जश्त्व सन्धि | Jashatva Sandhi

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

जश्त्व सन्धि (Jaśtva Sandhi)

व्यंजन (हल्) सन्धि का सर्वाधिक प्रयुक्त नियम: 'झलां जशोऽन्ते' (पदान्त) और 'झलां जश् झशि' (अपदान्त) का सम्पूर्ण विवेचन।

परिभाषा: 'जश्त्व' का शाब्दिक अर्थ है — 'जश्' (ज्, ब्, ग्, ड्, द्) हो जाना। जब सन्धि करते समय प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ वर्णों (झल्) के स्थान पर उसी वर्ग का 'तृतीय वर्ण' (3rd Letter) आदेश हो जाता है, तो उसे 'जश्त्व सन्धि' कहते हैं। संस्कृत व्याकरण में इसके दो प्रमुख भेद हैं: १. पदान्त जश्त्व और २. अपदान्त जश्त्व

१. पदान्त जश्त्व सन्धि (Padanta Jashatva)

जब यह सन्धि किसी सार्थक पद (Word) के अन्त में होती है, तो उसे पदान्त जश्त्व कहते हैं।

सूत्र: झलां जशोऽन्ते (८.२.३९)

सूत्र विच्छेद: झलाम् + जशः + अन्ते।
अर्थ (नियम): यदि किसी पद के अन्त में (पदान्ते) 'झल्' प्रत्याहार (वर्गों के १, २, ३, ४ वर्ण और श्, ष्, स्, ह्) का कोई वर्ण आए, तो उसके स्थान पर 'जश्' प्रत्याहार (उसी वर्ग का तृतीय वर्ण अर्थात् ग्, ज्, ड्, द्, ब्) हो जाता है।
(विशेष: इसके बाद कोई भी स्वर या व्यंजन हो, या कुछ भी न हो, तो भी पद के अन्त में जश्त्व हो ही जाता है।)
परिवर्तन का क्रम (१ ➔ ३):
  • क्, ख्, ग्, घ् ➔ ग्
  • च्, छ्, ज्, झ् ➔ ज्
  • ट्, ठ्, ड्, ढ् ➔ ड्
  • त्, थ्, द्, ध् ➔ द्
  • प्, फ्, ब्, भ् ➔ ब्
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (V.V.Imp):
वाक् + ईशः = वागीशः (वाणी का स्वामी)। (यहाँ 'वाक्' पद के अन्त में 'क्' (१ला वर्ण) है, जो अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण 'ग्' में बदल गया)।
जगत् + ईशः = जगदीशः (त् ➔ द्)।
सुप् + अन्तः = सुबन्तः (प् ➔ ब्)।
दिक् + अम्बरः = दिगम्बरः (क् ➔ ग्)।
अच् + अन्तः = अजन्तः (च् ➔ ज्)।
सत् + आचारः = सदाचारः (त् ➔ द्)।

२. अपदान्त जश्त्व सन्धि (Apadanta Jashatva)

जब यह सन्धि किसी पद के बीच में (धातु या प्रत्यय जोड़ते समय) होती है, तो उसे अपदान्त जश्त्व कहते हैं।

सूत्र: झलां जश् झशि (८.४.५३)

सूत्र विच्छेद: झलाम् + जश् + झशि।
अर्थ (नियम): यदि 'झल्' (१, २, ३, ४ वर्ण) के बाद 'झश्' (वर्गों के तीसरे या चौथे वर्ण) आ जाएँ, तो पहले वाले 'झल्' के स्थान पर 'जश्' (तृतीय वर्ण) हो जाता है।
(सरल शब्दों में: पद के बीच में यदि चौथे वर्ण के बाद तीसरा/चौथा वर्ण आए, तो पहला वाला वर्ण अपने वर्ग का तीसरा बन जाता है।)
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (TGT/PGT Special):
बुध् + धिः = बुद्धिः। (यहाँ 'बुध्' धातु के चौथे वर्ण 'ध्' के बाद प्रत्यय का चौथा वर्ण 'ध्' आया। अतः पहला 'ध्' अपने वर्ग के तीसरे वर्ण 'द्' में बदल गया ➔ बु + द् + धिः)।
क्रुध् + धः = क्रुद्धः (क्रोधित)। (ध् ➔ द्)।
दुह् + धम् = दुग्धम् (दूध)। (यहाँ 'ह्' का पहले 'घ्' बनता है, फिर जश्त्व होकर 'ग्' बनता है)।
लभ् + धम् = लब्धम् (प्राप्त किया)। (भ् ➔ ब्)।

३. पदान्त और अपदान्त जश्त्व में अन्तर

  • पदान्त (झलां जशोऽन्ते): यह शब्द के बिल्कुल अन्त में लगता है (जैसे वाक्, जगत्)। इसके बाद कोई भी स्वर या व्यंजन हो सकता है। यहाँ सन्धि के बाद प्रायः एक पूर्ण शब्द दूसरे पूर्ण शब्द से जुड़ता है।
  • अपदान्त (झलां जश् झशि): यह शब्द के बीच में लगता है (जैसे बुध्+धिः)। इसके लिए यह अनिवार्य शर्त है कि बाद में केवल 'झश्' (तीसरा या चौथा वर्ण) ही होना चाहिए।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
  • जश्त्व का अर्थ: प्रथम, द्वितीय या चतुर्थ वर्ण का तृतीय वर्ण (३) में बदलना। (क् ➔ ग्, त् ➔ द्)।
  • पदान्त सूत्र: झलां जशोऽन्ते (वागीशः, जगदीशः)।
  • अपदान्त सूत्र: झलां जश् झशि (बुद्धिः, लब्धम्)।
  • पहचान: शब्द के सन्धि-स्थल पर सदैव ग्, ज्, ड्, द्, ब् में से कोई एक वर्ण दिखाई देता है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!