इत्, लोप एवं प्रत्याहार संज्ञा | Sangya Prakaran

Sooraj Krishna Shastri
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इत्, लोप एवं प्रत्याहार संज्ञा

पाणिनीय अष्टाध्यायी के प्रवेश द्वार: इत् संज्ञा के ६ सूत्र, उपदेश की अवधारणा, लोप विधान और प्रत्याहार निर्माण का विस्तृत विवेचन।

परिचय: संस्कृत व्याकरण (अष्टाध्यायी) की पूरी इमारत इन तीन पारिभाषिक शब्दों (इत्, लोप, प्रत्याहार) पर ही टिकी है। महर्षि पाणिनि ने व्याकरण को संक्षिप्त (शॉर्टकट) बनाने के लिए 'इत्' वर्णों का सहारा लिया, उन्हीं इत् वर्णों की सहायता से 'प्रत्याहार' बनाए, और अपना काम निकल जाने के बाद 'लोप' संज्ञा करके उन इत् वर्णों को हटा दिया।

१. इत् संज्ञा (It Sangya / अनुबंध)

'इत्' का अर्थ है — ऐसा वर्ण जो केवल कोई विशेष व्याकरणिक कार्य (जैसे प्रत्याहार बनाना) करने के लिए जोड़ा गया हो, और कार्य पूरा होने के बाद वह स्वयं लुप्त (लोप) हो जाए। इसे 'अनुबंध' भी कहते हैं। इत् संज्ञा केवल 'उपदेश' की अवस्था में ही होती है।

उपदेश क्या है? (What is Upadesha?)
सूत्र/श्लोक: उपदेश आद्योच्चारणम्।
(पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि — इन त्रिमुनियों द्वारा जो पहली बार कहा गया, वह 'उपदेश' है।)

इसे इस श्लोक से समझा जाता है:
"धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम् । आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः ॥"
अर्थात्— धातु, सूत्र (माहेश्वर सूत्र आदि), गण, उणादि, वाक्य, लिङ्गानुशासन, आगम, प्रत्यय और आदेश — ये ९ चीजें उपदेश कहलाती हैं। इन्हीं में स्थित वर्णों की 'इत्' संज्ञा होती है।
इत् संज्ञा करने वाले ६ प्रमुख सूत्र (V.V.Imp for PGT)

प्रतियोगी परीक्षाओं में इन 6 सूत्रों से सीधे प्रश्न आते हैं कि कौन सा सूत्र कहाँ इत् संज्ञा करता है:

१. हलन्त्यम् (१.३.३)

अर्थ: उपदेश की अवस्था में जो अन्तिम हल् (व्यंजन) होता है, उसकी इत् संज्ञा होती है। (जैसे- अइउण् में 'ण्', लट् में 'ट्')।

२. उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)

अर्थ: उपदेश की अवस्था में जो अनुनासिक अच् (स्वर) होता है, उसकी इत् संज्ञा होती है। (जैसे- एधँ धातु में 'अँ' की)।

३. आदिञिटुडवः (१.३.५)

अर्थ: उपदेश (धातु) के आदि (प्रारम्भ) में स्थित ञि, टु और डु की इत् संज्ञा होती है। (जैसे- डुकृञ् धातु में 'डु' की)।

४. षः प्रत्ययस्य (१.३.६)

अर्थ: किसी भी प्रत्यय के आदि (शुरू) में आने वाले 'ष्' (मूर्धन्य षकार) की इत् संज्ञा होती है।

५. चुटू (१.३.७)

अर्थ: किसी प्रत्यय के प्रारम्भ में आने वाले चवर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्) और टवर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्) की इत् संज्ञा होती है। (जैसे- स् प्रत्यय में 'ज्' की)।

६. लशक्वतद्धिते (१.३.८)

अर्थ: तद्धित प्रत्ययों को छोड़कर, अन्य प्रत्ययों के प्रारम्भ में आने वाले ल्, श् और कवर्ग (क्, ख्, ग्, घ्, ङ्) की इत् संज्ञा होती है। (जैसे- प् प्रत्यय में 'श्' की)।

२. लोप संज्ञा (Lopa Sangya)

जिन वर्णों की ऊपर दिए गए 6 सूत्रों से 'इत्' संज्ञा हो जाती है, उनका व्याकरण में क्या किया जाए? इसका उत्तर पाणिनि जी 'लोप' संज्ञा से देते हैं।

संज्ञा सूत्र: अदर्शनं लोपः (१.१.६०)

अर्थ: जो विद्यमान (मौजूद) है, परन्तु सुनाई या दिखाई न दे (अदर्शन हो जाए), उसे व्याकरण में 'लोप' कहते हैं। यह सूत्र बताता है कि 'लोप' का मतलब क्या है।

विधान सूत्र: तस्य लोपः (१.३.९)

अर्थ: जिस वर्ण की 'इत् संज्ञा' होती है, उस (तस्य) वर्ण का लोप हो जाता है। यह सूत्र 'लोप' करने का आदेश देता है।
उदाहरण: अइउण्। यहाँ 'हलन्त्यम्' से 'ण्' की इत् संज्ञा हुई। फिर 'तस्य लोपः' सूत्र आकर उस 'ण्' का लोप (गायब) कर देता है।

३. प्रत्याहार संज्ञा (Pratyahara Sangya)

प्रत्याहार का शाब्दिक अर्थ है — संक्षेपीकरण (छोटा करना)। बहुत सारे वर्णों को केवल दो वर्णों के माध्यम से कह देना ही प्रत्याहार है।

सूत्र: आदिरन्त्येन सहेता (१.१.७१)

अर्थ: अन्त्य इत्-संज्ञक वर्ण (जैसे ण्, क्) के साथ उच्चरित होने वाला आदि (पहला) वर्ण अपना और अपने बीच में आने वाले सभी वर्णों का बोध कराता है।
विस्तृत उदाहरण (अक् प्रत्याहार):
माहेश्वर सूत्र: १. इ उ ण् । २. ऋ ऌ क्
यहाँ 'अ' आदि वर्ण है, और 'क्' अन्तिम इत् संज्ञक वर्ण है। 'आदिरन्त्येन सहेता' सूत्र के अनुसार, 'अ' से शुरू करके 'क्' तक के वर्ण गिने जाएँगे।
बीच के इत् वर्ण (ण्) को गिना नहीं जाएगा।
अतः अक् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ (ये ५ वर्ण)। यह प्रत्याहार संज्ञा है।
🌺 तीनों का आपसी सम्बन्ध (निष्कर्ष):

महर्षि पाणिनि की वैज्ञानिक प्रक्रिया देखें — सबसे पहले उन्होंने 'हलन्त्यम्' से अन्तिम वर्ण को 'इत्' नाम दिया। फिर 'आदिरन्त्येन सहेता' से उस 'इत्' वर्ण का सहारा लेकर 'प्रत्याहार' बनाया। और जब प्रत्याहार बन गया, तो 'तस्य लोपः' से उस बेचारे 'इत्' वर्ण का 'लोप' कर दिया! यही पाणिनीय व्याकरण का मूल रहस्य है।

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