श्रीमद्भागवत महापुराण का दशम स्कंध भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का साक्षात महासागर है। इसी स्कंध में परब्रह्म परमात्मा के उस सगुण साकार रूप का प्राकट्य होता है, जो भक्तों के हृदय का स्पंदन है। द्वापर युग के अंत में जब यह धरती पाप के बोझ से कराह उठी, तब धर्म की स्थापना, साधुओं की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए साक्षात नारायण ने अवतार लेने का निश्चय किया। यह महागाथा इसी अलौकिक अवतार की पृष्ठभूमि और उस परम शुभ घड़ी का वर्णन करती है।
द्वापर युग के अंतिम चरण में कंस, जरासंध, शिशुपाल और भौमासुर (नरकासुर) जैसे अनेक क्रूर और अभिमानी दैत्यों ने राजाओं का रूप धारण कर लिया था। इन अधर्मी राजाओं की विशाल सेनाओं और उनके पापों के भार से माता पृथ्वी अत्यंत दुःखी हो उठीं।
आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ ॥
(श्रीमद्भागवत 10.1.17)
माता पृथ्वी की आँखों से आँसू बह रहे थे। उनकी करुण पुकार सुनकर ब्रह्मा जी, भगवान शिव और समस्त देवताओं को साथ लेकर क्षीरसागर (क्षीर समुद्र) के तट पर गए। वहाँ जाकर ब्रह्मा जी ने पूर्ण एकाग्रता के साथ 'पुरुष सूक्त' के मंत्रों द्वारा भगवान नारायण की स्तुति की। कुछ ही क्षणों बाद, ब्रह्मा जी ने समाधि में एक आकाशवाणी सुनी। उन्होंने देवताओं से कहा— "भगवान ने पृथ्वी का दुःख जान लिया है। वे बहुत शीघ्र वसुदेव के घर 'मथुरा' में अवतार लेने वाले हैं। तब तक तुम सभी देवता भी यदुवंश में अवतार लेकर भगवान की लीला में उनकी सहायता करो।"
मथुरा में राजा उग्रसेन का शासन था। उनका पुत्र 'कंस' अत्यंत क्रूर और शक्तिशाली था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। जब देवकी का विवाह शूरसेन के पुत्र वसुदेव जी के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ, तो कंस अपनी बहन को विदा करने के लिए स्वयं उनके रथ का सारथी बन गया और घोड़ों की रास अपने हाथों में ले ली।
मार्ग में सब लोग अत्यंत प्रसन्न थे, तभी अचानक आकाश में मेघों की गड़गड़ाहट के साथ एक भयंकर 'आकाशवाणी' हुई:
यह आकाशवाणी सुनते ही कंस का सारा प्रेम और वात्सल्य क्रोध में बदल गया। उसने एक हाथ से देवकी के बाल पकड़ लिए और दूसरे हाथ से अपनी तलवार निकाल कर उसे मारने के लिए तैयार हो गया। तब वसुदेव जी ने अत्यंत धैर्य और कूटनीति से काम लिया। उन्होंने कंस को समझाया और प्रतिज्ञा की— "हे कंस! तुम्हें देवकी से कोई भय नहीं है, भय तो इसके पुत्रों से है। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि देवकी के गर्भ से जो भी संतान उत्पन्न होगी, मैं जन्म लेते ही उसे तुम्हें सौंप दूँगा।" वसुदेव जी के सत्य पर कंस को विश्वास था, इसलिए उसने देवकी को छोड़ दिया।
कुछ समय पश्चात जब देवकी ने प्रथम पुत्र (कीर्तिमान) को जन्म दिया, तो वसुदेव जी अपने वचन के अनुसार उसे कंस के पास ले गए। पहले तो कंस ने बच्चे को लौटा दिया कि मुझे आठवें से भय है, परंतु उसी समय देवर्षि नारद जी वहाँ आए। नारद जी ने कंस को बताया कि यदुवंश में सब देवता जन्म ले रहे हैं और भगवान कभी भी आ सकते हैं।
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागार (जेल) में डाल दिया और उनके हाथों और पैरों में भारी बेड़ियाँ पहना दीं। इसके बाद कंस ने अत्यंत निर्दयता से देवकी के छह नवजात शिशुओं (षड्गर्भ) को एक-एक करके पत्थर पर पटक कर मार डाला।
जब देवकी के गर्भ में सातवाँ पुत्र आया, तो भगवान ने अपनी 'योगमाया' को आदेश दिया कि वह देवकी के गर्भ को आकर्षित करके नंदबाबा के गोकुल में माता रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दे। यही सातवें गर्भ से श्री बलराम जी (संकर्षण) का जन्म हुआ। और कारागार में यह प्रचारित हो गया कि देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया है।
अंततः वह परम शुभ घड़ी आ गई। भाद्रपद (भादों) मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, घोर अंधकारमयी अर्धरात्रि और 'रोहिणी नक्षत्र' का उदय हुआ। दिशाएं अत्यंत शांत और प्रसन्न हो गईं। देवकी के गर्भ से स्वयं परब्रह्म भगवान वैसे ही प्रकट हुए, जैसे पूर्व दिशा में पूर्ण चंद्रमा प्रकट होता है। परंतु भगवान का यह जन्म किसी साधारण शिशु की तरह नहीं हुआ था।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.9)
साक्षात भगवान नारायण को अपने पुत्र के रूप में देखकर वसुदेव और देवकी के हर्ष का कोई ठिकाना न रहा। उनकी बेड़ियाँ स्वतः ही ढीली पड़ गईं। वसुदेव और देवकी ने हाथ जोड़कर भगवान की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति की। माता देवकी ने कहा— "हे प्रभो! कंस बहुत दुष्ट है। यदि उसे पता चल गया कि आपने जन्म लिया है, तो वह आ जाएगा। कृपा करके आप अपने इस चतुर्भुज (अलौकिक) रूप को छिपा लीजिए और एक साधारण शिशु बन जाइए।"
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा— "माता-पिता! पूर्व जन्म (सुतपा और पृश्नि के रूप में) में आपकी घोर तपस्या के कारण मैंने तीन बार आपके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था। मैं वही वामन और राम अवतार हूँ, जो अब कृष्ण रूप में आया हूँ। पिताजी! आप मुझे इसी समय गोकुल में नंदबाबा के घर ले जाइए। वहाँ अभी-अभी माता यशोदा के गर्भ से मेरी 'योगमाया' ने कन्या के रूप में जन्म लिया है। आप मुझे वहाँ रख दीजिए और उस कन्या को यहाँ ले आइए।"
इस प्रकार, साक्षात परब्रह्म परमात्मा अपने परम धाम को छोड़कर ब्रजवासियों को आनंद देने और कंस का वध करने के लिए गोकुल (नंद-भवन) पहुँच गए।

