Grahan Sutak Niyam: सूर्य और चंद्र ग्रहण में क्या करें और क्या न करें? (शास्त्रों के अनुसार)

Sooraj Krishna Shastri
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ग्रहण में विधिनिषेध

"सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान शास्त्रों में वर्णित सूतक नियम, वर्जित कर्म और प्रायश्चित"

⏳ 1. सूतक काल और भोजन के नियम

सूर्यग्रहे तु नाश्नीयात् पूर्वं यामचतुष्टयम् ।
चन्द्रग्रहे तु यामाँस्त्रीन् बालवृध्दातुरैर्विना।।
अर्थ: सूर्यग्रहण में चार पहर (लगभग 12 घंटे) पहले और चन्द्रग्रहण में तीन पहर (लगभग 9 घंटे) पहले से ही भोजन नहीं करना चाहिए। इस नियम में वृद्ध, बालक और रोगी (आतुर) को छूट दी गई है।

शास्त्रों (विष्णुधर्म) के अनुसार, जब चंद्र या सूर्य ग्रहण हो, तो एक दिन-रात भोजन नहीं करना चाहिए। जब राहु से मुक्ति मिल जाए (अर्थात ग्रहण समाप्त हो जाए), तब दर्शन करके और स्नान करने के पश्चात ही अपने घर का ताजा बना हुआ भोजन करना चाहिए।

📿 2. ग्रहण काल में क्या करें?

सूर्येन्दुग्रहणे यावत् तावत् कुर्याज्जपादिकम् ।
न स्वपेन्न च भुञ्जीत स्नात्वा भुञ्जीत मुक्तयोः।।
अर्थ: जब तक सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण लगा रहे, तब तक ईष्ट देव का ध्यान और जपादि (मन्त्र जाप) करते रहें। इस दौरान न तो सोएं और न ही भोजन करें। ग्रहण से मुक्ति होने पर स्नान करके ही भोजन ग्रहण करें।

🚫 3. ग्रहण में वर्जित कर्म और उनके दुष्परिणाम

ग्रहण के दौरान वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव सबसे अधिक होता है। शास्त्रों में कुछ विशेष कार्यों को पूर्णतः वर्जित माना गया है। श्लोक के अनुसार:

निद्रायां जायते रोगो मूत्रे दारिद्र्यमाप्नुयात्।
पुरीषे कृमियोनिः स्यान्मैथुने ग्रामसूकरः।।
अभ्यङ्गे च भवेत्कुष्ठी भोजने स्यादधोगतिः।
वञ्चने च भवेत्सर्पो वधे च नरकं व्रजेत् ।।

उपरोक्त श्लोक के अनुसार ग्रहण काल में किए गए वर्जित कर्मों के निम्नलिखित परिणाम भुगतने पड़ते हैं:

😴 निद्रा (सोना): रोग की उत्पत्ति होती है।
💧 मूत्र त्याग: दरिद्रता (गरीबी) आती है।
🚽 पुरीष (मल त्याग): कृमियोनि (कीड़े की योनि) प्राप्त होती है।
👩‍❤️‍👨 मैथुन: ग्रामसूकर (सूअर) की योनि मिलती है।
🧴 अभ्यंग (उबटन/तेल मालिश): कुष्ठ रोग होने का भय रहता है।
🍲 भोजन करना: अधोगति (पतन) होती है।
🤥 ठगना (धोखा देना): सर्प योनि प्राप्त होती है।
🗡️ वध (हिंसा करना): नरक या घोर बंधन की प्राप्ति होती है।

🌿 4. सूतक में पके हुए अन्न और भोजन की शुद्धि

सर्वेषामेव वर्णानां सूतकं राहुदर्शने।
अन्नं पक्वमिह त्याज्यं ... तिलदर्भैर्न दुष्यति।।

ग्रहण (राहु दर्शन) के समय सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) को सूतक लगता है।

  • पक्वान्न का त्याग: ग्रहण से पहले जो भी पक्वान्न (पका हुआ बासी भोजन) बन गया हो, उसे त्याग देना चाहिए। मिताक्षरा में भी इसे दूषित माना गया है।
  • कुशा और तिल का प्रयोग: मन्वर्थमुक्तावली के अनुसार जल, दूध, मट्ठा (छाछ), और कन्द आदि वस्तुओं में यदि तिल और कुशा (दर्भ) डाल दी जाए, तो वे वस्तुएं ग्रहण के प्रभाव से दूषित नहीं होती हैं।

🌊 5. स्नान का महत्व और प्रायश्चित

गङ्गास्नानं तु कुर्वीत ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।
चन्द्र और सूर्य के ग्रहण में गंगा स्नान का सर्वाधिक महत्व है। सूर्यग्रहण में प्रथम कुरुक्षेत्र, तदनन्तर कनखल (हरिद्वार), उसके बाद प्रयागराज का महत्व है। यदि गंगा उपलब्ध न हो, तो अन्य महानदियों या पास की किसी नदी/सरोवर में विधिपूर्वक स्नान अवश्य करना चाहिए। स्नान सवस्त्र (कपड़ों सहित) करना चाहिए।

प्रायश्चित (माधवीय के अनुसार): यदि कोई व्यक्ति अज्ञानतावश या भूल से चंद्र या सूर्य ग्रहण के दौरान भोजन कर लेता है, तो उसे शुद्धि के लिए 'प्राजापत्य व्रत' का प्रायश्चित करना पड़ता है। (चन्द्रसूर्यग्रहे भुक्त्वा प्राजापत्येन शुध्यति)

।। धर्मो रक्षति रक्षितः ।।

ग्रहण काल वह समय है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा में उथल-पुथल होती है। हमारे ऋषियों ने जो विधिनिषेध बनाए हैं, वे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से हमारी रक्षा के लिए ही हैं। इस समय का उपयोग केवल ईश्वर के नाम स्मरण में करना चाहिए।

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