संस्कृत व्याकरण की प्रमुख संज्ञाएँ | Sangya Prakaran

Sooraj Krishna Shastri
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व्याकरण की प्रमुख संज्ञाएँ (संज्ञा प्रकरणम्)

संस्कृत व्याकरण में प्रयुक्त होने वाले महत्त्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दों (इत्, लोप, सवर्ण, पद आदि) का पाणिनीय सूत्रों सहित सम्पूर्ण विवेचन।

संज्ञा किसे कहते हैं? महर्षि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में बड़े-बड़े नियमों को संक्षेप में कहने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दों का निर्माण किया, जिन्हें 'संज्ञा' (Technical Terms) कहा जाता है। जैसे आधुनिक विज्ञान में फॉर्मूले (Formula) होते हैं, वैसे ही संस्कृत व्याकरण में ये संज्ञाएँ कार्य करती हैं।

📚 प्रमुख पाणिनीय संज्ञाएँ एवं सूत्र

१. इत् संज्ञा (It Sangya - अनुबंध)

प्रमुख सूत्र: हलन्त्यम् (१.३.३)

अर्थ: उपदेश की अवस्था में जो अंतिम हल् (व्यंजन) होता है, उसकी 'इत्' संज्ञा होती है। (इसके अतिरिक्त उपदेशेऽजनुनासिक इत्, चुटू, लशक्वतद्धिते आदि सूत्र भी इत् संज्ञा करते हैं)।
उदाहरण: 'अइउण्' सूत्र में अंतिम 'ण्' की इत् संज्ञा होती है। 'इत्' संज्ञक वर्णों का मुख्य कार्य प्रत्याहार बनाना होता है, बाद में इनका लोप हो जाता है।

२. लोप संज्ञा (Lopa Sangya)

संज्ञा सूत्र: अदर्शनं लोपः (१.१.६०)

अर्थ: विद्यमान (मौजूद) होते हुए भी दिखाई या सुनाई न देना (अदर्शन) 'लोप' कहलाता है।
विधान सूत्र: तस्य लोपः (१.३.९) — अर्थात् जिसकी 'इत्' संज्ञा होती है, उसका लोप हो जाता है।
उदाहरण: अइउण् के 'ण्' की इत् संज्ञा होकर 'तस्य लोपः' से उसका लोप (गायब) हो जाता है।

३. सवर्ण संज्ञा (Savarna Sangya)

सूत्र: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१.१.९)

अर्थ: जिन दो या दो से अधिक वर्णों के उच्चारण-स्थान (कण्ठ, तालु आदि) और आभ्यन्तर प्रयत्न (स्पृष्ट, विवृत आदि) समान होते हैं, वे आपस में 'सवर्ण' (सजातीय/समान) कहलाते हैं।
उदाहरण: 'अ' और 'आ' सवर्ण हैं। 'क्' और 'ख्' सवर्ण हैं (क्योंकि दोनों का स्थान कण्ठ और प्रयत्न स्पृष्ट है)।

४. संहिता संज्ञा (Samhita Sangya)

सूत्र: परः सन्निकर्षः संहिता (१.४.१०९)

अर्थ: वर्णों की अत्यन्त समीपता (नज़दीकी) को 'संहिता' कहते हैं। जहाँ दो वर्णों के बीच में कोई व्यवधान न हो, वहाँ संहिता मानी जाती है। सन्धि कार्य सदैव 'संहिता' के विषय में ही होता है।
उदाहरण: विद्या + आलयः। यहाँ 'आ' और 'आ' के बीच अत्यंत समीपता है, अतः यहाँ संहिता संज्ञा होकर 'विद्यालयः' सन्धि बनती है।

५. संयोग संज्ञा (Sanyoga Sangya)

सूत्र: हलोऽनन्तराः संयोगः (१.१.७)

अर्थ: स्वरों (अच्) के व्यवधान से रहित दो या दो से अधिक व्यंजनों (हल्) की निरंतरता को 'संयोग' कहते हैं। सरल शब्दों में, जब दो व्यंजनों के बीच कोई स्वर न हो, तो वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं।
उदाहरण: पुष्पम् (ष् + प् के बीच कोई स्वर नहीं है, अतः 'ष्प' संयोग है)। इन्द्रः (न् + द् + र् का संयोग)।

६. पद संज्ञा (Pada Sangya)

सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१.४.१४)

अर्थ: सुबन्त (जिनके अंत में सु, औ, जस् आदि 21 प्रत्यय हों) और तिङन्त (जिनके अंत में तिप्, तस्, झि आदि 18 प्रत्यय हों) शब्दों की 'पद' संज्ञा होती है। संस्कृत में बिना पद बनाए किसी शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता (अपदं न प्रयुञ्जीत)
उदाहरण: 'राम' मूल शब्द है, इसमें 'सुप्' प्रत्यय लगकर रामः (पद) बनता है। 'भू' धातु में 'तिङ्' प्रत्यय लगकर भवति (पद) बनता है।

७. प्रातिपदिक संज्ञा (Pratipadika Sangya)

सूत्र १: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१.२.४५)
सूत्र २: कृत्तद्धितसमासाश्च (१.२.४६)

अर्थ: धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त को छोड़कर जो अर्थवान शब्द स्वरूप होता है, उसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। इसके अतिरिक्त कृदन्त, तद्धितान्त और समास की भी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। (शब्दरूप चलाने से पहले शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होना अनिवार्य है)।
उदाहरण: राम, कृष्ण, लता, ज्ञान (ये सभी अर्थवान मूल शब्द प्रातिपदिक हैं)।
🌺 परीक्षा उपयोगी विशेष टिप:

प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रायः पूछा जाता है कि "सुप्तिङन्तं किम्?" (उत्तर: पदम्) या "परः सन्निकर्षः का?" (उत्तर: संहिता)। अतः इन सभी सूत्रों और उनके परिणामों को ठीक इसी प्रकार कंठस्थ कर लेना चाहिए। 'संज्ञा' प्रकरण संस्कृत व्याकरण का प्रवेश द्वार है।

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