इत्, लोप एवं प्रत्याहार संज्ञा
पाणिनीय अष्टाध्यायी के प्रवेश द्वार: इत् संज्ञा के ६ सूत्र, उपदेश की अवधारणा, लोप विधान और प्रत्याहार निर्माण का विस्तृत विवेचन।
१. इत् संज्ञा (It Sangya / अनुबंध)
'इत्' का अर्थ है — ऐसा वर्ण जो केवल कोई विशेष व्याकरणिक कार्य (जैसे प्रत्याहार बनाना) करने के लिए जोड़ा गया हो, और कार्य पूरा होने के बाद वह स्वयं लुप्त (लोप) हो जाए। इसे 'अनुबंध' भी कहते हैं। इत् संज्ञा केवल 'उपदेश' की अवस्था में ही होती है।
(पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि — इन त्रिमुनियों द्वारा जो पहली बार कहा गया, वह 'उपदेश' है।)
इसे इस श्लोक से समझा जाता है:
"धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम् । आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः ॥"
अर्थात्— धातु, सूत्र (माहेश्वर सूत्र आदि), गण, उणादि, वाक्य, लिङ्गानुशासन, आगम, प्रत्यय और आदेश — ये ९ चीजें उपदेश कहलाती हैं। इन्हीं में स्थित वर्णों की 'इत्' संज्ञा होती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में इन 6 सूत्रों से सीधे प्रश्न आते हैं कि कौन सा सूत्र कहाँ इत् संज्ञा करता है:
१. हलन्त्यम् (१.३.३)
२. उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)
३. आदिञिटुडवः (१.३.५)
४. षः प्रत्ययस्य (१.३.६)
५. चुटू (१.३.७)
६. लशक्वतद्धिते (१.३.८)
२. लोप संज्ञा (Lopa Sangya)
जिन वर्णों की ऊपर दिए गए 6 सूत्रों से 'इत्' संज्ञा हो जाती है, उनका व्याकरण में क्या किया जाए? इसका उत्तर पाणिनि जी 'लोप' संज्ञा से देते हैं।
संज्ञा सूत्र: अदर्शनं लोपः (१.१.६०)
विधान सूत्र: तस्य लोपः (१.३.९)
३. प्रत्याहार संज्ञा (Pratyahara Sangya)
प्रत्याहार का शाब्दिक अर्थ है — संक्षेपीकरण (छोटा करना)। बहुत सारे वर्णों को केवल दो वर्णों के माध्यम से कह देना ही प्रत्याहार है।
सूत्र: आदिरन्त्येन सहेता (१.१.७१)
माहेश्वर सूत्र: १. अ इ उ ण् । २. ऋ ऌ क् ।
यहाँ 'अ' आदि वर्ण है, और 'क्' अन्तिम इत् संज्ञक वर्ण है। 'आदिरन्त्येन सहेता' सूत्र के अनुसार, 'अ' से शुरू करके 'क्' तक के वर्ण गिने जाएँगे।
बीच के इत् वर्ण (ण्) को गिना नहीं जाएगा।
अतः अक् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ (ये ५ वर्ण)। यह प्रत्याहार संज्ञा है।
महर्षि पाणिनि की वैज्ञानिक प्रक्रिया देखें — सबसे पहले उन्होंने 'हलन्त्यम्' से अन्तिम वर्ण को 'इत्' नाम दिया। फिर 'आदिरन्त्येन सहेता' से उस 'इत्' वर्ण का सहारा लेकर 'प्रत्याहार' बनाया। और जब प्रत्याहार बन गया, तो 'तस्य लोपः' से उस बेचारे 'इत्' वर्ण का 'लोप' कर दिया! यही पाणिनीय व्याकरण का मूल रहस्य है।
