राणी मेरे गोत्र की और हे चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करें। सुपथा मेरे पथ (यात्रा) की और क्षेमकरी मार्ग की रक्षा करें। राजदरबार में महालक्ष्मी और सब ओर व्याप्त विजया देवी मेरी सभी जगह रक्षा करें।"
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥४२॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥४३॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ॥४४॥

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ॥४५॥
अर्थ: "हे पापनाशिनी जयन्ती देवि! जो भी स्थान कवच में छूट गया हो या रक्षा से रहित हो, उस सबकी रक्षा आप करें। मनुष्य यदि अपना कल्याण चाहता है, तो इस कवच के बिना एक कदम भी न चले। जो व्यक्ति इस कवच से सुरक्षित होकर जहाँ-जहाँ भी जाता है, उसे वहाँ धन का लाभ होता है और उसकी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली विजय प्राप्त होती है। वह जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, उसे वह निश्चित रूप से मिल जाती है। ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर अतुलनीय महान ऐश्वर्य प्राप्त करता है। वह निडर हो जाता है और युद्ध में कभी पराजित नहीं होता।"
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतो पुमान् ।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ॥४६॥

यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ॥४७॥

जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ॥४८॥

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ॥४९॥
अर्थ: "कवच से सुरक्षित मनुष्य तीनों लोकों में पूजनीय हो जाता है। देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है। जो मनुष्य प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसमें देवी की कला (शक्ति) का संचार हो जाता है और वह तीनों लोकों में अजेय हो जाता है। वह अकाल मृत्यु से बचकर पूरे सौ वर्षों तक जीवित रहता है। उसे मकरी (लूता), चेचक (विस्फोटक) आदि सभी बीमारियां नष्ट हो जाती हैं। स्थावर (पेड़-पौधों का), जंगम (सांप-बिच्छू आदि का) और कृत्रिम (बनाया हुआ) सभी प्रकार का विष, तथा पृथ्वी पर होने वाले सभी मारण-मोहन आदि तांत्रिक प्रयोग और मंत्र-यंत्र नष्ट हो जाते हैं।"
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः ।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ॥५०॥

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥५१॥

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ॥५२॥

मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।
यशसा वर्द्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ॥५३॥
अर्थ: "पृथ्वी पर, आकाश में और जल में विचरने वाले प्राणी, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले देवता, जन्म से साथ उत्पन्न होने वाले, कुल देवता, माला (कंठ की माला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अंतरिक्ष में घूमने वाली अत्यंत बलवान और भयंकर डाकिनियां, बुरे ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारी शक्तियां—हृदय में इस कवच के धारण करते ही (उस मनुष्य को देखते ही) नष्ट हो जाती हैं। राजा से उसे सम्मान और उन्नति प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज को बढ़ाने वाला है। वह मनुष्य इस पृथ्वी पर अपनी यश और कीर्ति से सुशोभित होकर वृद्धि प्राप्त करता है।"
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ॥५४॥

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ॥५५॥

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥५६॥
अर्थ: "मनुष्य को चाहिए कि वह पहले कवच का पाठ करके ही सप्तशती (चण्डी) का जप (पाठ) करे। जब तक यह पृथ्वी पहाड़ों और जंगलों सहित टिकी रहती है, तब तक उस मनुष्य की पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा इस धरती पर बनी रहती है। देह त्यागने (मृत्यु) के पश्चात् वह मनुष्य महामाया भगवती की कृपा से उस परम स्थान (मोक्ष) को प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह सुंदर रूप प्राप्त करके सदा भगवान शिव के साथ आनंद भोगता है।"

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!