परसवर्ण सन्धि | Parasavarna Sandhi

Sooraj Krishna Shastri
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परसवर्ण सन्धि (Parasavarṇa Sandhi)

अनुस्वार सन्धि का पूरक नियम: 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः' (नित्य) और 'वा पदान्तस्य' (विकल्प) का सम्पूर्ण विवेचन।

परिभाषा: 'परसवर्ण' का शाब्दिक अर्थ है — बाद वाले वर्ण (पर) के समान (सवर्ण) हो जाना। अनुस्वार सन्धि में जो 'बिन्दी' (ं) बनती है, वह बिन्दी आगे आने वाले व्यंजन को देखकर उसी के वर्ग के पाँचवें अक्षर (पञ्चमाक्षर) में बदल जाती है। इसे ही 'परसवर्ण सन्धि' कहते हैं।

१. अपदान्त परसवर्ण सन्धि (नित्य)

यदि अनुस्वार (ं) किसी शब्द के बीच में (अपदान्त) हो, तो यह सन्धि नित्य (अनिवार्य) रूप से होती है।

सूत्र: अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (८.४.५८)

सूत्र विच्छेद: अनुस्वारस्य + ययि + परसवर्णः।
अर्थ (नियम): यदि अनुस्वार (ं) के बाद 'यय्' प्रत्याहार (श्, ष्, स्, ह् को छोड़कर शेष सभी व्यंजन) का कोई वर्ण आए, तो अनुस्वार के स्थान पर आगे आने वाले वर्ण का परसवर्ण (उसी वर्ग का पञ्चमाक्षर ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) हो जाता है।
परिवर्तन का क्रम (अनुस्वार 'ं' किसमें बदलता है?):
  • ं + कवर्ग (क्, ख्, ग्, घ्) ➔ ङ्
  • ं + चवर्ग (च्, छ्, ज्, झ्) ➔ ञ्
  • ं + टवर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्) ➔ ण्
  • ं + तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्) ➔ न्
  • ं + पवर्ग (प्, फ्, ब्, भ्) ➔ म्
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (V.V.Imp):
अं + कितः = अङ्कितः। (यहाँ अनुस्वार के बाद 'क्' (कवर्ग) है, अतः अनुस्वार कवर्ग के पञ्चमाक्षर 'ङ्' में बदल गया)।
मुं + चति = मुञ्चति (छोड़ता है)। (चवर्ग का 'ञ्')
कुं + ठितः = कुण्ठितः। (टवर्ग का 'ण्')
शं + तः = शान्तः। (तवर्ग का 'न्')
कं + पते = कम्पते (काँपता है)। (पवर्ग का 'म्')

२. पदान्त परसवर्ण सन्धि (विकल्प)

यदि अनुस्वार (ं) किसी पूर्ण पद के अन्त में (पदान्त) हो, तो यह सन्धि विकल्प (Optional) से होती है। अर्थात् आप चाहें तो परसवर्ण करें, या अनुस्वार (ं) ही रहने दें; दोनों रूप शुद्ध माने जाएँगे।

सूत्र: वा पदान्तस्य (८.४.५९)

सूत्र विच्छेद: वा + पदान्तस्य। (पिछले सूत्र से 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः' की अनुवृत्ति आती है)।
अर्थ (नियम): यदि पद के अन्त में स्थित अनुस्वार (ं) के बाद 'यय्' प्रत्याहार आए, तो अनुस्वार को विकल्प से (वा) परसवर्ण होता है।
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (TGT/PGT Special):
त्वं + करोषि = त्वङ्करोषि (परसवर्ण पक्ष) / त्वं करोषि (अनुस्वार पक्ष)।
(यहाँ 'त्वम्' एक पूर्ण पद है, अतः 'त्वङ्करोषि' और 'त्वं करोषि' दोनों ही व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हैं)।

ग्रामं + गच्छति = ग्रामङ्गच्छति / ग्रामं गच्छति।
शत्रुं + जयति = शत्रुञ्जयति / शत्रुं जयति।
सम्यक् + च = सम्यञ्च / सम्यं च।

३. नित्य और विकल्प में अन्तर (भ्रम निवारण)

प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि कहाँ नित्य (अनिवार्य) करना है और कहाँ विकल्प। इसे ध्यान से समझें:
  • यदि शब्द अखण्ड है (बीच से तोड़ा नहीं जा सकता), तो वहाँ 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः' से नित्य परसवर्ण होगा। (जैसे: शान्तः को 'शांतः' लिखना संस्कृत व्याकरण में अशुद्ध है, 'शान्तः' ही शुद्ध है)।
  • यदि दो अलग-अलग पूर्ण पद हैं (जैसे हरिं वन्दे या त्वं करोषि), तो वहाँ 'वा पदान्तस्य' से विकल्प रहेगा। (आप त्वं करोषि भी लिख सकते हैं और त्वङ्करोषि भी)।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
  • परसवर्ण का अर्थ: अनुस्वार (ं) का आगे वाले वर्ण के पञ्चमाक्षर (५) में बदल जाना।
  • नित्य सूत्र: अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः। (अपदान्त में, जैसे- अङ्कितः, शान्तः, मुञ्चति)
  • विकल्प सूत्र: वा पदान्तस्य। (पदान्त में, जैसे- त्वङ्करोषि / त्वं करोषि)
  • विशेष: 'यय्' प्रत्याहार में श्, ष्, स्, ह् नहीं आते। अतः 'हंसः', 'वंशः' में अनुस्वार ही रहता है, परसवर्ण नहीं होता।

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