तुगागम सन्धि (Tugāgama Sandhi)
स्वर और 'छ' के बीच 'च्' का आगम: 'छे च' (नित्य) और 'पदान्ताद्वा' (विकल्प) सूत्रों का सम्पूर्ण एवं वैज्ञानिक विवेचन।
परिचय: 'तुगागम' का अर्थ है — 'तुक्' (त्) का आगम (आना)। जब किसी स्वर के बाद 'छ' वर्ण आता है, तो उन दोनों के बीच में 'त्' आ जाता है। चूँकि 'त्' के ठीक बाद 'छ' (चवर्ग) है, इसलिए श्चुत्व सन्धि (स्तोः श्चुना श्चुः) के नियम से वह 'त्' अपने आप 'च्' में बदल जाता है। इसीलिए आम बोलचाल में इसे 'च्' का आगम (च्छागम) भी कह दिया जाता है।
१. ह्रस्व स्वर के बाद तुगागम (नित्य/अनिवार्य)
सूत्र: छे च (६.१.७३)
सूत्र विच्छेद: छे + च। (इसमें 'ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्' सूत्र से 'ह्रस्वस्य' और 'तुक्' की अनुवृत्ति आती है)।
अर्थ (नियम): यदि किसी ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) के ठीक बाद 'छ' वर्ण आए, तो उन दोनों के बीच में नित्य (अनिवार्य) रूप से 'तुक्' (त् ➔ च्) का आगम हो जाता है।
(सरल शब्दों में: ह्रस्व स्वर + छ = स्वर + च्छ)
अर्थ (नियम): यदि किसी ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) के ठीक बाद 'छ' वर्ण आए, तो उन दोनों के बीच में नित्य (अनिवार्य) रूप से 'तुक्' (त् ➔ च्) का आगम हो जाता है।
(सरल शब्दों में: ह्रस्व स्वर + छ = स्वर + च्छ)
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (V.V.Imp):
• शिव + छाया = शिवच्छाया (शिव की छाया)। (यहाँ 'शिव' के अन्त में ह्रस्व 'अ' है, उसके बाद 'छ' आया। अतः दोनों के बीच 'च्' आ गया)।
• तरु + छाया = तरुच्छाया (वृक्ष की छाया)। (यहाँ ह्रस्व 'उ' के बाद 'छ' है)।
• अनु + छेदः = अनुच्छेदः (Paragraph)।
• वि + छेदः = विच्छेदः (अलगाव / तोड़ना)।
• परि + छेदः = परिच्छेदः (अध्याय / Chapter)।
• स्व + छन्दम् = स्वच्छन्दम् (अपनी इच्छा से)।
• तरु + छाया = तरुच्छाया (वृक्ष की छाया)। (यहाँ ह्रस्व 'उ' के बाद 'छ' है)।
• अनु + छेदः = अनुच्छेदः (Paragraph)।
• वि + छेदः = विच्छेदः (अलगाव / तोड़ना)।
• परि + छेदः = परिच्छेदः (अध्याय / Chapter)।
• स्व + छन्दम् = स्वच्छन्दम् (अपनी इच्छा से)।
२. पदान्त दीर्घ स्वर के बाद तुगागम (विकल्प)
ह्रस्व स्वर के बाद तो यह नियम 'नित्य' (हमेशा) लगता है, परन्तु यदि स्वर दीर्घ (आ, ई, ऊ, ऋृ, ए, ऐ, ओ, औ) हो और वह किसी सार्थक पद के अन्त (पदान्त) में हो, तो यह सन्धि विकल्प से (Optional) होती है।
सूत्र: पदान्ताद्वा (६.१.७६)
सूत्र विच्छेद: पदान्तात् + वा। ('वा' का अर्थ है - विकल्प)।
अर्थ (नियम): यदि पद के अन्त में दीर्घ स्वर हो और उसके बाद 'छ' आए, तो 'तुक्' (च्) का आगम विकल्प से होता है। अर्थात् आप चाहें तो 'च्' लगाएँ, या न लगाएँ (दोनों रूप शुद्ध हैं)।
अर्थ (नियम): यदि पद के अन्त में दीर्घ स्वर हो और उसके बाद 'छ' आए, तो 'तुक्' (च्) का आगम विकल्प से होता है। अर्थात् आप चाहें तो 'च्' लगाएँ, या न लगाएँ (दोनों रूप शुद्ध हैं)।
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (TGT/PGT Special):
• लक्ष्मी + छाया = लक्ष्मीच्छाया / लक्ष्मीछाया। (यहाँ 'लक्ष्मी' एक पूर्ण पद है और उसके अन्त में दीर्घ 'ई' है। अतः यहाँ दोनों रूप व्याकरण सम्मत हैं)।
• विद्या + छेदः = विद्याच्छेदः / विद्याछेदः।
• वधू + छाया = वधूच्छाया / वधूछाया।
• नदी + छाया = नदीच्छाया / नदीछाया।
• विद्या + छेदः = विद्याच्छेदः / विद्याछेदः।
• वधू + छाया = वधूच्छाया / वधूछाया।
• नदी + छाया = नदीच्छाया / नदीछाया।
३. अपदान्त दीर्घ स्वर के बाद तुगागम (नित्य)
सूत्र: दीर्घात् (६.१.७५)
अर्थ: यदि दीर्घ स्वर पद के अन्त में न हो (अपदान्त हो)— जैसे कोई उपसर्ग या धातु का हिस्सा हो— और उसके बाद 'छ' आए, तो 'तुक्' (च्) का आगम नित्य (अनिवार्य) रूप से होता है। यहाँ विकल्प नहीं चलता।
उदाहरण:
• आ + छादयति = आच्छादयति (ढकता है)। (यहाँ 'आ' (आङ्) एक उपसर्ग है, पूर्ण स्वतन्त्र पद (सुबन्त/तिङन्त) नहीं। अतः यहाँ केवल 'आच्छादयति' ही शुद्ध होगा, 'आछादयति' लिखना अशुद्ध है।)
• आ + छादयति = आच्छादयति (ढकता है)। (यहाँ 'आ' (आङ्) एक उपसर्ग है, पूर्ण स्वतन्त्र पद (सुबन्त/तिङन्त) नहीं। अतः यहाँ केवल 'आच्छादयति' ही शुद्ध होगा, 'आछादयति' लिखना अशुद्ध है।)
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
- नियम का सार: स्वर के बाद 'छ' आने पर बीच में 'च्' (आधा च) जुड़ जाता है।
- छे च (नित्य): ह्रस्व स्वर + छ = नित्य 'च्छ' (जैसे- शिवच्छाया, अनुच्छेदः)।
- पदान्ताद्वा (विकल्प): पदान्त दीर्घ स्वर + छ = 'च्छ' या 'छ' (जैसे- लक्ष्मीच्छाया / लक्ष्मीछाया)।
- दीर्घात् (नित्य): अपदान्त दीर्घ स्वर + छ = नित्य 'च्छ' (जैसे- आच्छादयति)।
- विशेष: इसमें पहले 'त्' का आगम होता है, जो श्चुत्व सन्धि के कारण 'च्' में बदल जाता है।
